इस 15 अगस्त हम अपनी आजादी का 69वां जश्न मना रहे हैं। बीते 68 वर्षों के दौरान देश ने युद्ध, आपातकाल, दंगे
इत्यादि न जाने कितने उतार-चढाव देखे। 200 साल लंबी गुलामी की बेड़ियां टूटने के
बाद उसके निशान मिटने में कई वर्षों का समय लग गया जिसके कारण हमारा देश आज भी
विकसित देशों की श्रेणी में नहीं आ पाया है। लेकिन इस बारे में बात हम फिर कभी
करेंगे। कैसी अजीब विडंबना है ना, जहां एक ओर देश की सरहदों पर लड़ने वालों को आज
जंतर-मंतर पर यह कहकर खदेड़ दिया जाता है कि उनके यहां धरना प्रदर्शन करने से देश
की सुरक्षा को खतरा है तो वहीं एक स्वतंत्रता सेनानी को अपनी प्रामाणिकता सिद्ध
करने में 32 वर्षों का समय लग जाता है।
| गौर हरिदास, पुर्व स्वतंत्रता सेनानी... |
मैं बात कर रहा हूं गौर
हरिदास की। आपने शायद ही उनका नाम कभी सुना होगा। इनका जन्म 1931 में उड़ीसा में
हुआ था। गौर हरिदास स्वयं ही नहीं बल्कि उनके पिता और भाई भी स्वतंत्रता सेनानी
थे। गौर हरिदास सिर्फ 6 साल उम्र से ही पिता के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग
लेने लगे थे और मात्र 14 वर्ष की उम्र में अपने गांव में भारत का झंडा फहराने के
कारण अंग्रेज सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया था। देश स्वतंत्र होने के बाद भी उनका
देश के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ और वह उड़ीसा से वर्धा आकर महात्मा गांधी के
सेवाग्राम आश्रम में राष्ट्र निर्माण का प्रशिक्षण लेने लगे। 1951 में वह सर्वोदय
समाज का हिस्सा बनकर संत विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़ गए। उस समय उनकी
उम्र मात्र 20 वर्ष थी जब वह तेलंगाना से बिहार तक गांव-गांव जाकर लोगों को भूदान
के लिए प्रेरित करते थे। तत्कालीन मुंबई प्रांत के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई को
चरखा सिखाने का काम करते-करते खादी बोर्ड में नौकरी कर ली। वह एक सच्चे गांधीवादी
थे शायद इसी वजह से कभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में खुद को प्रदर्शित
करने की जरूरत नहीं समझी।
पहली बार उन्हें इसकी जरूरत
तब महसूस हुई जब उनके बड़े बेटे अनिल के वीजेटीआइ इंजीनियरिंग कोर्स में प्रवेश के
लिए कुछ अंक कम पड़ गए। अनिल को पता चला कि स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र को पांच
फीसद अंकों की छूट है। तब बेटे की जिद पर पहली बार हरिदास जी 1945 की अपनी
जेलयात्रा के कागजात लेकर स्वतंत्रता सेनानी का प्रमाणपत्र हासिल करने मुंबई के
कलेक्टर कार्यालय गए। लेकिन उन्हें लचर सरकारी व्यवस्था ने अपने आगे झुका दिया और
वह लगातार सरकारी ऑफिसों के चक्कर काटते रहे। सरकारी बाबुओ को यह समझ नहीं आ रहा
था की उड़ीसा के स्वतंत्रता सेनानी को महाराष्ट्र में प्रमाणपत्र कैसे दिया जाए? और इसी बात को समझने में
उन्हें 32 वर्षों का समय लग गया। शायद उन्हें यह नहीं पता था कि उड़ीसा और
महाराष्ट्र भारत के ही हिस्से है और उन्होंने भारत को आजाद कराने की लड़ाई लड़ी थी
सिर्फ उड़ीसा या महाराष्ट्र को नहीं। आखिरकार 2008 में महाराष्ट्र सरकार को यह बात
समझ आ गई और वह उन्हें 400 रु प्रतिमाह की पेंशन व स्वतंत्रता सेनानी का
प्रमाणपत्र देने को राजी हो गई। यह 400 रु पेंशन उन्हें खादी ग्रामोध्योग आयोग की
नौकरी से रिटायर होने के बाद दी जानी थी। 78 वर्ष की उम्र में इस बकाया राशि का 40
फीसदी भाग तो उसी समय उन्हें मिल गया था लेकिन शेष 60 फीसद पांच वर्ष के लिए डाकघर में
जमा किया जाना था। जिसे पाने के लिए उन्हें मंत्रालय के कई और चक्कर काटने पड़े।
एक स्वतंत्रता सेनानी ने
अपना हक पाने के लिए पूरा जीवन अपने ही देश के सिस्टम से संघर्ष करते काट दिया। यह
कहानी तो कुछ लोगों के सामने आ गई पर न जाने आज भी कितने गौर हरिदास भारत में है
जो ऐसा ही संघर्ष अपने मूलभूत अधिकारों के लिए कर रहे होंगे या शायद कई इस देश की
मंगलकामनाऐं करते हुए अपने प्राणों को त्याग चुके होंगे। आज हमारे पास परमाणु बम,
टैंक, अत्याधुनिक हथियार न जाने क्या-क्या है लेकिन वो सब किस काम का जब हम अपने
सैनिकों व स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान नहीं दे सकते। क्या सच में हम उन्हें
बिना सम्मान दिए इस स्वतंत्रता के जश्न में शरीक होने के हकदार हैं?
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