मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

बिहार चुनाव और विकास की बात


चुनाव लोकतंत्र की सबसे महत्तवपूर्ण इकाई है क्योंकि यह किसी भी देश की जनता को अपना प्रतिनिधि चुनने की ताकत देता है। वह प्रतिनिधि जो उस देश व उसके निवासियों के विकास में सबसे महत्तवपूर्ण किरदार निभाता है। अपनी नीतियों व एजेंडों से विकास के नए कीर्तिमान गढता है। ऐसे में अहम प्रश्न यह उठता है कि लोग अपने प्रतिनिधि को कैसे चुने। कैसे हजारों चहरों की भीड़ में वह उस चेहरे की पहचान करें, जो उनके भविष्य को विकास की ओर की अग्रसर करेगा। आमतौर पर नेताओं के इतिहास व उनके वादों को ध्यान में रखकर चुनावों में लोग वोट डालते हैं। भई, तर्क तो यही कहता है। लेकिन यदि भारत के संदर्भ में बात करें तो यह स्थिति कुछ अटपटी है। क्योंकि यहां विकास के नाम पर वोट कम और जाति के नाम पर ज्यादा डाले जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि विकास का मुद्दा चुनावों में उठता ही नहीं है। लेकिन जाति के नारे के सामने विकास की बातें अक्सर बोनी रह जाती हैं। यदि इस मसले पर हम बात बिहार चुनावों के संदर्भ में करें तो विकास का मुद्दे जैसे अपनी जान बचाकर कहीं छुप कर बैठ गया है और बाहर आने तो तैयार ही नहीं।
बिहार चुनावों की शुरुआत तो विकास के नाम पर ही हुई थी लेकिन बातें कैसे जाति, धर्म, गौमांस, तांत्रिक बाबा, ब्रह्मपिशाच, नरभक्षी आदि पर आकर सिमट गयी इस बात को एक बार में बताना काफी मुश्किल है और यदि सिलसिलेवार तरीके से सब बताया जाए तो वक्त बहुत निकल जाएगा। तो सीधा मुद्दे पर आते हैं। आखिर बिहार में विकास का मुद्दा क्यों गायब हो गया। इसके दो कारण हो सकते हैं या तो आजादी के बाद से बिहार में नेता इतने वादे कर चुके हैं कि अब नया कहने को कुछ बचा नही है या फिर महागठबंधन के घटक दल और भाजपा सरकार दोनों ही अपनी नाकामियाबियों का उल्लेख करना नहीं चाहते।
बिहार में नीतीश दो बार सत्ता का स्वाद चख चुके है। लालू भी कुछ वक्त खुद तो कुछ वक्त राबड़ी देवी के द्वारा बिहार की कुर्सी पर काबिज हो चुके हैं और कांग्रेस की तो खैर बिहार में पूरी एक पीढी निकल गई। भाजपा भी पांच साल नीतीश के सहारे बिहार में राज जमा चुकी है। सब सुशासन की दुहाई देकर सत्ता में आए और बिहार में विकास का दावा ठोका लेकिन इस विकास की हकीकत क्या है?  इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के सकल घरेलु उत्पाद में 2001 से 2010 तक बिहार का योगदान 2.1 प्रतिशत था जो आज पांच साल बाद भी इतना ही है। यानि कि पिछले पंद्रह सालों में बिहार में उत्पाद बढा ही नहीं।  प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी बिहार सबसे पीछे है। बिहार के कुछ जिलों में तो प्रति व्यक्ति मासिक आय आज भी 750 रुपये है।  2011 की जनगणना के मुताबिक बिहार में कुल 36 फीसदी लोग साक्षर हैं। जबकि भारत की कुल साक्षरता दर 74 प्रतिशत है। बिहार में सरकारी और गैर सरकारी महाविद्यालयों की संख्या मात्र 665 है। जिसमें जहां 10 महाविद्यालय तकनीकी अभियंत्रण के हैं तो वहीं मेडिकल कॉलिज की संख्या और भी कम है। यानि बिहार शिक्षा के मामले अभी कहीं पीछे है।
देश की जनसंख्या में बिहार की हिस्सेदारी 8.6 फीसदी है लेकिन देश में कुल हिंसापूर्ण अपराध में उसका योगदान 10 फीसदी है। 2011-12 में बिहार के सकल घरेलु उत्पादन में औद्योगिक उत्पादन का योगदान 19.9 प्रतिशत था जो की 2014 में घटकर 18.4 प्रतिशत हो गया। 2006 से 07 के बीच में बिहार में एक लाख 63 हजार छोटे व बड़े औद्योगिक इकाइयां थी बीते दस सालों में इसमें मात्र 35000 इकाइयां और बढी है यानि औद्योगिक इकाइयो में वृध्दि मात्र 2.5 प्रतिशत से भी कम है। ऐसे में बिहार का सारा दारोमदार खेती पर आ पडता है लेकिन उस ओर भी किसी सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। विशेषकर नीतीश के शासन में जिसके कारण नीतीश के शासन काल में न तो खेतिहर भूमि में कोई वृध्दि हुई और न ही उत्पादन में।
विदेशी पूंजी निवेश के मामले में बिहार की तुलना यदि उत्तर प्रदेश से भी की जाए तो वह उससे भी काफी पीछे है। 2014 में जहां उत्तरप्रदेश को 37 विदेशी पूंजी निवेश के आवेदन मिले तो बिहार को मात्र 7 मिले। बिजली मुहैया कराने के मामले में भी बिहार कहीं नहीं टिकता। खैर इन सब में बिहार चाहे पीछे हो लेकिन दशकीय जनसंख्या वृध्दि में बिहार काफी आगे है। जहां राष्ट्रीय जनसंख्या वृध्दि दर 17.6 प्रतिशत है वहीं बिहार की जनसंख्या वृध्दि दर 25.1 प्रतिशत की रफ्तार से आगे बढ रही है। ऐसे में यदि बिहार की जनता को पिछले कुछ दिनों में कुछ मिला है तो वह हैं सड़कें। 2013 में बिहार मे कुल 1 लाख 80 हजार किलोमीटर की पक्की सड़क थी। जो 2014 में बढकर 2 लाख 25 हजार किलोमीटर हो गई। यानि एक साल से भी कम वर्ष में 45,000 किलोमीटर पक्की सड़क।

इन सभी आंकड़ों को देखकर यहां सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इस तरह की बदतर औसत बिहार की बदहाली के लिए जिम्मदार नहीं है? क्या बिहार की जनता को यह जानने का हक नहीं है कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्या बिहार की जनता नहीं चाहती की बिहार में भी विकास की बातें हों? बिहार भी खुशहाल राज्य बने। लेकिन कहते है न की राजनेता अक्सर जनता को वही बताते और दिखाते हैं जो वह चाहते हैं। बिहार का चुनाव मात्र अपशब्दों और आरोप – प्रत्यारोपों तक सिमट कर रह गया है। कोई दल विकास की बात करना ही नहीं चाहता।