दिनेश शर्मा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दिनेश शर्मा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

माँझी जो नाव डुबोये उसे कौन बचाये..!


जब कोई युवा किसी प्रतिष्ठित संस्थान से प्रोफेशनल कोर्स कर नौकरी की तलाश में निकलता है, तो दो बातें होती हैं या तो उसे नौकरी नहीं मिलती या फिर मिल जाती है। अगर नहीं मिलती तो अलग बात है लेकिन नौकरी मिलने का मतलब है, लाइफ सेट! इक्कीसवीं शताब्दी के इस दूसरे दशक में छोटी से छोटी कंपनी में भी काम करने पर  कम से कम 15,000 तनख्वाह मिल ही जाती है। बस कुछ अपवादों को छोड़ दें तो, इसे विडंबना कहूं या व्यंग्य लेकिन देश में हर रोशनी का अलख जगाने वाले, लोकतंत्र को जीवित रखने वाले, दबे-कूचलों की आवाज़ उठाने वाले हमारे मीडिया संस्थान भी इस अपवाद का हिस्सा हैं। इसे दीया तले अंधेरा कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। अधिकारों, मैलिक कर्तव्यों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले इन मीडिया संस्थानों की ये सबसे कड़वी सच्चाई है। एक ऐसा पहलू जिससे ज्यादातर लोग अनभिज्ञ हैं।

आप कल्पना कर सकते हैं? किसी बड़े से प्रोफेशनल डिग्री कॉलेज में लाखों खर्च करने के बाद जब आप नौकरी ढूंढने निकले, तो आपको इंटर्नशिप के नाम पर महीनों घिसा जाए। वो भी बिना किसी तनख्वाह के और इसमें हैरानी वाली कोई बात नहीं कि ये महीने साल में भी बीत सकते हैं। ये दुःस्वप्न मीडिया जगत की हकीकत है। जिसे हजारों युवा जीते हैं। वो भी सिर्फ एक दस हजार की नौकरी के लिए। दस हजार का ये आंकड़ा उन चैनलों का है जो नंबर 4, 5 या 6 की कुर्सियों पर विराजमान हैं। जहां गार्डों की तनख्वाह एक डिग्रीथारी युवा से ज्यादा होती है। इन मीडिया संस्थानों में ऐसे चैनलों की भी कमी नहीं है जहां शुरुआत 4000 रुपये से होती है। जिससे ज्यादा एक मजदूर 10 दिनों में 8 घंटे काम करके कमा लेता है। लेकिन इन छोटे चैनलों में ना तो काम के घंटे फिक्स हैं और ना छुट्टियां। अगर महीने में कोई बिना छुट्टी के 30 दिन लगातार काम करे तो कोई हैरानी वाली बात नहीं। जो लोग टीवी 100 जैसे चैनलों में काम कर चुके हैं वो इससे बखूबी इत्तेफाख रखते होंगे।

किसी क्षेत्र में आप छोटी कंपनियों में काम कर अपना परिवार पाल सकते हैं लेकिन मीडिया में अगर आप छोटे चैनल में काम करते हैं तो खुद तक को पालना बेहद मुश्किल है। परिवार की सोचना, खुली आंखों से सपने देखने जैसे है। हालांकि शीर्ष के चुनिंदा चैनलों में जिंदगी थोड़ी आसान है।

ये देश का शायद इकलौता ऐसा सेक्टर है जहां कब आपकी नौकरी चली जाए कोई नहीं जानता और निकाले जाने के बाद नई नौकरी की तलाश मेें चप्पलें घिस जाती हैं। उसके बाद भी पिछले सकेल पर तन्ख्वाह मिल जाए तो सितारे बुलंद समझिए जनाब! टीवी इंडस्ट्री के छोटे से दौर में ना जाने कितनी बार दर्जनों की संख्या में कर्मचारियों को बिना किसी नोटिस के नौकरी से निकाल दिया गया। साल 2013 आईबीएन से 320 मीडियाकर्मी आउट, मंदी के दौर में एनडीटीवी से एक मुश्त सैंकड़ों की संख्या में मीडियाकर्मी आउट, लेकिन ना तो कोई सवाल पूछने वाला और ना कोई जवाब देने वाला। हर तरफ सिर्फ शांति क्योंकि सब ठीक है। आज आप पार्टी का तमगा लेकर जीना के अधिकारों की बात करने वाले, ये वहीं आशुतोष हैं जो उस दौर में आईबीएन के एडिटर इन चीफ हुआ करते थे। रवीश भाई का एनडीटीवी में तब भी एक बड़ा औदा था लेकिन तब ना तो किसी ने ब्लॉग लिखा ना ब्रेकिंग चलाई गई। खैर, ये तो पुरानी बातें हैं। आज भी कई चैनलों में महीनों-महीनों लोगों को तनख्वाहें नहीं मिलती। कहीं तनख्वाह मांगने पर कर्मचारी को पीटा जाता है तो कहीं बाहर का दरवाजा दिखा दिया जाता है। सिर्फ इस उम्मीद में नौकरी करिए की कभी पैसा मिलेगा... सहारा प्रबंधन में लंबे समय से दर्जनों की संख्या में पत्रकार अपने हक के लिए आवाज़ें लगा रहे हैं लेकिन टीवी जगत के सितारे मौन हैं। सवाल है आखिर क्यों? देश में घटने वाली हर घटना पर ताल ठोकने की बात करने वाले एनडीटीवी से हाल ही में 36 कैमरामैन निकाले गए, सहारा से करीब 40 लोगों की छुट्टी कर दी गई, मीडियाकर्मी या कहूं मीडिया पीड़ितों ने तब भी आवाज़ उठाई थी और अब भी अब उठा रहे हैं लेकिन इन खबरों को कहीं जगह नहीं मिलती। आखिर क्यों? 

लिखना को अभी बहुत कुछ है...लेकिन राजेश खन्ना की फिल्म अमर प्रेम के एक गीत की कुछ पंक्तियों के  साथ अपनी लेखनी को यहीं विराम देता हूं...

मज़धार में नैय्या डोले, तो माँझी पार लगाये,
माँझी जो नाव डुबोये उसे कौन बचाये..

 

  




सोमवार, 1 अगस्त 2016

कुष्ठ का कलंक

ज्यादातर देशों में कुष्ठ रोग का सफाया लगभग 15 साल पहले ही हो गया था। लेकिन कुछ देशों में अब भी यह बीमारी सामने आ रही है, भारत भी उनमें से एक है लेकिन हैरत की बात यह है कि कुष्ठ के 60 फीसदी से ज्यादा मामले सिर्फ भारत में सामने आते हैं।

कुष्ठ मानव सभ्यता की सबसे पुरानी बीमारियों में से एक है। यह रोग पीड़ित का रूप रंग खराब कर देता है जिसके बाद उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। एक वक्त पूरे विश्व पर इस बीमारी का घातक रूप से कब्जा था, लेकिन जागरूकता, उपचार और लगातार प्रयासों द्वारा इस बीमारी पर काबू पाया गया और डबल्यूएचओ संगठन ने साल 2000 में इस बात की पुष्टि की कि दुनिया में प्रति दस हजार की आबादी में इस रोग की दर एक व्यक्ति से भी कम है। जिसके साथ ही संगठन ने दुनिया से इस रोग के सफाये का ऐलान कर दिया था।
भारत ने आर्थिक उदारीकरण (1991) की शुरुआत में इस रोग पर काबू पाने की मुहिम शुरु की थी उस समय देश में प्रति दस हजार की जनसंख्या पर 26 कुष्ठ रोगी थे। 14 वर्षो के अंदर यह संख्या 25 गुना घटकर प्रति दस हजार पर एक हो गई। जिसके बाद 2005 में भारत सरकार ने भी देश को कुष्ठमुक्त घोषित किया था। साथ ही यह दावे किए गए थे कि अब देश में कुष्ठ के गिने चुने मामले हैं जिनपर वक्त के साथ काबू कर लिया जाएगा लेकिन हाल ही में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है जिसके मुताबिक हर साल दुनिया के विभिन्न देशों से औसतन 2.14 लाख मामले कुष्ठ के सामने आते हैं इसमें चिंता की बात यह है कि इन मामले में 60 प्रतिशत भारत के होते हैं। यानि देश में सालाना 1.3 लाख कुष्ठ के मामले हर साल सामने आ रहे हैं।
ताजा रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि कुष्ठ रोग के 94 फीसद मामले सिर्फ 13 देशों से सामने आ रहे हैं और अब भी यह बीमारी खासी बड़ी आबादी को प्रभावित कर रही है। ऐसे कुल मामलों में महज तीन देशों भारत, इंडोनेशिया और ब्राजिल का हिस्सा 81 फीसदी है। जिसमें शीर्ष स्थान पर भारत है। इस हिसाब से भारत अभी कुष्ठमुक्त देश नहीं है क्योंकि डब्लयूएचओ के मुताबिक कुष्ठमुक्त कहलाने के लिए 10 हजार की आबादी में एक से भी कम मामले होने चाहिए लेकिन भारत इस लक्ष्य को पूरा नही कर पाता।
कर्नाटक स्थित एक कुष्ठ रोग की बस्ती
साल 2010-11 में अंतरराष्ट्रीय कुष्ठ रोग संघ की रिपोर्ट में कहा गया था कि उस वर्ष दुनिया में कुष्ठ रोग के दो लाख अट्ठाईस हजार चार सौ चौहत्तर मामले सामने आए जिनमें एक लाख छब्बीस हजार आठ सौ यानि 56 प्रतिशत मामले अकेले भारत के थे। उस समय इस संख्या में इजाफे की चिंता जताई गई थी लेकिन तत्कालीन सरकार ने इस ओर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया। इसी की बानगी है कि ताजा रिपोर्ट में भारत में कुष्ठ के मामले बढे हैं। हैरानी की बात यह है कि सरकार द्वारा इतनी लापरवाही तब बर्ती गई थी जबकि 2011 में स्वयं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया था कि जिन राज्यों में इस रोग का लगभग खात्मा होने का दावा किया गया था, वहां से कुष्ठ के नए मामले सामने आ रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया था कि चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और झारखंड समेत सोलह राज्यों में तीन फीसद लोग इस बीमारी की चपेट में हैं और कहीं-कहीं यह तेजी से फैल भी रहा है। इस रिपोर्ट में जो आंकड़े पेश किये गए थे वह चिंताजनक थे लेकिन वास्तविक नहीं क्योंकि भारत सरकार द्वारा हमेशा से कुष्ठ के आंकड़ों को छिपाया गया है।
 साल 2011 में ही अनेक स्वयंसेवी संगठनों की ओर से गठित एक राष्ट्रिय मंच ने कुष्ठरोगियों को दी जाने वाली पेंशन के सिलसिले में किए गए अपने अध्ययन में पाया था कि उस समय राज्य सरकारों द्वारा पेश किए गए आंकड़ों और हकीकत में कोई मेल नहीं था। मसलन, बिहार सरकार ने दावा किया था कि राज्य में कुष्ठ रोगियों की केवल चौबीस बस्तियां हैं, लेकिन जांच में ऐसी चौंसठ बस्तियां पाईं गईं। साल 2012 में निपॉन फाउण्डेशन द्वारा मध्यप्रदेश में किया गया एक सर्वेक्षण बताता है, कि राज्य में कुष्ठ रोगियों की तादाद तकरीबन चार हजार है और इनकी लगभग 34 बस्तियां हैं। जबकि राज्य सरकार द्वारा उस समय सरकारी रिकार्ड में कुष्ठ रोगियों की महज चार बस्तियां दर्शाई गई थीं। यही नहीं रिपोर्ट में कुष्ठ रोगियों की संख्या भी कुछ सैकड़ा भर दर्शाई गई थी। इन पुराने रिकॉर्डों को देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भारत में कुष्ठ के 1 लाख 30 हजार से ज्यादा मामले हो सकते हैं।
कुष्ठ रोग का फैलाव देश में धीरे-धीरे बढ रहा है खासतौर पर मलिन बस्तियों में इस बीमारी के विषाणुओं का संचरण तेजी से हो रहा है। जाहिर है, एक बड़ी समस्या वास्तविक स्थित के आंकलन की है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कुष्ठ-प्रभावित राज्यों की श्रेणी में शामिल होने के डर से देश के कई राज्यों में कुष्ठ रोगियों की सही तादाद सामने नहीं आती। बीते साल कुछ गैर-सरकारी संगठनों की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि देश में ऐसे आधे मामले दबा दिए जाते हैं। भारत में फिलहाल सालाना औसतन कुष्ठ के 1.3 लाख नए मामले सामने आ रहे हैं। अब इस बीमारी को खत्म करने और इसकी चपेट में आने वालों के साथ होने वाला भेदभाव खत्म करने के लिए डब्ल्यूएचओ ने अपनी नई वैश्विक रणनीति के तहत संबंधित सरकारों से इस मामले में और मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय देने की अपील की है। इसके तहत वर्ष 2020 तक कुष्ठ से पीड़ित बच्चों की तादाद घटाने और इसके चलते होने वाली शारीरिक विक्लांगता दर को शून्य तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया है।
देश में अपीलें तो अक्सर होती रहती हैं लेकिन गौर कभी नहीं होता। इस रोग का भारत में एक बार फिर लौटने का कारण सरकारों की लापरवाही है। दरअसल, इस रोग की समाप्ति की औपचारिक घोषणा के बाद सरकार को यह शायद जरूरी नहीं लगा कि कुष्ठ रोगियों की संख्या पर नजर रखी जाए। इस मामले में स्वैच्छिक प्रयासों की भी अपनी सीमा है। यह जगजाहिर सच्चाई है कि भारत में इस बीमारी से ग्रस्त लोगों के प्रति किस तरह के सामाजिक दुराग्रह काम करते हैं। कुष्ठ रोग के शिकार आमतौर पर बेहद गरीब परिवारों और पिछड़े क्षेत्रों में पाए जाते हैं। भेदभाव, तिरस्कार और सामाजिक बहिष्कार के डर से बहुत सारे मरीज और उनके परिवार भरसक तथ्य छिपाते हैं। इसके अलावा, ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने या ट्रेन में आम यात्रियों के साथ यात्रा करने पर पाबंदी जैसे कई कानूनों के जरिए खुद सरकारी तौर पर कुष्ठ के मरीजों के साथ भेदभाव किया जाता है। जबकि यह साबित हो चुका है कि कुष्ठ अब न तो लाइलाज है न ही वंशानुगत। इसके ज्यादातर मामलों में संक्रमण का खतरा नहीं होता। खासतौर पर एक बार इसका इलाज शुरू होने के बाद इसके फैलने की आशंका नहीं होती। फिर भी इस बीमारी को एक सामाजिक अभिशाप माना जाता है। साफ है कि कुष्ठ निवारण योजना की खामियों के अलावा समाज में चली आ रही भ्रांतियों से निपटे बिना इस बीमारी का उन्मूलन नहीं हो सकेगा। आज के संदर्भ में यह बहुत जरूरी है कि देश में एक बार फिर कुष्ठ रोग से लड़ने के लिए अभियान चलाए जाएं क्योंकि अभी यह बीमारी आंशिक रूप से एक बार फिर पैर पसार रही है लेकिन सरकार और समाज का रुख कुष्ठ की तरफ इसी तरह उदासीन रहा तो हो सकता है कि शायद एक बार फिर देश को अपने कल के कलंक से जुझना पड़े।

मंगलवार, 1 मार्च 2016

बदलाव और किसान

देश आजाद होने के 9 साल बाद फिल्म आई थी 'मदर इंडिया'। वैसे तो यह फिल्म एक मां पर आधारित थी लेकिन इसमें आजाद भारत के उस किसान की दुर्दशा का सटीक चित्रण किया गया था जो आजादी के 9 साल बाद भी गुलाम ही था। जुल्म उसपर तब भी उसी तरह ढाये जा रहे थे जैसे 1947 से पहले। बस फर्क इतना था कि जुल्म करने वाले हाथ गौरे नहीं काले थे। उस समय का किसान साहुकारों और जमीनदारों के पैरों तले दम तोड़ रहा था। आमदनी के नाम पर अगर उसे पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी भी मयस्सर हो जाए तो गनीमत थी। वो जीवन काट रहा था तो इस उम्मीद के सहारे की बदलते भारत के साथ उसकी दशा भी बदलेगी।
वक्त बदला, चहरे बदले, कमान एक पीढी से दूसरी पीढी ने संभाली, सत्ता में भी परिवर्तन आया, जय किसान के नारे दिए गए, हर चुनाव में, बजट में किसानों की बात की गई। परिवर्तन कि बियार चली लेकिन वक्त दर वक्त किसान के हालात शायद देश में इस स्तर तक गिर चुके थे कि बदलाव उसतक कभी पहुंच ही नहीं सकी। कुछ जिनकी उम्मीद टूट चुकी थी उन्होंने आत्महत्या से हाथ मिलाया तो कुछ ने शहरों की राह पकड़ ली तो कुछ अपनी जमीन को मां कहकर उसी से चिपके रहे। इस आस के सहारे की शायद 'दाता' 'अन्नदाता' की दुर्दशा की ओर ध्यान दे।
हाल ही में मोदी सरकार ने अपना तीसरा बजट देश की जनता के सामने रखा। जिसमें बीते करीब 85 बजटों की तरह ही कुछ सपने दिखाए गए। '2022 तक किसानों की आय दोगुनी होगी' जब यह बात अरुण जेटली ने संसद में कही तो तालियों की ग़ड़गड़ाहट से पूरा सदन गूंज उठा लेकिन इस गड़गड़ाहट के पीछे अंधेरे कोने में छुपे किसान का दर्द छुपा रहा गया और दबे रह गए कई सवाल। इन सवाल में सबसे बड़ा सवाल था कि यदि सरकार को अपना यह वादा याद भी रहा और 2022 तक उसकी आय दोगुनी हो भी गई तो उससे होगा क्या2003-2004 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार उस समय भारतीय किसान की प्रतिदिन आय करीब 70.5 रुपये थी यानि मासिक आय करीब 2115 रुपये। जो आज 2016 में 3000 से ज्यादा नहीं है। जिसके हिसाब से सरकार के वादे के अनुसार उसकी आय आज से 6 साल बाद हो जाएगी करीब 6000 रुपये प्रतिमाह यानि 200 रुपये प्रतिदिन। लेकिन उससे होगा क्या? वह अपने परिवार को दो वक्त की रोटी देगा। बच्चों को शिक्षा भी देगा और त्योहारों पर उन्हें नए कपड़े भी दिलाएगा। लेकिन तब भी साहूकारों या बैंकों से कर्ज लेकर ही, जो वो आज भी करता है। तब भी वैसा ही होगा, तो परिवर्तन कहां आया? जो किसान आज आत्महत्या कर रहा है तब भी करेगा। भारत में शायद आत्महत्या, बदहाली, गरीबी ही उसके जीवन का सत्य़ है और नियति भी क्योंकि इस देश में जीवन जीने का अधिकार किसान को कभी मिला ही नहीं।
आज किसानों की इस दशा की जिम्मेदार देश की सरकारें हैं। मैं स्पष्ट कर दूं की मै बात सिर्फ कांग्रेस की ही नहीं कर रहा वह सरकार चाहें मोरारजी देसाई की हो, चंद्रशेखर या अटल जी या नरेंद्र मोदी की किसी ने खेती की बदहाली कि ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया। आपको बता दूं की भारत में कुल 8 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर खेती होती है। जिसमें सिर्फ 28 प्रतिशत भूमि ऐसी है जिसपर सिंचाई के साधन उपलब्ध है बाकि 72 प्रतिशत भूमि आज भी इंद्रदेवता पर निर्भर करती है। खेती की बदहाली और गरीबी के कारण आज का किसान हल छोड़कर छेनी हथोड़ा चलाने के लिए विवश है।
 इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जहां एक धोबीअपने एक गधे के साथ महीना भर काम करने के बाद पांच से 6 हजार रुपये तक तक कमा लेता है। वहां एक किसान अपने चार-पांच पारिवारिक सदस्यों और एक जोड़े बैल के साथ महीना भर पसीना निकालने के बाद भी 3000 या 3200 रुपये से ज्यादा नहीं कमा पाता और इस आय में उसके पूरे परिवार का योगदान होता है। मेरे एक और उदाहरण से शायद आप किसानों की दयनीय स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। किसी महानगर में घरों में बर्तन मांजने और झाड़ू पोंछा करने वाली किसी महिला की आय से भी कम एक किसान परिवार की आय है। शहर में कोई महिला महीने में सिर्फ 60-90 घंटे काम करके 7 से 8 हजार रुपये मासिक कमा लेती हैऔर एक किसान परिवार पूरे महीने दिन-रात काम करने के बावजूद 3200 रुपये भी मुश्किल से कमा पाता है। इससे बड़ा दुर्भाग्य हमारे लिए और क्या हो सकता हैयह देश विकास के पथ पर कैसे आगे बढ सकता है जब उसका अन्नदाता ही भूखा है। 





शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

देश के लिए नासूर बन चुका है आईएसआईएस!

बात कुछ महीनों पहले कश्मीर घाटी में झंडे फहराने के साथ शुरु हुई थी। वो भी खास शुक्रवार के दिन नवाज पढने के बाद से। जिसमें कुछ घाटी के नौजवानों को काले झंडे लिए उद्दंड मचाते देखा गया था। जिसे सरकार ने नज़र अंदाज कर दिया। लेकिन यह सिलसिला कुछ यूं चला की घाटी में हर शुक्रवार ऐसे दर्शय आम हो गए। जिस बात का मैं जिक्र कर रहा हूं शायद इतने से आप उसे समझ गए होंगे क्योंकि देश में कश्मीर से होते हुए आईएसआईएस का खतरा दिनोंदिन कदम बढाता देश की दहलीज के एक कदम अंदर तक आ चुका है और अब उससे मुंह मोडा या इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। आईएस के निशान जो कल तक सिर्फ कश्मीर घाटी तक नज़र आ रहे थे अब एक-एक कर देश के करीब 13 राज्यों में दिखने लगे हैं। शायद इसी कारण कल तक जो इलैक्ट्रानिक न्यूज चेनल जिस आईएसआईएस को सिर्फ कुछ खास शोज में चला रहे थे अब वह प्राइम टाइम में भी जगह पाने लगा हैं।


हालात कुछ इस कदर खराब हो चले हैं कि देश की जो खुफिया एजेंसी आईसिस को आसानी से रोकने का दम भर रही थी उसकी हवा भी फुग्गे की तरह निकल गई है और शायद मोदी सरकार को भी इस बात का इल्म हो चला है कि अब सिर्फ नेटवर्क को तोड़ने या खुफिया एजेंसी से नज़र रखने से काम नहीं चलने वाला, शायद इसीलिए देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह मौलाना और मौलवियों से भी मदद मांगने में गुरेज़ नहीं कर रहे क्योंकि हकीकत में उन्हें उनके सिवा और कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। केंद्र सरकार के होश उड़ने का एक बड़ा कारण आईएस का वो वीडियो भी है जिसमें दो हिंदुस्तानी सीरिया में ट्रेनिंग लेते दिख रहें हैं और बगदादी ने यह दावा भी किया है कि ऐसे कई और भारतीय नौजवान हैं जो उसके लिए सीरिया में लड़ रहे हैं और लड़ने को तैयार बैठे हैं।
यानि देश के लिए आईसिस अब खतरे के निशान से ऊपर पहुंच चुका है। इस बात की पुष्टि पिछले कुछ महीनों में देश के तमाम राज्यों से पकड़े गए ऐसे नौजवान करते हैं जो आईएस में शामिल होने की फिराक में थे। इसमें सबसे ज्यादा चिंता की बात है कि इन नौजवानों में एक महिला भी शामिल है जिसकी उम्र करीब 26 साल बताई जा रही है। यानि कल तक जिस आईएसआईएस का प्रभाव विदेशी महिलाओं तक सीमित था वह अब भारत में भी दिखने लगा है। गंभीर मसला यह भी है कि पिछले दिनों हैदराबाद से जिस लड़के को आईसिस से संपर्क साधने के कारण गिरफ्तार किया गया था उसके स्कूल रिकॉर्ड के हिसाब से उसकी उम्र सिर्फ 16 साल थी और वह सीधे बगदादी के संपर्क में था और तो और अभी तक जितने लोगों को आईएस में जाना से रोका गया है उसमें निचले वर्ग से लेकर उच्च मध्यम वर्ग तक के लोग शामिल हैं। यानि नौजवान महिला-पुरुष, नाबालिग, गरीब-अमीर लगभग सभी तक आईएसआईएस पहुंच चुका है।
लेकिन यहां सवाल यह खड़ा होता है की आखिर देश के लिए गंभीर खतरा बन चुके आईएस को इतना अंदर तक घुसने देने की जिम्मेदारी बनती किसकी है
? सीधे तौर पर सरकार की। सरकार की आईएस को लेकर बेपरवाही इसका सबसे बड़ा कारण है क्योंकि 4 महीने पहले भी जब राजनाथ सिंह से आईएस के खतरे को लेकर मीडिया ने सवाल किया था तब इसे उन्होंने हवाहवाई बातों में उड़ा दिया था। अब दवा न लगाने के कारण आईएस देश के लिए नासूर हो चला है और देश को दर्द देने के लिए तैयार है। अगर सरकार ने इसे लेकर कोई कड़े कदम नहीं उठाए तो बहुत जल्द आईएस के निशान दिल्ली और फिर संसद भवन तक नज़र आने लगेंगे। जहां से उसे रोकना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

कठिन है डगर मंजिल की


कठिन है डगर मंजिल की
थकने लगा हूं चलते-चलते
छाले भी रो पड़े हैं अब
मेरे दामन में जो थे लिखे

कैसे रखूं संघर्ष को ज़ारी
अब हंसने लगी है दुनिया सारी
समझने लगी हैं बेगैरत मुझको
मेरे दामन की खुशियां सारी

पर लड़ना मुझको
यह संघर्ष है जीवन मेरा
पत्थरों पर लिखा है नसीब
लिखने वाले ने मेरा

पर हां,
इस दौर में दिखने लगे हैं
दुनिया के खेले
कुछ हसीन है इसमें, तो कुछ हैं मटमैले

डगर है कठिन मंजिल की
पर छूना है, आसमां मुझको
आशाएं कई है
मेरे नन्हें से जीवन की

शायद है एक वजह यही
दौड़ पड़ता हूं
उम्मीद की किरण दिखें
चाहें कहीं


पर सफर धुंधला रहा है
मेरी आंखों से कहीं
शायद डगर कठिन है मेरी
सोच से ज्यादा कहीं

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

अपनी चालों में फंसती कांग्रेस


संसद के चालू सत्र में विपक्ष का रुख कुछ ऐसा नजर आता है जैसे वह ठान कर बैठा है कि सत्ता दल जिस रास्ते पर देश को लेकर जाएगा वह उसके विरुध्द ही देश को खीचेगा। चाहें वह रास्ता सही हो या गलत। संसद के पिछले दो सदनों में भी विपक्ष का रुख कुछ ऐसा ही था। पिछली बार ललित मोदी और व्यापम घोटाले की आग में सदन की कार्रवाई जलकर खाक हो गई थी तो इस बार असहिष्णुता के बेजा बवाल में समय निकलता जा रहा है। इन परिस्तिथियों में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का यह डर भी बढ रहा है कि कहीं भूमि अधिग्रहण की तरह ही जीएसटी बिल भी विवाद की भेंट न चढ जाए। हाल ही में मोदी के सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को चाय पर बुलाने की घटना को हम भाजपा की जीएसटी बिल को पास कराने की प्रतिबध्दता के रूप में देखें तो गलत नही होगा। मोदी जी का यह रुख इस बात को दर्शाता है कि वह ठप पड़े देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए जहर के प्याले भी पीने को तैयार हैं। लेकिन इस मामले में राहुल गांधी की प्रतिक्रिया पर हैरानी भी होती है और हंसी भी आती है। चाय पर चर्चा के बुलावे को राहुल ने  जनता के दबाव किया फैसला बताया है। लेकिन राहुल को यह बताना जरूरी है कि यह कौन सी जनता है जिसने उन्हें 44 सीटें दी हैं या वह जिसने उसे 44 सीटों पर सीमित कर दिया। सवाल यह भी गहरा गया है कि क्या अतीत में संसद तभी चली है जब पीएम ने विपक्षी नेताओं को चाय पर बुलाया है? पता नहीं कांग्रेस जीएसटी पर हां भरेगी या नहीं? लेकिन कांग्रेस के रवैये से यह जरूर स्पष्ट है कि मोदी सरकार को वही करना चाहिए जैसा वह चाह रही है और राहुल तो चाहते हैं कि सरकार उनके आगे नतमस्तक हो जाए।
   
   खैर यह सब तो 2019 तक चलता ही रहेगा लेकिन कांग्रेस के जीएसटी विरोधी रुख को लेकर यह सवाल बहुत बड़ा है कि आखिर वह अपने ही बिल के विरोध में क्यों खड़ी है? आखिर पहली बार 2006-07 में कांग्रेस ने ही तो जीएसटी का मुद्दा उठाया था और उसके बाद 2014 में वह खुद उसे लेकर आई थी। लेकिन अब जिस तरह से कांग्रेस इस बिल पर सत्ता दल का विरोध कर रही है उससे यह बात स्पष्ट है कि उसे डर सता रहा है कि यदि यह बिल अस्तित्व में आया और देश को उम्मीद के मुताबिक इससे लाभ पहुंचा तो कांग्रेस की हालत 2019 के लोकसभा चुनाव में भी इन चुनावों जैसी ही होगी।
   
   इस समय मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौता है संसद के इसी सत्र में बिल को पास कराना क्योंकि यदि 2016 की शुरुआत में ही जीएसटी देश में लागू नहीं हुआ तो विदेशी निवेश के माहौल को गहरा छटका लगेगा। जिसका जिक्र मूडीज ने भी अपनी एक रिपोर्ट में किया है। लेकिन कांग्रेस के अड़ियल रवैये से लगता है कि उसे इस बात से कोई फ्रक नहीं पड़ता। उसे तो बस विपक्ष के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी है। फिलहाल कांग्रेस ने जीएसटी को समर्थन देने के लिए अपनी तीन शर्त रखी हैं। सबसे पहली है जीएसटी की सीमा तय की जाए जो कांग्रेस 18 फीसदी रखना चाहती है लेकिन यदि यह शर्त मान ली जाती है और बिल पास हो जाता है तो भविष्य में सरकार को जीएसटी की सीमा बढाने या घटाने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी जिसके न मिलने पर इसे बदला नहीं जा सकेगा। हाल के हालातों में देश व राज्य की स्थिति को देखते हुए करों को सरकार तीव्रता से बदल देती है जिससे अक्सर राजस्व को गंभीर नुकसान होने से बच जाता है लेकिन सीमा तय करने की सूरत में इससे बचा नहीं जा सकेगा और सरकार कर के मामले में छोटी सी भी तबदीली करने के लिए विपक्ष की मुंह देखा हो जाएगी। कांग्रेस की दूसरी शर्त है राज्यों के साथ विवाद होने पर जीएसटी समीति के मौजूदा सदस्यों में से 75 फीसदी की मंजूरी और तीसरी उत्पादक राज्यों से किसी भी प्रकार की खरीद पर राज्य को एक फीसदी अधिक टैक्स अदा करने की। यहां उल्लेखनीय है कि कांग्रेस जिन तीन मांगों पर अड़ी है वह उसके द्वारा लाए गए 2014 के बिल में नहीं थी। जब उस समय इनकी जरुरत नहीं थी तो अब ऐसी क्या आफ्त है कि इसके बिना यह बिल देश को नुकसान पहुंचा देगा। हकीकत में कांग्रेस की इन तीन शर्तों का कारण है उसका अबतक का बेवजह का विरोध। जिसके कारण कांग्रेस इस बिल पर चर्चा से भागती रही है और हकीकत में उसने जनता को इसका कोई ठोस कारण भी नहीं दिया है लेकिन जिस तरह से हर हाल में भाजपा बिल पर चर्चा करना चाहती है उससे कांग्रेस घबरा गई है और अपनी ही चालों में फंसने लगी है तथा इस तरह की बचकानी मांगे सामने रख रही है। इसीलिए कांग्रेस सदन में असहिष्णता का मुद्दा उठाकर सदन के समय को बर्बाद करना चाहती है।  
   
   हालांकि भाजपा की भी इसे नाकामी ही कहा जाएगा की भूमि अधिग्रहण की तरह ही वह जनता को इस बिल के बारे में देश को नहीं समझा सकी। जिसके कारण जनता में अभी असमंजस का माहौल है। उसे देश को यह बताना जरूरी है कि जीएसटी क्या हैइससे किस तरह देश को फायदा होगा और घोटालों पर लगाम लगेगी? किस तरह इस बिल के पास होने से नुकसान तो होगा लेकिन उनका जो टैक्स की चोरी करते हैं। 

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

मुद्दों से भटकता भारत

असहिष्णुता आज ऐसा शब्द बन गया है जिससे देश में शायद ही कोई अपरिचित हो। फेसबुक वैल पर किसी न्यूज वेबसाइट की खबर लगी हो और उसमें इस शब्द का इस्तेमाल हो तो मिनटों में हजारों व्यूज उस खबर को मिल जाते हैं।  नेता, अभिनेता, फिल्मकार, समाजसेवी आज सभी की जुबान पर यह शब्द है। यह मुद्दा अखलाक की मौत के बाद उठा था। उम्मीद के मुताबिक लगता था कि बिहार चुनावों के बाद शायद असहिष्णुता का मुद्दा फीका पड़ जाए पर ऐसा नहीं हुआ। फिलहाल आसार ऐसे हैं की संसद का शीतकालीन सत्र भी इसी असहिष्णुता की भेंट चढ सकता है। इन परिस्तिथियों को देखकर ऐसा लगता है जैसे इसके अलावा देश में और कोई समस्या है ही नहीं। बढती असहिष्णुता के कारण देश में आग लगने वाली है और सभी ने बीड़ा उठाया है देश को बचाने का। लेकिन फिर भी देश बच नहीं पा रहा। वैसे भी यह हमारे देश की खासियत है कि जिस मामले को सुलझाने में पूरा देश लग जाता है वह कभी सुलझता ही नहीं और आखिर में तंग आकर सभी किसी और मुद्दे को पकड़ लेते हैं और लग जाते है देश को उससे निजात दिलाने में।
भारत में वर्ष 2000 के करीब बच्चों के अधिकारों का मुद्दा भी बहुत जोर शोर से उछला था। इसी वर्ष भारत सरकार द्वारा किशोर न्याय अधिनियम भी लाया गया था। जो भारत के बाकी कानूनों की तरह ही बहुत प्रगतिशील कानून था। इसके तहत अठारह वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे के साथ व्यस्कों की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता है। इस कानून के दूसरे हिस्से में  अत्यंत गरीब परिवारों के, अनाथ या छोड़े गए बच्चों के संरक्षण की व्यवस्था भी की गई। 2007 में केंद्र सरकार ने किशोर न्याय अधिनियम को मजबूती से लागू करवाने के लिए समेकित बाल संरक्षण योजना बनाई। इस अधिनियम के अनुसार देश के प्रत्येक जिले में एक बाल गृह, एक आश्रय गृह, एक देखरेख गृह, एक विशेष गृह बनाने के आदेश दिए गए। इन आश्रय गृहों और बाल गृहों में जरूरतमंद बच्चों को रखा जाता है। भारत ही नहीं कई और देशों में भी बच्चों व उनके भविष्य से जुड़े कई कानून लागू है जिनका पालन सख्ती से किया जाता है। लेकिन भारत में बने बाकी कानूनों और नीतियों की तरह ही यह कानून भी सिर्फ पन्नों में दर्ज है। गांव की बात तो बहुत दूर है देश के महानगरों में हजारों बच्चे भूखे पेट सोते हैं। 2012 में सेव दा चिल्ड्रन नामक एक संगठन द्वारा पेश जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक देश में प्रतिदिन करीब 24 फीसदी बच्चे भूखे पेट सो जाते हैं। इस भूख को मिटाने के लिए उन्हें अपने बचपन को छोड़ व्यस्क बन काम करना पड़ता है। वो भी होटलों पर झूठे बर्तन धोने का या फिर शहरों में भीख मांगने वाले गिरोहों में सड़कों पर भीख मांगने का। देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधानपालिकाओं के सामने चाय की दुकानों, होटलों तथा सड़कों पर भींख मांगते कई बच्चे आपको दिख जाएंगे जिन्हें देख अक्सर लोगों को उनपर दया आ जाती है। लेकिन लोकतंत्र के किसी भी अंग को न तो इन मासमों का दर्द दिखाई देता है और न ही किशोर न्याय अधिनियम कानून की याद आती है। यहां तक की बच्चों की देखभाल के नाम पर लाखों की डोनेशन लेने वाले एनजीओ भी इनकी ओर ध्यान नहीं देता। सोचने वाली बात है कि फिलहाल असहिष्णुता को सबसे बड़ा मुद्दा मानने वाला देश वैश्विक भूख सूचकांक के 81 देशों की सूची में 67वां स्थान रखता है। लेकिन यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं। इसीलिए इसपर किसी को बात करने का समय नहीं है। वैसे भी देश हाईटैक हो रहा है बच्चों के भविष्य को संवारने की अब क्या जरूरत।
खैर यह तो बात हुई उन बच्चों की जो बिल्कुल लाचार है जिनके पास व्यव्स्था की अनदेखी के कारण और छोटी उम्र में काम करने के अलावा और कोई चारा ही नहीं है। देश में गरीब और अनाथ बच्चों का एक वर्ग ऐसा भी है जिनकी ओर शायद आजतक कभी किसी का ध्यान ही नहीं दिया गया। एक ऐसी वर्ग जिसकी उम्र 16 या 17 वर्ष है जो दसवीं या बारहवीं कक्षाओं तक पढा है। वह घर के खराब हालातों तथा अन्य कई वजहों के कारण पढाई छोड़ काम करने को मजबूर है लेकिन नाबालिग होने और देश की लचर शिक्षा व्यवस्था के कारण उन्हें कहीं कोई ढंग का काम नहीं मिल पाता। वह लगातार मानसिक तनाव से गुजरते रहते हैं क्योंकि एक ओर जहां इन्हें अपने भविष्य की चिंता होता है वहीं परिवार को पालने का दायित्व इनके छोटे कंधों पर आ पड़ता है और कम उम्र व स्कूल में स्किल डेवेलोपमेंट को लेकर किसी प्रकार की पढाई न होने के कारण यह लगातार पिछड़ते रहते हैं तथा अपना आत्मविश्वास खो बैठते हैं। देश में इसके जैसी ही गरीबी, हर साल बढती किसान आत्महत्या दर, महिला उत्पीड़न, बेरोजगारी और न जाने कितने मसले हैं जो सालों से सुलझने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन बुध्दिजीवी वर्ग, तंत्र और विपक्ष को उनकी सुध लेने का समय ही नहीं है उन्हें तो देश में बढती असहिष्णुता को रोकना है और खुद को चमकाना है। फिलहाल सवाल तो कई हैं लेकिन सबसे महत्तवपूर्ण यह है कि कब तक राजनीति और निजी स्वार्थ को साधने के लिए इस प्रकार के कृत्य होते रहेंगे? और बिना सिर पैर के मुद्दों पर देश में बवाल उठता रहेगा? आखिर कब तक असल मुद्दों को भूल देश का माहौल बिगाड़ने वाले मुद्दे प्रमुख होते रहेंगे?
 

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

बिहार चुनाव और विकास की बात


चुनाव लोकतंत्र की सबसे महत्तवपूर्ण इकाई है क्योंकि यह किसी भी देश की जनता को अपना प्रतिनिधि चुनने की ताकत देता है। वह प्रतिनिधि जो उस देश व उसके निवासियों के विकास में सबसे महत्तवपूर्ण किरदार निभाता है। अपनी नीतियों व एजेंडों से विकास के नए कीर्तिमान गढता है। ऐसे में अहम प्रश्न यह उठता है कि लोग अपने प्रतिनिधि को कैसे चुने। कैसे हजारों चहरों की भीड़ में वह उस चेहरे की पहचान करें, जो उनके भविष्य को विकास की ओर की अग्रसर करेगा। आमतौर पर नेताओं के इतिहास व उनके वादों को ध्यान में रखकर चुनावों में लोग वोट डालते हैं। भई, तर्क तो यही कहता है। लेकिन यदि भारत के संदर्भ में बात करें तो यह स्थिति कुछ अटपटी है। क्योंकि यहां विकास के नाम पर वोट कम और जाति के नाम पर ज्यादा डाले जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि विकास का मुद्दा चुनावों में उठता ही नहीं है। लेकिन जाति के नारे के सामने विकास की बातें अक्सर बोनी रह जाती हैं। यदि इस मसले पर हम बात बिहार चुनावों के संदर्भ में करें तो विकास का मुद्दे जैसे अपनी जान बचाकर कहीं छुप कर बैठ गया है और बाहर आने तो तैयार ही नहीं।
बिहार चुनावों की शुरुआत तो विकास के नाम पर ही हुई थी लेकिन बातें कैसे जाति, धर्म, गौमांस, तांत्रिक बाबा, ब्रह्मपिशाच, नरभक्षी आदि पर आकर सिमट गयी इस बात को एक बार में बताना काफी मुश्किल है और यदि सिलसिलेवार तरीके से सब बताया जाए तो वक्त बहुत निकल जाएगा। तो सीधा मुद्दे पर आते हैं। आखिर बिहार में विकास का मुद्दा क्यों गायब हो गया। इसके दो कारण हो सकते हैं या तो आजादी के बाद से बिहार में नेता इतने वादे कर चुके हैं कि अब नया कहने को कुछ बचा नही है या फिर महागठबंधन के घटक दल और भाजपा सरकार दोनों ही अपनी नाकामियाबियों का उल्लेख करना नहीं चाहते।
बिहार में नीतीश दो बार सत्ता का स्वाद चख चुके है। लालू भी कुछ वक्त खुद तो कुछ वक्त राबड़ी देवी के द्वारा बिहार की कुर्सी पर काबिज हो चुके हैं और कांग्रेस की तो खैर बिहार में पूरी एक पीढी निकल गई। भाजपा भी पांच साल नीतीश के सहारे बिहार में राज जमा चुकी है। सब सुशासन की दुहाई देकर सत्ता में आए और बिहार में विकास का दावा ठोका लेकिन इस विकास की हकीकत क्या है?  इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के सकल घरेलु उत्पाद में 2001 से 2010 तक बिहार का योगदान 2.1 प्रतिशत था जो आज पांच साल बाद भी इतना ही है। यानि कि पिछले पंद्रह सालों में बिहार में उत्पाद बढा ही नहीं।  प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी बिहार सबसे पीछे है। बिहार के कुछ जिलों में तो प्रति व्यक्ति मासिक आय आज भी 750 रुपये है।  2011 की जनगणना के मुताबिक बिहार में कुल 36 फीसदी लोग साक्षर हैं। जबकि भारत की कुल साक्षरता दर 74 प्रतिशत है। बिहार में सरकारी और गैर सरकारी महाविद्यालयों की संख्या मात्र 665 है। जिसमें जहां 10 महाविद्यालय तकनीकी अभियंत्रण के हैं तो वहीं मेडिकल कॉलिज की संख्या और भी कम है। यानि बिहार शिक्षा के मामले अभी कहीं पीछे है।
देश की जनसंख्या में बिहार की हिस्सेदारी 8.6 फीसदी है लेकिन देश में कुल हिंसापूर्ण अपराध में उसका योगदान 10 फीसदी है। 2011-12 में बिहार के सकल घरेलु उत्पादन में औद्योगिक उत्पादन का योगदान 19.9 प्रतिशत था जो की 2014 में घटकर 18.4 प्रतिशत हो गया। 2006 से 07 के बीच में बिहार में एक लाख 63 हजार छोटे व बड़े औद्योगिक इकाइयां थी बीते दस सालों में इसमें मात्र 35000 इकाइयां और बढी है यानि औद्योगिक इकाइयो में वृध्दि मात्र 2.5 प्रतिशत से भी कम है। ऐसे में बिहार का सारा दारोमदार खेती पर आ पडता है लेकिन उस ओर भी किसी सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। विशेषकर नीतीश के शासन में जिसके कारण नीतीश के शासन काल में न तो खेतिहर भूमि में कोई वृध्दि हुई और न ही उत्पादन में।
विदेशी पूंजी निवेश के मामले में बिहार की तुलना यदि उत्तर प्रदेश से भी की जाए तो वह उससे भी काफी पीछे है। 2014 में जहां उत्तरप्रदेश को 37 विदेशी पूंजी निवेश के आवेदन मिले तो बिहार को मात्र 7 मिले। बिजली मुहैया कराने के मामले में भी बिहार कहीं नहीं टिकता। खैर इन सब में बिहार चाहे पीछे हो लेकिन दशकीय जनसंख्या वृध्दि में बिहार काफी आगे है। जहां राष्ट्रीय जनसंख्या वृध्दि दर 17.6 प्रतिशत है वहीं बिहार की जनसंख्या वृध्दि दर 25.1 प्रतिशत की रफ्तार से आगे बढ रही है। ऐसे में यदि बिहार की जनता को पिछले कुछ दिनों में कुछ मिला है तो वह हैं सड़कें। 2013 में बिहार मे कुल 1 लाख 80 हजार किलोमीटर की पक्की सड़क थी। जो 2014 में बढकर 2 लाख 25 हजार किलोमीटर हो गई। यानि एक साल से भी कम वर्ष में 45,000 किलोमीटर पक्की सड़क।

इन सभी आंकड़ों को देखकर यहां सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इस तरह की बदतर औसत बिहार की बदहाली के लिए जिम्मदार नहीं है? क्या बिहार की जनता को यह जानने का हक नहीं है कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्या बिहार की जनता नहीं चाहती की बिहार में भी विकास की बातें हों? बिहार भी खुशहाल राज्य बने। लेकिन कहते है न की राजनेता अक्सर जनता को वही बताते और दिखाते हैं जो वह चाहते हैं। बिहार का चुनाव मात्र अपशब्दों और आरोप – प्रत्यारोपों तक सिमट कर रह गया है। कोई दल विकास की बात करना ही नहीं चाहता।  

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

कृषिप्रधान देश से किसान कब्रगाह में तब्दील होता भारत

देश में 1995 से लेकर अब तक तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके है लेकिन शायद ही किसी ने कृषि क्षेत्र में होते इस मृत्यू तांडव पर चिंता जताई हो। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 में तकरीबन 13,754 और 2013 में 11,772 किसानों ने आत्महत्या की है। भारत में ज्यादातर किसान कर्ज़, फसल की लागत बढ़ने, सिंचाई की सुविधा न होने, कीमतों में कमी और फसल के बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं। इस साल भी किसान मृत्यू दर का आंकड़ा हजारों के आंकड़े को पार कर चुका है। लगातार 12वें साल महाराष्ट्र के किसान आत्महत्या के मामले में अव्वल है। यहां का सूखाग्रस्त विदर्भ क्षेत्र किसानों की कब्रगाह है। अकेले महाराष्ट्र में 1995 से अब तक 60,750 किसान आत्महत्या कर चुके हैं।
देश के अन्नदाता अन्न के लिए मौहताज 
देश डिजिटल हो रहा है। देश की जीडीपी दर बढ रही है साथ ही देश में राजनीतिक असहयोग की दर भी लगातार बढती जा रही है। हालात यह हैं कि भूमि अधिग्रहण बिल पर सरकार के घुटनों को टिकाकर कांग्रेस किसानों की हिमायती होने का दम ठोक रही है और बीजेपी यह रोना लेकर बैठी है कि वह किसानों के लिए विपक्षियों के अड़ियल रवैये के कारण कुछ नहीं कर सकती। लेकिन बिहार चुनावों में कोई दल बेबस नहीं नजर आता है। उसकी रणनीति बनाने को लेकर विपक्षी और सत्ताधारी दलों में मीटिंगों के दौर भी चल पड़े है। चीन में आई मंदी को भारत के लिए एक सुनहरे अवसर के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री ने इससे देश को फायदा पहुंचाने के लिए इंडिया इंक और इकोनॉमिस्ट के साथ मीटिंग भी की है। लेकिन शायद ही किसी को याद हो की खेती की बिगड़ी अर्थव्यव्सथा को लेकर प्रधानमंत्री या किसी अन्य दल ने ऐसी मीटिंग की तो कब की? देश में हर कोई अपना उल्लू सीधे करने में व्यस्त है लेकिन किसानों की चिंता किसी को नहीं है। शायद इसी का नतीजा है की कर्नाटक देश का पहला सूखा राज्य घोषित हो चुका है और महाराष्ट्र में भी सूखे के हालात बनते जा रहे हैं। तेलांगना में भी सूखे से हालात बद से बदतर हो गए हैं। यानि किसानों के सामने जिंदगी का सवाल है लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। देश के बड़े हिस्से में मानसून की बारिश धम चुकी है और शायद सरकार इस बात से अनभिज्ञ भी नहीं होगी कि इस बरस मानसून की बारिश सामान्य के मुकाबले 14 फीसदी कम दर्ज की गई है। स्थिति कितनी गंभीर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की देश के 641 जिलों में से 283 जिलों में मानसून की बारिश 30 से 60 फीसदी तक कम रिकार्ड की गई है। कभी अकाल ओलावृष्टि और बारिश की वजह से किसान मरता है तो कभी सूखे की वजह से, मरता हर बार किसान ही है। लेकिन जैसे किसी को कोई प्रवाह ही नहीं है। 

मराठावाड़ा में चार सालों के सूखे से घुटने टेकता किसान
मराठावाड़ा के दो किसानों का शव
महाराष्ट्र के मराठावाड़ा में पिछले महीने तक करीब 1300 किसानों के आत्महत्या करने के आंकड़े दर्ज किए गए। मराठवाड़ा के औरंगाबाद, जालना, उस्मानाबाद, नांदेड़, परभनी, बीड़, लातूर, हिंगोली में भयंकर सूखे की स्थिति है और हर तरफ से सिर्फ किसानों की चीख पुकार ही सुनने को मिल रही है। हालात यह तब हैं जब इस सूखा का अंदेशा सरकार को पिछले वर्ष सितंबर में ही लग गया था। लेकिन सरकार को हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार चुनावों की तैयारियां भी तो करनी थी, ऐसी में किसानों के लिए उसके पास वक्त ही कहां था। वैसे तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मराठवाड़ा क्षेत्र के तीन दौरे किए और ख़स्ता  हालात में जीवन बिता रहे किसानो से मिलकर सीएम ने उनका हाल भी जाना। लेकिन लच्छेदार भाषण और झूठे  वायदों के अलावा किसानों को और कुछ नहीं दिया। हालांकि महाराष्ट्र के तीन जिलों हिंगोली, ओसमानाबा और लातूर में खाने के कैंप जरूर लगाए गए है क्योंकि सबसे ज्यादा किसानों के मरने की खबर यहीं से आ रही है। उल्लेखनीय है कि मराठावाड़ा में इस वर्ष 52 फीसदी कम बारिश हुई है। यहां के बांधों में कुल 7.6 फीसदी पानी बचा है। इसके प्रमुख 11 बांधों में से 5 का पानी पूरी तरह सूख चुका है। यहां के हालात इतने खराब है कि लोगों को कई किलोमीटर दूर तक पानी के लिए खानाबदोशों की तरह घूमना पड़ता है। 
ऐसा भी नहीं है कि यहां के ऐसे हालात पहली बार बने हैं। 2014, 13 और 12 में भी यहां का नजारा कुछ ऐसा ही था और इस बार की भाजपा सरकार भी पिछली सरकारों की तरह बेबस बस किसानों को ढांढस बंधाने में लगी थी। पूरे मराठावाड़ा के किसान बोतलबंद पानी और टैंकरों पर निर्भर हैं। इस साल अब तक 1,291 टैंकरों की सप्लाई हो चुकी है और पिछले वर्ष करीब 718 टैंकरों की सप्लाई की गई थी। स्थिति यहां यह है कि कुछ इलाकों में तो लोग हफ्ते भर में सिर्फ दो बार ही नहाते हैं। इतने खराब हालात के बाद भी राज्य के कृषि मंत्री एकनाथ खड़से का कहना है की अगले दो हफ्तों तक हालातों की समीक्षा की जाएगी उसके बाद सूखे से प्रभावित गांवों की घोषणा होगी। जिसका मतलब है कि तबतक किसानों के लिए राहत कार्य शुरू नहीं होगा और दिन बा दिन देश का अन्नदाता दम तोड़ता रहेगा।

यहां के भीषण सूखे का कारण

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक रूप से सूखा रहने वाले इस इलाके में बहुत बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है। जो पानी के पीछे मौजूदा संकट का सबसे बड़ा कारण है। मराठावाड़ा में कम से 70 चीनी की मिले हैं। इस इलाके की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से गन्ने की फसल यहां के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। क्योंकि गन्ने की फसल में पानी और सिंचाई की बहुत जरूरत पड़ती है और इस इलाके में सिंचाई की व्यवस्था न के बराबर है। यहां के किसान इस बात से बिल्कुल अनभिज्ञ है। आज यहां का भूमिगत जल बिल्कुल सूख चुका है। जमीन के 40 फीट नीचे तक पानी का कोई पता ठिकाना नहीं है। यहां की करीब 76 तालुकाओं में से 66 का जल भी पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। जिसकी सबसे बड़ी वजह गन्ने की खेती है। यह बहुत जरूरी है कि इस इलाके को बचाने के लिए सरकार जल्द से जल्द कड़े कदम उठाए तथा यहां गन्ने की खेती पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दे। वैसे यहां सूखे की स्थिति साल 2012 से ही बनी हुई है। इस साल भी यहां केवल जून के शुरूआती माह में बारिश हुई थी। इसके बाद इस इलाके में पानी की एक बूंद तक नहीं दिखी। कम बारिश के कारण ही यहां की खरीफ की फसल पूरी तरह नष्ट हो चुकी है और रबी की फसल की भी कोई गारंटी नहीं है। जिसके कारण यहां का किसान पूरी तरह से टूट चुकी हैं। यदि सरकार ने इस और जल्द ध्यान नही दिया तो भविष्य में स्थिति इससे कहीं गंभीर हो सकती है।

पूरे देश में मंडरा रहा कृषि संकट

देश की करीब 60 प्रतिशत जनसंख्या की आजीविका कृषि क्षेत्र पर आधारित है। लेकिन इस क्षेत्र को लेकर सरकार ने अब तक किसी बड़े नीतिगत बदलाव या घोषणा से परहेज ही किया है। कृषि पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। चालू वित्त वर्ष  में कृषि विकास दर सिर्फ़ 1.1 फीसदी रही है। कृषि की दयनीय हालत के बावजूद अपने पहले बजट में मोदी सरकार ने कृषि आय की बात तो की, लेकिन कृषि बजट में कटौती कर दी। बजट में किसानों के  लिए कुछ खास नहीं रहा। सरकार द्वारा जिस कृषि लोन की बात की जाती है, उसका फायदा किसानों से ज्यादा कृषि उद्योग से जुड़े लोगों को होता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पूरे देश में केवल किसान ही एक ऐसा उत्पादक है जो अपने उत्पाद का मुल्य स्वयं निर्धारित नहीं करता। जिसके कारण अन्य उत्पादक तो मुनाफा कमा लेते है लेकिन किसान के लिए उसकी लागत निकालना ही भारी पड़ जाता है और ऊपर से प्रकृति की मार पड़ जाए तो मौत को गले लगाने से ज्यादा सुख उसे और कोई चीज नहीं दे सकती। यहां एक गंभीर समस्या किसानों में बढते असंतोष के रूप में भी पनप रही है। शायद इसीलिए पुलिस और किसान के संघर्ष की घटनाएं भी बढ रही हैं। इस साल अबतक पुलिस और किसानों के बीच करीब 74 घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जो पिछले वर्ष के मुकाबले दुगनी हैं। कहीं न कहीं इस असंतोष का कारण बढने की प्रमुख वजह सरकार की कॉरपोरेट प्राथमिकता नीति भी है। लेकिन यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि डिजिटल इंडिया के सपने दिखाने वाली सरकार के पास प्रकृति की मार से प्रभावित राज्यों के लिए कोई नीति नहीं है। और एक विडंबना यह भी है कि आखिर ऐसी नौबत आती ही क्यों है कि देश के अन्नदाता को हर साल खुद अन्न के लिए मौहताज होना पड़ता है और तंग आकर मौत को गले लगाना पड़ रहा है। जिसकी वजह से यह देश कृषि प्रधान देश की जगह किसानों की कब्रगाह में तबदील होता जा रहा है।