एक लंबी बहस, याकूब की दरखवास्तें और 22 वर्षों के इंतजार के बाद आखिरकार मुम्बई धमाकों के दोषी याकूब मेमन को फांसी दे दी गई। इतिहास में पहली बार 30 जुलाई की रात तीन बजे ऐसा हुआ जब सर्वोच्च न्यायालय में किसी केस पर सुनवाई हुई हो । मामले के सभी पहलुओं को देखने के बाद न्यायालय ने अपने फैसले को कायम रखते हुए फांसी की सज़ा को टालने से इंकार कर दिया। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर अब सवाल उठ रहे हैं। माना जाता है सर्वोच्च न्यायालय का फैसला, जनता का फैसला होता है। इसका मतलब याकूब को फांसी जनता ने सुनाई है तो सवाल यह है कि वो कौन लोग है जो अपने ही फैसले पर उंगली उठा रहे हैं? कुछ मुस्लिम सरप्रस्तों की ओर से आवाज यह उठाई जा रही है कि राजीव गांधी के हत्यारों को क्यों बक्शा गया? भुल्लर ने कौन सी समाज सेवा की थी? गोधरा कांड के दोषियों को सजा क्यों नहीं मिली? 1992 के दंगों के दोषियों का क्या हुआ? बाबरी कांड में अभी तक किसी को सजा क्यों नहीं हुई? अगर इन सभी को बक्शा जा सकता है तो याकूब को क्यों नहीं? प्रश्न यहां यह उठता है कि क्या सच में याकूब के साथ अन्याय हुआ? अगर हम
कुछ तथ्यों पर नजर डालों तो जान पाएंगे की याकूब के साथ अन्याय हुआ या नहीं।
1992 के मुंबई दंगे
1992 के मुम्बई धमाकों के जख्म आज भी देश की व्यवसायिक नगरी भुला नहीं पाई हैं। यह देश के दामन पर एक दाग की तरह आज भी वैसे के वैसे हैं। हालांकि 1992 के बाद हुए दंगों के कत्लेआम से लगे खून के छीटों के पीछे, 1992 के दाग छुप जरूर गए हैं लेकिन खत्म नहीं हुए। 1992 के इन दंगों में करीब 900 लोगों ने अपनी जान गवाई थी। लेकिन दंगों के आरोपियों को सजा दिलाने में न राज्य सरकार न केंद्र और न न्यायालय ने ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। यह बात किसी ओर ने नहीं खुद जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा ने एक टीवी चैनल् से कही। अगर 900 लोगों की जान में किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई तो 1993 बम धमाकों में मरे 257 लोगों की लाशों में ऐसा क्या था जो सरकार ने 100 से भी ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी की। शायद इसका कारण था दंगो की रिपोर्ट की उंगलियां शिवसेना और दिवंगत बाल ठाकरे पर उठना । इस रिपोर्ट में बाल ठाकरे को ‘वर्चुल जनरल’ कहा गया था। लेकिन इस रिपोर्ट पर सरकार ने कभी कोई कार्रवाई नहीं की। इसमें कांग्रेस-एनसीपी और शिवसेना-बीजेपी की सरकारें शामिल थी। शायद यही कारण था कि दंगों के 22 साल बाद भी 900 लोगों की मौत के लिए सिर्फ तीन लोगों को दोषी पाया गया और 1993 मुम्बई धमाकों में 100 लोगों को दोषी करार दिया गया। अगर याकूब के पीछे भी राजनीतिक पार्टियां होती तो शायद इस मामले में भी 2 या तीन लोगों को ही दोषी पाया जाता।
1993 दिल्ली बम धमाके
भुल्लर और याकूब के केस में कई समानताएं है। दोनों का जन्म 1960 में हुआ। याकूब 1993 मुम्बई धमाकों का मुख्य आरोपी है और भुल्लर 1993 दिल्ली के बम धमाकों का मुख्य आरोपी। बम धमाकों में शामिल होने से पहले भुल्लर प्रोफेसर बन चुका था और याकूब चार्टिड अकाउंटेंट। भुल्लर ने अपने ‘खालिस्तान-प्रेम’ के मौह में बम धमाके किए और याकूब ने ‘पाकिस्तान प्रेम’ में। याकूब धमाकों के बाद पाकिस्तान भाग गया और भुल्लर जर्मनी। दोनों को ही दूसरे मुल्कों ने भारत को सौंपा। याकूब को नेपाल ने तो भुल्लर को जर्मनी ने भारत को सौंपा। दोनों के खिलाफ टाडा के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया और दोनों को ही निचली अदालतों ने फांसी की सजा सुनाई। इसके बाद भी दोनों का सफर एक जैसा ही रहा। दोनों की अपील सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दी। राष्ट्रपति ने भी दोनों ही के अपराध को अक्षम्य माना और दया याचिका को ठुकरा दिया। दोनों ने फिर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और दोनों को ही निराशा हाथ लगी। और हैरानी की बात तो यह है कि दोनो एक ही तरह की मानसिक बीमारी की चपेट में आए। लेकिन 31 अप्रैल 2014 को दोनो अपराधियों की समानता का सिलसिला टूट गया। सर्वोच्च न्यायालय ने भुल्लर की फांसी उम्र कैद मे बदल दी और 30 जुलाई 2015 को याकूब को फांसी दी गई। क्या इसका कारण यह था कि अकाली दल लगातार भुल्लर की फांसी का विरोध कर रहा था? या भुल्लर के मामले में ऐसा जनआक्रोश नहीं था जैसा याकूब के मामले में था जिसके कारण 30 जुलाई की रात 2 बजे सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन भी किया गया। लेकिन इन जनआक्रोश की तीव्रता में फर्क आया किसकी वजह से आम लोगों की वजह से या ?
राजीव गांधी के हत्यारों को माफी क्यों ?
फरवरी 2014 में सर्वोच्च न्यायलय ने राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी को उम्र कैद में बदल दिया। जिसका कारण कोर्ट ने दिया कि इनकी फांसी की सजा की तारीख तय करने में सरकार ने काफी ज्यादा देर लगा दी। राजीव गांधी के तीनों हत्यारों को टाडा कोर्ट ने 1998 में फांसी की सजा सुनाई थी। लेकिन 16 सालों के बाद भी सरकार इनकी फांसी की तारीख मुकर्रर नहीं कर पाई। जिसके कारण इनकी सजा को उम्र कैद में बदल दिया गया। कोर्ट ने कारण बता दिया लेकिन यह बात भी पूरे देश को पता है कि राजीव गांधी के हत्यारों को सदा तमिलनाडू सरकार का समर्थन मिलता रहा है। आज भी तमिलनाडू सरकार इस कोशिश में जुटी है कि अब राजीव गांधी के हत्यारों को जेल से रिहा कर दिया जाए। यहां सवाल उठता है कि याकूब की सजा भी तो आठ साल पहले सुनाई गई थी और करीब इक्कीस साल वह जेल में काट चुका था तो क्या यह आधार काफी नहीं था उसकी सजा को माफ करने के लिए। यहां शायद कमी इस बात की थी कि भारत में कोई मुस्लिम बहुल राज्य नहीं है या मुस्लिम सरकार नहीं है जो याकूब के समर्थन में खड़ी हो सकती।
1992 बाबरी मस्जिद कांड
बाबरी मस्जिद कांड एक ऐसी घटना जो हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष होने के एजेंडे को गाली देती है। आज भी लोगों के जहन में अयोध्या में हुआ इस कांड की यादें ताजा हैं। राममन्दिर के नाम पर किस तरह से सियासी दलों ने अपनी सियासत की जमीन पुख्ता की थी इससे सभी वाकिफ हैं। 1992 में करीब डेढ लाख कार सेवकों ने मिलकर ऐतिहासिक मस्जिद को गिरा दिया। जिसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए दंगों में करीब दो हजार जाने गई। यहां हैरान करने वाली बात है कि जब यह घटना घटी उस समय देश के लोकप्रिय नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी स्वयं मौजूद थे। इन सभी ने न्यायालय के आदेशों की भी धचियां उड़ा दी। इस विध्वंस की जांच करीब 17 वर्षों तक चलती रही अंत में आडवाणी, जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती आदि कई बड़े नेताओं को इसमें दोषी ठहराया गया। कांड के समय और जब रिपोर्ट आई दोनों बार देश में कांग्रेस की सरकार थी और राज्य में जनता दल लेकिन फिर भी इस कांड को न तो रोका गया और न ही दोषियों को सजा मिली। एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने माना की इस कांड के पीछे सिर्फ हिंदू दल ही नहीं बल्कि कांग्रेस, सपा और बसपा भी शामिल थी। यह बात किसी से नहीं छुपी की देश के कई राजनैतिक दलों के हाथ इसमें रंगे है इसीलिए चाहे सत्ता दल हो या विपक्ष किसी पर भी अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
यही नहीं 1984 के दंगे, हाशिमपुरा हत्याकांड, गोधरा दंगे, मुजफ्फरनगर दंगे आदि देश में कई ऐसे कांड हुए जिनपर आज तक दो या तीन लोगों की ही गिरफ्तारी हुई है और फांसी तो खैर शायद हुई ही नहीं। तो क्या यह मान लिया जिए कि याकूब के साथ नाइंसीफी हुई और उसे फांसी नहीं होना चाहिए थी। नहीं, ऐसा कतई नहीं है कि याकूब को फांसी नहीं होना चाहिए थी वो हजारों लोगों का गुनाहगार है और ऐसे जघ्नय अपराध के लिए फांसी की सजा भी कम है। न्यायलय ने याकूब को अपनी बात कहना का पूरा मौका दिया। लेकिन फिर भी मुस्लिम समुदाय में रोश है। शायद इसका कारण ओवेसी जैसे नेता और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले कुछ दल है। जिन्हें हमारी खस्ताहाल न्यायिक प्रणाली के कारण याकूब जैसे आतंकवादियों को फंसी देने पर देश के अल्पसंख्यक लोगों में देश के खिलाफ जहर खोलने का मौका मिल जाता हैं। लेकिन इन्हें यह नहीं पता कि मुस्लिम समुदाय के बीच इस तरह का जहर घोलना कितना खतरनाक है।
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