मंगलवार, 29 सितंबर 2015

कृषिप्रधान देश से किसान कब्रगाह में तब्दील होता भारत

देश में 1995 से लेकर अब तक तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके है लेकिन शायद ही किसी ने कृषि क्षेत्र में होते इस मृत्यू तांडव पर चिंता जताई हो। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 में तकरीबन 13,754 और 2013 में 11,772 किसानों ने आत्महत्या की है। भारत में ज्यादातर किसान कर्ज़, फसल की लागत बढ़ने, सिंचाई की सुविधा न होने, कीमतों में कमी और फसल के बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं। इस साल भी किसान मृत्यू दर का आंकड़ा हजारों के आंकड़े को पार कर चुका है। लगातार 12वें साल महाराष्ट्र के किसान आत्महत्या के मामले में अव्वल है। यहां का सूखाग्रस्त विदर्भ क्षेत्र किसानों की कब्रगाह है। अकेले महाराष्ट्र में 1995 से अब तक 60,750 किसान आत्महत्या कर चुके हैं।
देश के अन्नदाता अन्न के लिए मौहताज 
देश डिजिटल हो रहा है। देश की जीडीपी दर बढ रही है साथ ही देश में राजनीतिक असहयोग की दर भी लगातार बढती जा रही है। हालात यह हैं कि भूमि अधिग्रहण बिल पर सरकार के घुटनों को टिकाकर कांग्रेस किसानों की हिमायती होने का दम ठोक रही है और बीजेपी यह रोना लेकर बैठी है कि वह किसानों के लिए विपक्षियों के अड़ियल रवैये के कारण कुछ नहीं कर सकती। लेकिन बिहार चुनावों में कोई दल बेबस नहीं नजर आता है। उसकी रणनीति बनाने को लेकर विपक्षी और सत्ताधारी दलों में मीटिंगों के दौर भी चल पड़े है। चीन में आई मंदी को भारत के लिए एक सुनहरे अवसर के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री ने इससे देश को फायदा पहुंचाने के लिए इंडिया इंक और इकोनॉमिस्ट के साथ मीटिंग भी की है। लेकिन शायद ही किसी को याद हो की खेती की बिगड़ी अर्थव्यव्सथा को लेकर प्रधानमंत्री या किसी अन्य दल ने ऐसी मीटिंग की तो कब की? देश में हर कोई अपना उल्लू सीधे करने में व्यस्त है लेकिन किसानों की चिंता किसी को नहीं है। शायद इसी का नतीजा है की कर्नाटक देश का पहला सूखा राज्य घोषित हो चुका है और महाराष्ट्र में भी सूखे के हालात बनते जा रहे हैं। तेलांगना में भी सूखे से हालात बद से बदतर हो गए हैं। यानि किसानों के सामने जिंदगी का सवाल है लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। देश के बड़े हिस्से में मानसून की बारिश धम चुकी है और शायद सरकार इस बात से अनभिज्ञ भी नहीं होगी कि इस बरस मानसून की बारिश सामान्य के मुकाबले 14 फीसदी कम दर्ज की गई है। स्थिति कितनी गंभीर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की देश के 641 जिलों में से 283 जिलों में मानसून की बारिश 30 से 60 फीसदी तक कम रिकार्ड की गई है। कभी अकाल ओलावृष्टि और बारिश की वजह से किसान मरता है तो कभी सूखे की वजह से, मरता हर बार किसान ही है। लेकिन जैसे किसी को कोई प्रवाह ही नहीं है। 

मराठावाड़ा में चार सालों के सूखे से घुटने टेकता किसान
मराठावाड़ा के दो किसानों का शव
महाराष्ट्र के मराठावाड़ा में पिछले महीने तक करीब 1300 किसानों के आत्महत्या करने के आंकड़े दर्ज किए गए। मराठवाड़ा के औरंगाबाद, जालना, उस्मानाबाद, नांदेड़, परभनी, बीड़, लातूर, हिंगोली में भयंकर सूखे की स्थिति है और हर तरफ से सिर्फ किसानों की चीख पुकार ही सुनने को मिल रही है। हालात यह तब हैं जब इस सूखा का अंदेशा सरकार को पिछले वर्ष सितंबर में ही लग गया था। लेकिन सरकार को हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार चुनावों की तैयारियां भी तो करनी थी, ऐसी में किसानों के लिए उसके पास वक्त ही कहां था। वैसे तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मराठवाड़ा क्षेत्र के तीन दौरे किए और ख़स्ता  हालात में जीवन बिता रहे किसानो से मिलकर सीएम ने उनका हाल भी जाना। लेकिन लच्छेदार भाषण और झूठे  वायदों के अलावा किसानों को और कुछ नहीं दिया। हालांकि महाराष्ट्र के तीन जिलों हिंगोली, ओसमानाबा और लातूर में खाने के कैंप जरूर लगाए गए है क्योंकि सबसे ज्यादा किसानों के मरने की खबर यहीं से आ रही है। उल्लेखनीय है कि मराठावाड़ा में इस वर्ष 52 फीसदी कम बारिश हुई है। यहां के बांधों में कुल 7.6 फीसदी पानी बचा है। इसके प्रमुख 11 बांधों में से 5 का पानी पूरी तरह सूख चुका है। यहां के हालात इतने खराब है कि लोगों को कई किलोमीटर दूर तक पानी के लिए खानाबदोशों की तरह घूमना पड़ता है। 
ऐसा भी नहीं है कि यहां के ऐसे हालात पहली बार बने हैं। 2014, 13 और 12 में भी यहां का नजारा कुछ ऐसा ही था और इस बार की भाजपा सरकार भी पिछली सरकारों की तरह बेबस बस किसानों को ढांढस बंधाने में लगी थी। पूरे मराठावाड़ा के किसान बोतलबंद पानी और टैंकरों पर निर्भर हैं। इस साल अब तक 1,291 टैंकरों की सप्लाई हो चुकी है और पिछले वर्ष करीब 718 टैंकरों की सप्लाई की गई थी। स्थिति यहां यह है कि कुछ इलाकों में तो लोग हफ्ते भर में सिर्फ दो बार ही नहाते हैं। इतने खराब हालात के बाद भी राज्य के कृषि मंत्री एकनाथ खड़से का कहना है की अगले दो हफ्तों तक हालातों की समीक्षा की जाएगी उसके बाद सूखे से प्रभावित गांवों की घोषणा होगी। जिसका मतलब है कि तबतक किसानों के लिए राहत कार्य शुरू नहीं होगा और दिन बा दिन देश का अन्नदाता दम तोड़ता रहेगा।

यहां के भीषण सूखे का कारण

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक रूप से सूखा रहने वाले इस इलाके में बहुत बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है। जो पानी के पीछे मौजूदा संकट का सबसे बड़ा कारण है। मराठावाड़ा में कम से 70 चीनी की मिले हैं। इस इलाके की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से गन्ने की फसल यहां के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। क्योंकि गन्ने की फसल में पानी और सिंचाई की बहुत जरूरत पड़ती है और इस इलाके में सिंचाई की व्यवस्था न के बराबर है। यहां के किसान इस बात से बिल्कुल अनभिज्ञ है। आज यहां का भूमिगत जल बिल्कुल सूख चुका है। जमीन के 40 फीट नीचे तक पानी का कोई पता ठिकाना नहीं है। यहां की करीब 76 तालुकाओं में से 66 का जल भी पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। जिसकी सबसे बड़ी वजह गन्ने की खेती है। यह बहुत जरूरी है कि इस इलाके को बचाने के लिए सरकार जल्द से जल्द कड़े कदम उठाए तथा यहां गन्ने की खेती पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दे। वैसे यहां सूखे की स्थिति साल 2012 से ही बनी हुई है। इस साल भी यहां केवल जून के शुरूआती माह में बारिश हुई थी। इसके बाद इस इलाके में पानी की एक बूंद तक नहीं दिखी। कम बारिश के कारण ही यहां की खरीफ की फसल पूरी तरह नष्ट हो चुकी है और रबी की फसल की भी कोई गारंटी नहीं है। जिसके कारण यहां का किसान पूरी तरह से टूट चुकी हैं। यदि सरकार ने इस और जल्द ध्यान नही दिया तो भविष्य में स्थिति इससे कहीं गंभीर हो सकती है।

पूरे देश में मंडरा रहा कृषि संकट

देश की करीब 60 प्रतिशत जनसंख्या की आजीविका कृषि क्षेत्र पर आधारित है। लेकिन इस क्षेत्र को लेकर सरकार ने अब तक किसी बड़े नीतिगत बदलाव या घोषणा से परहेज ही किया है। कृषि पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। चालू वित्त वर्ष  में कृषि विकास दर सिर्फ़ 1.1 फीसदी रही है। कृषि की दयनीय हालत के बावजूद अपने पहले बजट में मोदी सरकार ने कृषि आय की बात तो की, लेकिन कृषि बजट में कटौती कर दी। बजट में किसानों के  लिए कुछ खास नहीं रहा। सरकार द्वारा जिस कृषि लोन की बात की जाती है, उसका फायदा किसानों से ज्यादा कृषि उद्योग से जुड़े लोगों को होता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पूरे देश में केवल किसान ही एक ऐसा उत्पादक है जो अपने उत्पाद का मुल्य स्वयं निर्धारित नहीं करता। जिसके कारण अन्य उत्पादक तो मुनाफा कमा लेते है लेकिन किसान के लिए उसकी लागत निकालना ही भारी पड़ जाता है और ऊपर से प्रकृति की मार पड़ जाए तो मौत को गले लगाने से ज्यादा सुख उसे और कोई चीज नहीं दे सकती। यहां एक गंभीर समस्या किसानों में बढते असंतोष के रूप में भी पनप रही है। शायद इसीलिए पुलिस और किसान के संघर्ष की घटनाएं भी बढ रही हैं। इस साल अबतक पुलिस और किसानों के बीच करीब 74 घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जो पिछले वर्ष के मुकाबले दुगनी हैं। कहीं न कहीं इस असंतोष का कारण बढने की प्रमुख वजह सरकार की कॉरपोरेट प्राथमिकता नीति भी है। लेकिन यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि डिजिटल इंडिया के सपने दिखाने वाली सरकार के पास प्रकृति की मार से प्रभावित राज्यों के लिए कोई नीति नहीं है। और एक विडंबना यह भी है कि आखिर ऐसी नौबत आती ही क्यों है कि देश के अन्नदाता को हर साल खुद अन्न के लिए मौहताज होना पड़ता है और तंग आकर मौत को गले लगाना पड़ रहा है। जिसकी वजह से यह देश कृषि प्रधान देश की जगह किसानों की कब्रगाह में तबदील होता जा रहा है।
 

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