ज्यादातर देशों में कुष्ठ रोग का सफाया लगभग 15 साल
पहले ही हो गया था। लेकिन कुछ देशों में अब भी यह बीमारी सामने आ रही है, भारत भी
उनमें से एक है लेकिन हैरत की बात यह है कि कुष्ठ के 60 फीसदी
से ज्यादा मामले सिर्फ भारत में सामने आते हैं।
कुष्ठ मानव सभ्यता की सबसे पुरानी
बीमारियों में से एक है। यह रोग पीड़ित का रूप रंग खराब कर देता है जिसके बाद उसे
समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। एक वक्त पूरे विश्व पर इस बीमारी का घातक रूप
से कब्जा था, लेकिन जागरूकता, उपचार और लगातार प्रयासों द्वारा इस बीमारी पर काबू
पाया गया और डबल्यूएचओ संगठन ने साल 2000 में इस बात की पुष्टि की कि दुनिया में
प्रति दस हजार की आबादी में इस रोग की दर एक व्यक्ति से भी कम है। जिसके साथ ही
संगठन ने दुनिया से इस रोग के सफाये का ऐलान कर दिया था।
भारत ने आर्थिक उदारीकरण (1991) की शुरुआत में इस रोग पर काबू पाने की मुहिम शुरु
की थी उस समय देश में प्रति दस हजार की जनसंख्या पर 26 कुष्ठ रोगी थे। 14 वर्षो के अंदर यह संख्या 25 गुना घटकर प्रति दस हजार पर एक हो गई। जिसके बाद
2005 में भारत सरकार ने भी देश को कुष्ठमुक्त घोषित किया था। साथ ही यह दावे किए
गए थे कि अब देश में कुष्ठ के गिने चुने मामले हैं जिनपर वक्त के साथ काबू कर लिया
जाएगा लेकिन हाल ही में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट
सामने आई है जिसके मुताबिक हर साल दुनिया के विभिन्न देशों से औसतन 2.14 लाख मामले
कुष्ठ के सामने आते हैं इसमें चिंता की बात यह है कि इन मामले में 60 प्रतिशत भारत
के होते हैं। यानि देश में सालाना 1.3 लाख कुष्ठ के मामले हर साल सामने आ रहे हैं।
ताजा रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि
कुष्ठ रोग के 94 फीसद मामले सिर्फ 13 देशों से सामने आ रहे हैं और अब भी यह बीमारी
खासी बड़ी आबादी को प्रभावित कर रही है। ऐसे कुल मामलों में महज तीन देशों भारत,
इंडोनेशिया और ब्राजिल का हिस्सा 81 फीसदी है। जिसमें शीर्ष स्थान पर भारत है। इस
हिसाब से भारत अभी कुष्ठमुक्त देश नहीं है क्योंकि डब्लयूएचओ के मुताबिक
कुष्ठमुक्त कहलाने के लिए 10 हजार की आबादी में एक से भी कम मामले होने चाहिए
लेकिन भारत इस लक्ष्य को पूरा नही कर पाता।
![]() |
| कर्नाटक स्थित एक कुष्ठ रोग की बस्ती |
साल 2010-11 में अंतरराष्ट्रीय कुष्ठ
रोग संघ की रिपोर्ट में कहा गया था कि उस वर्ष दुनिया में कुष्ठ रोग के दो लाख
अट्ठाईस हजार चार सौ चौहत्तर मामले सामने आए जिनमें एक लाख छब्बीस हजार आठ सौ यानि
56 प्रतिशत मामले अकेले भारत के थे। उस समय इस संख्या में इजाफे की चिंता जताई गई
थी लेकिन तत्कालीन सरकार ने इस ओर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया। इसी की बानगी है कि
ताजा रिपोर्ट में भारत में कुष्ठ के मामले बढे हैं। हैरानी की बात यह है कि सरकार
द्वारा इतनी लापरवाही तब बर्ती गई थी जबकि 2011 में स्वयं केंद्रीय स्वास्थ्य
मंत्रालय की समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया था कि जिन राज्यों में इस रोग का लगभग खात्मा
होने का दावा किया गया था, वहां से कुष्ठ के नए मामले सामने आ रहे हैं। रिपोर्ट में
कहा गया था कि चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और झारखंड समेत सोलह
राज्यों में तीन फीसद लोग
इस बीमारी की चपेट में हैं
और कहीं-कहीं यह तेजी से फैल भी रहा है। इस रिपोर्ट में जो आंकड़े पेश किये गए थे
वह चिंताजनक थे लेकिन वास्तविक नहीं क्योंकि भारत सरकार द्वारा
हमेशा से कुष्ठ के आंकड़ों को छिपाया गया है।
साल 2011 में ही अनेक स्वयंसेवी संगठनों की ओर
से गठित एक राष्ट्रिय मंच ने कुष्ठरोगियों को दी जाने वाली पेंशन के सिलसिले में
किए गए अपने अध्ययन में पाया था कि उस समय राज्य सरकारों द्वारा पेश किए गए
आंकड़ों और हकीकत में कोई मेल नहीं था। मसलन, बिहार सरकार ने दावा किया था कि राज्य
में कुष्ठ रोगियों की केवल चौबीस बस्तियां हैं, लेकिन जांच में ऐसी चौंसठ बस्तियां
पाईं गईं। साल 2012 में निपॉन फाउण्डेशन द्वारा मध्यप्रदेश में किया गया एक सर्वेक्षण बताता
है, कि राज्य में कुष्ठ रोगियों की तादाद तकरीबन चार
हजार है और इनकी लगभग 34 बस्तियां हैं। जबकि राज्य सरकार द्वारा उस समय
सरकारी रिकार्ड में कुष्ठ रोगियों की महज चार बस्तियां दर्शाई गई थीं। यही नहीं
रिपोर्ट में कुष्ठ रोगियों की संख्या भी कुछ सैकड़ा भर दर्शाई गई थी। इन पुराने
रिकॉर्डों को देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भारत में कुष्ठ के 1 लाख
30 हजार से ज्यादा मामले हो सकते हैं।
कुष्ठ रोग का फैलाव देश में धीरे-धीरे
बढ रहा है खासतौर पर मलिन बस्तियों में इस बीमारी के विषाणुओं का संचरण तेजी से हो
रहा है। जाहिर है, एक बड़ी समस्या वास्तविक स्थित के आंकलन की है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का
कहना है कि कुष्ठ-प्रभावित राज्यों की श्रेणी में शामिल होने के डर से देश के कई
राज्यों में कुष्ठ रोगियों की सही तादाद सामने नहीं आती। बीते साल कुछ गैर-सरकारी
संगठनों की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि देश में ऐसे आधे मामले दबा
दिए जाते हैं। भारत में फिलहाल सालाना औसतन कुष्ठ के 1.3 लाख नए मामले सामने आ रहे हैं। अब इस
बीमारी को खत्म करने और इसकी चपेट में आने वालों के साथ होने वाला भेदभाव खत्म
करने के लिए डब्ल्यूएचओ ने अपनी नई वैश्विक रणनीति के तहत संबंधित सरकारों से इस
मामले में और मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय देने की अपील की है। इसके तहत वर्ष 2020 तक कुष्ठ से पीड़ित बच्चों की तादाद
घटाने और इसके चलते होने वाली शारीरिक विक्लांगता दर को शून्य तक पहुंचाने का
लक्ष्य तय किया गया है।
देश में अपीलें तो अक्सर होती रहती हैं लेकिन गौर कभी
नहीं होता। इस रोग का भारत में एक बार फिर लौटने का कारण सरकारों की लापरवाही है। दरअसल, इस
रोग की समाप्ति की औपचारिक घोषणा के बाद सरकार को यह शायद जरूरी नहीं लगा कि कुष्ठ
रोगियों की संख्या पर नजर रखी जाए। इस मामले में स्वैच्छिक प्रयासों की भी अपनी
सीमा है। यह जगजाहिर सच्चाई है कि भारत में इस बीमारी से ग्रस्त लोगों के प्रति
किस तरह के सामाजिक दुराग्रह काम करते हैं। कुष्ठ रोग के शिकार आमतौर पर बेहद गरीब
परिवारों और पिछड़े क्षेत्रों में पाए जाते हैं। भेदभाव, तिरस्कार और सामाजिक बहिष्कार के
डर से बहुत सारे मरीज और उनके परिवार भरसक तथ्य छिपाते हैं। इसके अलावा, ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने या
ट्रेन में आम यात्रियों के साथ यात्रा करने पर पाबंदी जैसे कई कानूनों के जरिए खुद
सरकारी तौर पर कुष्ठ के मरीजों के साथ भेदभाव किया जाता है। जबकि यह साबित हो चुका
है कि कुष्ठ अब न तो लाइलाज है न ही वंशानुगत। इसके ज्यादातर मामलों में संक्रमण
का खतरा नहीं होता। खासतौर पर एक बार इसका इलाज शुरू होने के बाद इसके फैलने की
आशंका नहीं होती। फिर भी इस बीमारी को एक सामाजिक अभिशाप माना जाता है। साफ है कि
कुष्ठ निवारण योजना की खामियों के अलावा समाज में चली आ रही भ्रांतियों से निपटे
बिना इस बीमारी का उन्मूलन नहीं हो सकेगा। आज के संदर्भ में यह बहुत जरूरी है कि
देश में एक बार फिर कुष्ठ रोग से लड़ने के लिए अभियान चलाए जाएं क्योंकि अभी यह
बीमारी आंशिक रूप से एक बार फिर पैर पसार रही है लेकिन सरकार और समाज का रुख कुष्ठ
की तरफ इसी तरह उदासीन रहा तो हो सकता है कि शायद एक बार फिर देश को अपने कल के
कलंक से जुझना पड़े।
