देश
आजाद होने के 9 साल बाद फिल्म आई थी 'मदर इंडिया'। वैसे तो यह फिल्म एक मां पर आधारित थी लेकिन
इसमें आजाद भारत के उस किसान की दुर्दशा का सटीक चित्रण किया गया था जो आजादी के 9
साल बाद भी गुलाम ही था। जुल्म उसपर तब भी उसी तरह ढाये जा रहे थे जैसे 1947 से
पहले। बस फर्क इतना था कि जुल्म करने वाले हाथ गौरे नहीं काले थे। उस समय का किसान
साहुकारों और जमीनदारों के पैरों तले दम तोड़ रहा था। आमदनी के नाम पर अगर उसे पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी भी मयस्सर हो
जाए तो गनीमत थी। वो जीवन काट रहा था तो इस उम्मीद के सहारे की बदलते भारत के साथ
उसकी दशा भी बदलेगी।
वक्त
बदला, चहरे बदले, कमान
एक पीढी से दूसरी पीढी ने संभाली, सत्ता
में भी परिवर्तन आया, जय
किसान के नारे दिए गए, हर
चुनाव में, बजट
में किसानों की बात की गई। परिवर्तन कि बियार चली लेकिन वक्त दर वक्त किसान के
हालात शायद देश में इस स्तर तक गिर चुके थे कि बदलाव उसतक कभी पहुंच ही नहीं सकी।
कुछ जिनकी उम्मीद टूट चुकी थी उन्होंने आत्महत्या से हाथ मिलाया तो कुछ ने शहरों
की राह पकड़ ली तो कुछ अपनी जमीन को मां कहकर उसी से चिपके रहे। इस आस के सहारे की
शायद 'दाता' 'अन्नदाता' की दुर्दशा की ओर ध्यान
दे।
हाल
ही में मोदी सरकार ने अपना तीसरा बजट देश की जनता के सामने रखा। जिसमें बीते करीब
85 बजटों की तरह ही कुछ सपने दिखाए गए। '2022
तक किसानों की आय दोगुनी होगी' जब यह बात अरुण जेटली ने
संसद में कही तो तालियों की ग़ड़गड़ाहट से पूरा सदन गूंज उठा लेकिन इस गड़गड़ाहट
के पीछे अंधेरे कोने में छुपे किसान का दर्द छुपा रहा गया और दबे रह गए कई सवाल।
इन सवाल में सबसे बड़ा सवाल था कि यदि सरकार को अपना यह वादा याद भी रहा और 2022
तक उसकी आय दोगुनी हो भी गई तो उससे होगा क्या? 2003-2004
में आई एक रिपोर्ट के अनुसार उस समय भारतीय किसान की प्रतिदिन आय करीब 70.5 रुपये
थी यानि मासिक आय करीब 2115 रुपये। जो आज 2016 में 3000 से ज्यादा नहीं है। जिसके
हिसाब से सरकार के वादे के अनुसार उसकी आय आज से 6 साल बाद हो जाएगी करीब 6000
रुपये प्रतिमाह यानि 200 रुपये प्रतिदिन। लेकिन उससे होगा क्या? वह अपने परिवार को दो वक्त की रोटी देगा। बच्चों को शिक्षा भी देगा और
त्योहारों पर उन्हें नए कपड़े भी दिलाएगा। लेकिन तब भी साहूकारों या बैंकों से
कर्ज लेकर ही, जो वो आज भी करता है। तब भी वैसा ही होगा,
तो परिवर्तन कहां आया? जो किसान आज आत्महत्या कर
रहा है तब भी करेगा। भारत में शायद आत्महत्या, बदहाली, गरीबी
ही उसके जीवन का सत्य़ है और नियति भी क्योंकि इस देश में जीवन जीने का अधिकार किसान को कभी मिला ही नहीं।
आज
किसानों की इस दशा की जिम्मेदार देश की सरकारें हैं। मैं स्पष्ट कर दूं की मै बात
सिर्फ कांग्रेस की ही नहीं कर रहा वह सरकार चाहें मोरारजी देसाई की हो, चंद्रशेखर या अटल जी या नरेंद्र मोदी की किसी ने खेती की बदहाली कि ओर कभी
ध्यान ही नहीं दिया। आपको बता दूं की भारत में कुल 8 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर खेती
होती है। जिसमें सिर्फ 28 प्रतिशत भूमि ऐसी है जिसपर सिंचाई के साधन उपलब्ध है
बाकि 72 प्रतिशत भूमि आज भी इंद्रदेवता पर निर्भर करती है। खेती की बदहाली और
गरीबी के कारण आज का किसान हल छोड़कर छेनी हथोड़ा चलाने के लिए विवश है।
इसे
देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जहां एक धोबी, अपने
एक गधे के साथ महीना भर काम करने के बाद पांच से 6 हजार रुपये तक तक कमा लेता है।
वहां एक किसान अपने चार-पांच पारिवारिक सदस्यों और एक जोड़े बैल के साथ महीना भर
पसीना निकालने के बाद भी 3000 या 3200 रुपये से ज्यादा नहीं कमा पाता और इस आय में
उसके पूरे परिवार का योगदान होता है। मेरे एक और उदाहरण से शायद आप किसानों की
दयनीय स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। किसी महानगर में घरों में बर्तन मांजने और
झाड़ू पोंछा करने वाली किसी महिला की आय से भी कम एक किसान परिवार की आय है। शहर
में कोई महिला महीने में सिर्फ 60-90 घंटे
काम करके 7 से 8 हजार रुपये मासिक कमा लेती है, और एक किसान परिवार पूरे
महीने दिन-रात काम करने के बावजूद 3200 रुपये
भी मुश्किल से कमा पाता है। इससे बड़ा दुर्भाग्य हमारे लिए और क्या हो सकता है? यह
देश विकास के पथ पर कैसे आगे बढ सकता है जब उसका अन्नदाता ही भूखा है।


