शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

विकास

हर ओर विकास नज़र आता हैं
जिस ओर देखो बस यही नज़र आता हैं
मानव आज विकसित  हो रहा  हैं
हवा भी अब इंसा बनाता हैं
हर ओर बस विकास नज़र आता हैं


आज हम कंक्रीट के जंगलो में रहते हैं
इंसा ने तो अब उड़ना तक सीख लिया हैं
टीन  के डिब्बो  में  सफर करते हैं
हर कोई आज छोटा नज़र आता हैं
हर ओर बस विकास नज़र आता हैं

भीड़ मे  इंसा अकेला सा रहता हैं
मिटटी भी कुछ बेगानी सी
आसमान भी अब काला नज़र आता हैं
नन्हा पंछी अब नहीं फड़फड़ाता हैं
हर ओर बस विकास नज़र आता हैं

रेशमी कपड़ो में इंसा खुद को छिपाता हैं
दुसरो को नंग देख मंद-मंद मुस्कुराता हैं
उसे कभी खुद का अतीत नज़र आता हैं ?
पल पल वो खुदा से कटता चला जाता हैं
शायद आज उसे सिर्फ विकास नज़र आता हैं