असहिष्णुता आज ऐसा शब्द बन गया है जिससे देश में शायद ही कोई
अपरिचित हो। फेसबुक वैल पर किसी न्यूज वेबसाइट की खबर लगी हो और उसमें इस शब्द का
इस्तेमाल हो तो मिनटों में हजारों व्यूज उस खबर को मिल जाते हैं। नेता, अभिनेता, फिल्मकार, समाजसेवी आज सभी की
जुबान पर यह शब्द है। यह मुद्दा अखलाक की मौत के बाद उठा था। उम्मीद के मुताबिक लगता
था कि बिहार चुनावों के बाद शायद असहिष्णुता का मुद्दा फीका पड़ जाए पर ऐसा नहीं
हुआ। फिलहाल आसार ऐसे हैं की संसद का शीतकालीन सत्र भी इसी असहिष्णुता की भेंट चढ
सकता है। इन परिस्तिथियों को देखकर ऐसा लगता है जैसे इसके अलावा देश में और कोई
समस्या है ही नहीं। बढती असहिष्णुता के कारण देश में आग लगने वाली है और सभी ने
बीड़ा उठाया है देश को बचाने का। लेकिन फिर भी देश बच नहीं पा रहा। वैसे भी यह
हमारे देश की खासियत है कि जिस मामले को सुलझाने में पूरा देश लग जाता है वह कभी
सुलझता ही नहीं और आखिर में तंग आकर सभी किसी और मुद्दे को पकड़ लेते हैं और लग
जाते है देश को उससे निजात दिलाने में।
भारत
में वर्ष 2000 के करीब बच्चों के अधिकारों का मुद्दा भी बहुत जोर शोर से उछला था।
इसी वर्ष भारत सरकार द्वारा किशोर न्याय अधिनियम भी लाया गया था। जो भारत के बाकी
कानूनों की तरह ही बहुत प्रगतिशील कानून था। इसके तहत अठारह वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे के
साथ व्यस्कों की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता है। इस कानून के दूसरे हिस्से में अत्यंत गरीब परिवारों के, अनाथ
या छोड़े गए बच्चों के संरक्षण की व्यवस्था भी की गई। 2007 में
केंद्र सरकार ने किशोर न्याय अधिनियम को मजबूती से लागू करवाने के लिए समेकित बाल
संरक्षण योजना बनाई। इस अधिनियम के अनुसार देश के प्रत्येक जिले में एक बाल गृह, एक
आश्रय गृह, एक देखरेख गृह, एक विशेष गृह बनाने के
आदेश दिए गए। इन आश्रय गृहों और बाल गृहों में जरूरतमंद बच्चों को रखा जाता है। भारत
ही नहीं कई और देशों में भी बच्चों व उनके भविष्य से जुड़े कई कानून लागू है जिनका
पालन सख्ती से किया जाता है। लेकिन भारत में बने बाकी कानूनों और नीतियों की तरह
ही यह कानून भी सिर्फ पन्नों में दर्ज है। गांव की बात तो बहुत दूर है देश के
महानगरों में हजारों बच्चे भूखे पेट सोते हैं। 2012 में सेव दा चिल्ड्रन नामक एक
संगठन द्वारा पेश जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक देश में प्रतिदिन करीब 24 फीसदी
बच्चे भूखे पेट सो जाते हैं। इस भूख को मिटाने के लिए उन्हें अपने बचपन को छोड़
व्यस्क बन काम करना पड़ता है। वो भी होटलों पर झूठे बर्तन धोने का या फिर शहरों
में भीख मांगने वाले गिरोहों में सड़कों पर भीख मांगने का। देश की न्यायपालिका,
कार्यपालिका और विधानपालिकाओं के सामने चाय की दुकानों, होटलों तथा सड़कों पर भींख
मांगते कई बच्चे आपको दिख जाएंगे जिन्हें देख अक्सर लोगों को उनपर दया आ जाती है।
लेकिन लोकतंत्र के किसी भी अंग को न तो इन मासमों का दर्द दिखाई देता है और न ही किशोर न्याय अधिनियम
कानून की याद आती है। यहां तक की
बच्चों की देखभाल के नाम पर लाखों की डोनेशन लेने वाले एनजीओ भी इनकी ओर ध्यान
नहीं देता। सोचने वाली बात है कि फिलहाल असहिष्णुता को सबसे बड़ा मुद्दा मानने वाला
देश वैश्विक भूख सूचकांक के 81 देशों की सूची में 67वां स्थान रखता है।
लेकिन यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं। इसीलिए इसपर किसी को बात करने का समय नहीं
है। वैसे भी देश हाईटैक हो रहा है बच्चों के भविष्य को संवारने की अब क्या जरूरत।
खैर यह तो बात हुई उन बच्चों की जो बिल्कुल लाचार है जिनके पास व्यव्स्था की अनदेखी के कारण और छोटी उम्र में काम करने के अलावा और कोई चारा ही नहीं है। देश में गरीब और अनाथ बच्चों का एक वर्ग ऐसा भी है जिनकी ओर शायद आजतक कभी किसी का ध्यान ही नहीं दिया गया। एक ऐसी वर्ग जिसकी उम्र 16 या 17 वर्ष है जो दसवीं या बारहवीं कक्षाओं तक पढा है। वह घर के खराब हालातों तथा अन्य कई वजहों के कारण पढाई छोड़ काम करने को मजबूर है लेकिन नाबालिग होने और देश की लचर शिक्षा व्यवस्था के कारण उन्हें कहीं कोई ढंग का काम नहीं मिल पाता। वह लगातार मानसिक तनाव से गुजरते रहते हैं क्योंकि एक ओर जहां इन्हें अपने भविष्य की चिंता होता है वहीं परिवार को पालने का दायित्व इनके छोटे कंधों पर आ पड़ता है और कम उम्र व स्कूल में स्किल डेवेलोपमेंट को लेकर किसी प्रकार की पढाई न होने के कारण यह लगातार पिछड़ते रहते हैं तथा अपना आत्मविश्वास खो बैठते हैं। देश में इसके जैसी ही गरीबी, हर साल बढती किसान आत्महत्या दर, महिला उत्पीड़न, बेरोजगारी और न जाने कितने मसले हैं जो सालों से सुलझने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन बुध्दिजीवी वर्ग, तंत्र और विपक्ष को उनकी सुध लेने का समय ही नहीं है उन्हें तो देश में बढती असहिष्णुता को रोकना है और खुद को चमकाना है। फिलहाल सवाल तो कई हैं लेकिन सबसे महत्तवपूर्ण यह है कि कब तक राजनीति और निजी स्वार्थ को साधने के लिए इस प्रकार के कृत्य होते रहेंगे? और बिना सिर पैर के मुद्दों पर देश में बवाल उठता रहेगा? आखिर कब तक असल मुद्दों को भूल देश का माहौल बिगाड़ने वाले मुद्दे प्रमुख होते रहेंगे?
खैर यह तो बात हुई उन बच्चों की जो बिल्कुल लाचार है जिनके पास व्यव्स्था की अनदेखी के कारण और छोटी उम्र में काम करने के अलावा और कोई चारा ही नहीं है। देश में गरीब और अनाथ बच्चों का एक वर्ग ऐसा भी है जिनकी ओर शायद आजतक कभी किसी का ध्यान ही नहीं दिया गया। एक ऐसी वर्ग जिसकी उम्र 16 या 17 वर्ष है जो दसवीं या बारहवीं कक्षाओं तक पढा है। वह घर के खराब हालातों तथा अन्य कई वजहों के कारण पढाई छोड़ काम करने को मजबूर है लेकिन नाबालिग होने और देश की लचर शिक्षा व्यवस्था के कारण उन्हें कहीं कोई ढंग का काम नहीं मिल पाता। वह लगातार मानसिक तनाव से गुजरते रहते हैं क्योंकि एक ओर जहां इन्हें अपने भविष्य की चिंता होता है वहीं परिवार को पालने का दायित्व इनके छोटे कंधों पर आ पड़ता है और कम उम्र व स्कूल में स्किल डेवेलोपमेंट को लेकर किसी प्रकार की पढाई न होने के कारण यह लगातार पिछड़ते रहते हैं तथा अपना आत्मविश्वास खो बैठते हैं। देश में इसके जैसी ही गरीबी, हर साल बढती किसान आत्महत्या दर, महिला उत्पीड़न, बेरोजगारी और न जाने कितने मसले हैं जो सालों से सुलझने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन बुध्दिजीवी वर्ग, तंत्र और विपक्ष को उनकी सुध लेने का समय ही नहीं है उन्हें तो देश में बढती असहिष्णुता को रोकना है और खुद को चमकाना है। फिलहाल सवाल तो कई हैं लेकिन सबसे महत्तवपूर्ण यह है कि कब तक राजनीति और निजी स्वार्थ को साधने के लिए इस प्रकार के कृत्य होते रहेंगे? और बिना सिर पैर के मुद्दों पर देश में बवाल उठता रहेगा? आखिर कब तक असल मुद्दों को भूल देश का माहौल बिगाड़ने वाले मुद्दे प्रमुख होते रहेंगे?