शुक्रवार, 10 जून 2016

गांव में उड़ती मौत की राख !

छोटू राम थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली राख से पूरा गांव प्रभावित है। किसी को दमा है, किसी की आंखें चली गईं तो कोई चर्म रोग से पीड़ित है लेकिन गरीबी के दंश और थर्मल प्लांट के श्राप के साथ यहां के लोग जीने को मजबूर हैं।

 आज विकास का  उद्देश्य मानव जीवन को सरल बनाना है जबकि पहले इसका अर्थ बौद्धिकता से था लेकिन 20वीं शताब्दी के शुरुआत से ही इसके मायने बदल गए और दुनिया विकास के लिए आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौड़ पड़ी। पिछली शताब्दी के आखिरी दशकों में भारत भी इस दौड़ का हिस्सा हो गया और देखते ही देखते विकासशील देशों में शामिल हो गया। लेकिन आज भारत सहित दुनिया के कई देश हैं जहां विकास के नाम पर लोगों के जीवन से खेला जा रहा है। एक ऐसा ही गांव हरियाणा स्थित लापरा भी है।  जो यमुना नगर से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां की जिंदगियों के साथ पिछले 8 सालों से खिलवाड़ हो रहा है लेकिन ना तो राज्य सरकार को इनसे कोई लेना देना है और ना ही केंद्र को। दरअसल बिजली आपूर्ति की मांग पूरी करने के लिए लापरा गांव में बना दीन बंधू छोटू राम थर्मल पावर प्लांट स्थानीय लोगों के लिए मुसीबत बना हुआ है। थर्मल से उडऩे वाली राख से गांव छोटा लापरा के लोग बीमारियों की चपेट में आ गए हैं। थर्मल पावर प्लांट से उड़ने वाली राख यहां मौत बनकर घूम रही है। लापरा गांव के लोग मर-मरकर अपनी जिंदगी काट रहे हैं। गांव में सांस व एलर्जी के मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है।

ना नौकरी मिली ना रोशनी राख फांकने को मजबूर लोग
दीन बंधु छोटू राम विद्युत प्लांट लापरा गांव से सटे 1100 एकड़ भूमि पर स्थित है। इसकी शुरुआत 2008 में हुई थी। इस प्लांट को शुरु करने के लिए दर्जनों गांवों के ग्रामीणों की कृषि योग्य भूमि हमेशा के लिए अधिग्रहित कर ली गई थी। जिसके साथ ही प्रशासन व प्लांट मालिकों द्वारा गांव के लोगों से यह वादा किया गया था कि प्लांट के शुरु होने पर गांव को 24 घंटे बिजली व लोगों को नौकरी मिलेगी। इसके साथ ही गांव विकास की ओर बढेगा लेकिन 8 साल बाद गांव में जहां आज भी पहले की तरह अंधेरा है वहीं ग्रामीण या तो किसानी पर निर्भर हैं या गांव से बाहर जाकर नौकरियां करते हैं। हालांकि कुछ ग्रामीणों को प्लांट द्वारा नौकरी दी गई है लेकिन इनकी संख्या न के बराबर है।
विकास के बजाय इस गांवों के लोग आंखें और अपना स्वास्थ्य खो रहे हैं। लापरा गांवों के लोगों में बड़ी मात्रा में दमा, चर्मरोग, नेत्र संबंधी व फेफड़े की बीमारियां होने लगी हैं। बिजली के प्लांट से उन्हें रोशनी नहीं अंधेरा मिल रहा है। इस समस्या को लेकर गांव की पंचायत ने कई बार अपना विरोध दर्ज किया है। यहां तक की कई बार तो थर्मल प्लांट पर ताला लटकाने तक की धमकी दी है लेकिन हर बार इन्हें आश्वासनों द्वारा समझा बुझाकर चुप करवा दिया जाता है। गांव के सरपंच अजीज खान बताते हैं कि जब 2008 में यह प्लांट चालू हुआ था तो उससे पहले ही विद्युत विभाग के डायरेक्टर और उस समय की कांग्रेस सरकार ने यहां के लोगों को आश्वासन दिया था कि गांव को 24 घंटे बिजली मिलेगी। गांव के आसपास शुद्व वातावरण रहेगा, गांव में मुफ्त दवाई खाना रहेगा लेकिन सभी वादे कागजों की एक फाइल में बंद होकर रह गये।

राख का कुआं ले रहा लोगों की जान !
लापरा गांव इस प्लांट के थर्मल की सफेद राख को इकट्ठा करने के लिए बनाए गए टैंक से 350 मीटर की दूरी पर बसा है। थर्मल पावर प्लांट की वेस्ट सफेद राख को इकट्ठा करने के लिए कंपनी की ओर से गांव छोटा लापरा के नजदीक करीब 30 एकड़ से अधिक जमीन पर दो टैंक बनाए गए हैं। अधिकारियों की ओर से राख को हवा में उडऩे से बचाने के लिए कोई ठोस प्रबंध नहीं किया गया है। जिससे हवा चलने के साथ ही राख गांव को ढक लेती है। यह सिलसिला पिछले 8 सालों से जारी है। गांव के नंबरदार शिवदयाल इस बारे में कहते हैं कि थर्मल से उडऩे वाली राख से गांव में हर घर से लोग बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। गांव में सांस, टीबी व एलर्जी के मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। इन बीमारियों की चपेट में हर वर्ग के लोग आ रहे हैं। वह बताते हैं कि जिस दिन तेज हवा चलती है उस दिन लोग घरों में खाना भी नहीं बना पाते। गांव के सरपंच अजीज़ खान से बातचीत में उन्होंने असल न्यूज को बताया कि इस गांव में लगभग हर व्यक्ति चर्म रोग से ग्रसित हैं। गांव में हर तीन महीने में एक व्यक्ति की हार्ट अटैक से मौत हो जाती है और हर तीसरे व्यक्ति को दमा है।

नहीं हुआ कोई समाधान 

सरपंच अजीज खान ने हमें आगे बताया कि वह कई बार विद्युत प्लांट के चीफ इंजीनियर सदर भटनागर से मिले भी और लिखित में इस राख के विषय पर कारवाई की मांग की लेकिन किसी के सर पर आज तक जू नहीं रेंगी। उन्होंने बताया कि विभागीय अधिकारियों से मिलने के बाद राख पर मोटर से पानी का छिड़काव शुरू कर दिया गया। मगर पानी का यह छिड़काव राख को उडऩे से रोकने के लिए नाकाफी है। उन्होंने राज्य सरकार के पास भी गांव की समस्या को लेकर शिकायत के बारे में पत्र भेजा है लेकिन अभी तक इस बारें में कोई काम नहीं किया गया। वह बताते हैं कि इन टैंकों में पड़ी राख से जहां लोग बीमार हो रहे हैं वहीं किसानों की खेती भी बर्बाद हो रही है। उनके बताए मुताबिक जब यमुना का पानी ओवरफ्लो होता है तो टैंकों की वजह से वह गांव के बाहर नहीं निकल पाता और सीधा गांव में चला जाता है जिससे करीब 250 एकड़ जमीन प्रभावित होती है और यह लगभग हर साल हो रहा है। जिससे यहां का किसान बर्बादी की कगार पर खड़ा है। गांव की आशा वर्कर सुनीता हमें बताती हैं कि जब से यह प्लांट शुरु हुआ है गांव में समस्याओं का अंबार लग गया है। गांववाले तो इसकी जद में है हीं पशु भी इससे नहीं बच पा रहे हैं। दरअसल, राख उड़ने की वजह से वह पशुओं के चारे में मिल रही है। चाहें भुसा हो या घास हर जगह यह राख मौजूद है। इसे पशुओं को खिलाने से उनका लिवर खराब हो रहा है। पशु डॉक्टरों का कहना है कि यहां के भूसे व राख को पशुओं को ना खिलाया जाए ऐसे में गांववालों का सवाल है कि वह अपने पशुओं को खिलाएं तो क्या? सुनाती ने हमें आगे बताया कि इस राख की वजह से खेती भी खराब रही है। इससे फसलों को भी नुकसान हो रहा है। गांववाले एक जुट होकर कई बार प्लांट के चीफ के पास भी इस समस्या को लेकर गए हैं लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। उनके मुताबिक इस समस्या को लेकर प्लांट द्वारा यह भी कहा गया था कि गांव के लोगों को जरूरी उपचार प्लांट की तरफ से मुहैया कराया जाएगा लेकिन अभी तक उपचार के नाम पर भी प्लांट की ओर से कुछ नहीं किया गया है।  


गांव बेहाल प्लांट मालामाल
प्लांट से निकलने वाली राख जहां गांव के लोगों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है। वहीं दूसरी ओर प्लांट के चीफ व अन्य अधिकारी राख को सुखाकर सीमेंट की फैक्ट्रियों को बेचकर खूब माला-माल हो रहे हैं। अजीज खान ने इस बारे में बताया कि प्लांट के मालिकों द्वारा अपनी जेबें भरने के लिए गांव की समस्याओं को और बढाई जा रही हैं। सरपंच के मुताबिक प्लांट अधिकारी इस राख को सीमेंट की एक कंपनी श्री सीमेंट को बेचते हैं। ईंट बनाने के लिए राख का पतला होने जरूरी होता है मोटी राख को कंपनी लेती नहीं है इसलिए रात को समय प्लांट के लोग ट्रैकरों में कलटीवेटर की मदद से इस राख को पतला बना रहे हैं जिससे वह हल्की हो जाती है और थोड़ी सी भी हवा चलने पर ज्यादा उड़ती है। कई बार शिकायत करने पर प्लांट द्वारा यह काम बंद कर दिया गया लेकिन कुछ ही समय बाद वह फिर से ऐसा करने लगते हैं। अज़ीज खान ने हमें बताया कि डीआरडी के हिसाब से ऐसे थर्मल प्लांटों से निकलने वाली राख से जो कमाई होती है उसका पैसा राख से प्रभावित गांव की चिकित्सा पर खर्च होता है लेकिन प्लांट के मालिकों द्वारा चिकित्सा के स्तर पर गांव में कोई काम नहीं कराया जा रहा। प्लांट के आला अधिकारियों के लिए प्लांट से 2 गांवों की दूरी पर 500 एकड़ में रिहाइश की सुविधा की गई है। जो स्वच्छ वातावरण और हरियाली से पूर्ण है। कर्मचारियों की रिहाइश को गांव से मीलों दूर बनाने का कारण उसे राख के प्रदूषण से दूर रखना है।

2008 से पहले इस गांव को जो सपने दिखाए गए थे अब वह डरावनी हकीकत में तबदील हो चुके हैं। जिसे जीने के लिए ग्रामीण मजबूर हैं। दसियों दरखवास्तों के बाद भी ना तो प्लांट अधिकारी इनकी ओर देखने को तैयार हैं और ना ही प्रशासन इनकी सुन रहा है और इस गांव के युवाओं, बुजुर्गों और बच्चों की जिंदगी राख की चपेट में आकर बर्बाद हो रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कब तक ये गांववाले इसी तरह जीते रहेंगे या फिर इनकी जिंदगियों में बदलाव आएगा तो कब ?


प्लांट से निकलने वाली राख से प्रभावित कुछ ग्रामीण

पूजा, निवासी, लापरा गांव
पूजा की उम्र 20 वर्ष है। उसे दमे की बीमारी है। डॉक्टरों के मुताबिक उसे यह बीमारी थर्मल प्लांट से निकलने वाली जहरीली राख की वज़ह से हुई है। पूजा के भाई सुशील कुमार ने असल न्यूज को बताया कि करीब दो साल पहले जब पूजा को सांस में दिक्कत होने लगी तो उन्होंने उसके कुछ टेस्ट करवाये जिसके बाद पता लगा कि उसे दमा है। छोटी उम्र में इस बीमारी की वज़ह से पूजा की जिंदगी ठहर गई है। उसके भाई को दिन-रात यह चिंता सता रही है कि अब उसकी बहन की शादी कैसे होगी।






रिहान, निवासी, लापरा
राख का प्रभाव सिर्फ बड़ों पर ही नहीं बच्चों पर भी पड़ रहा है। जिसकी वज़ह से उनका बचपन खत्म हो रहा है। रिहान की उम्र सिर्फ 2 साल है और उसकी दोनों किडनियां खराब हो रही हैं। उसके पिता लायाकत अली ने हमें बताया कि करीब एक साल पहले रिहान ने घर की छत पर पड़ी मिट्टी खा ली थी जिसमें राख मिली हुई थी। जिसके बाद उसके पेट में तेज दर्द उठने लगा। कुछ टेस्ट कराने पर पता लगा कि मिट्टी में मिली राख का असर उसकी किडनियों पर पड़ा है। जिसकी वज़ह से उसकी दोनों किडनियां खराब होने की कगार पर हैं। लायाकत पिछले एक साल से अपने बेटे का इलाज चंड़ीगढ स्थित एक अस्पताल में करवा रहे हैं। जिसमें करीब दो लाख का खर्चा हो चुका है तथा अभी और पैसा खर्च होना बाकी है लेकिन लियाकत की हिम्मत टूटने लगी है क्योंकि पेशे से एक मजदूर होने के कारण अब उसके पास इतना पैसे नहीं है कि वो अपने बेटे का इलाज करा सके। 


सलामुद्दीन, निवासी, लापरा
सलामुद्दीन लापरा गांव में रहते हैं। प्लांट लगने के करीब 2 साल बाद उनकी आंखें चली गई। डॉक्टरों ने इसका कारण उन्हें राख का आंखों में जाना बताया। इस राख के कारण इनकी आंखें इस कदर खराब हो चुकी हैं कि ऑपरेशन के बाद भी वह ठीक नहीं हो सकीं। सलामुद्दीन के दो बेटे हैं जो उनके साथ ही मजदूरी करते थे। लेकिन उनकी आंखें चले जाने के कारण अब वह काम नहीं कर सकते। आज इस प्लांट की वजह से इनके परिवार की आय का एक स्त्रोत खत्म हो चुका है। सलामुद्दीन के बेटों को चर्म रोग है। ऐसे में उन्हें यह चिंता सता रही है कि इस राख के प्रकोप से कहीं उनकी पीढीयां ही खत्म ना हो जाए।


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