मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

कठिन है डगर मंजिल की


कठिन है डगर मंजिल की
थकने लगा हूं चलते-चलते
छाले भी रो पड़े हैं अब
मेरे दामन में जो थे लिखे

कैसे रखूं संघर्ष को ज़ारी
अब हंसने लगी है दुनिया सारी
समझने लगी हैं बेगैरत मुझको
मेरे दामन की खुशियां सारी

पर लड़ना मुझको
यह संघर्ष है जीवन मेरा
पत्थरों पर लिखा है नसीब
लिखने वाले ने मेरा

पर हां,
इस दौर में दिखने लगे हैं
दुनिया के खेले
कुछ हसीन है इसमें, तो कुछ हैं मटमैले

डगर है कठिन मंजिल की
पर छूना है, आसमां मुझको
आशाएं कई है
मेरे नन्हें से जीवन की

शायद है एक वजह यही
दौड़ पड़ता हूं
उम्मीद की किरण दिखें
चाहें कहीं


पर सफर धुंधला रहा है
मेरी आंखों से कहीं
शायद डगर कठिन है मेरी
सोच से ज्यादा कहीं

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

अपनी चालों में फंसती कांग्रेस


संसद के चालू सत्र में विपक्ष का रुख कुछ ऐसा नजर आता है जैसे वह ठान कर बैठा है कि सत्ता दल जिस रास्ते पर देश को लेकर जाएगा वह उसके विरुध्द ही देश को खीचेगा। चाहें वह रास्ता सही हो या गलत। संसद के पिछले दो सदनों में भी विपक्ष का रुख कुछ ऐसा ही था। पिछली बार ललित मोदी और व्यापम घोटाले की आग में सदन की कार्रवाई जलकर खाक हो गई थी तो इस बार असहिष्णुता के बेजा बवाल में समय निकलता जा रहा है। इन परिस्तिथियों में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का यह डर भी बढ रहा है कि कहीं भूमि अधिग्रहण की तरह ही जीएसटी बिल भी विवाद की भेंट न चढ जाए। हाल ही में मोदी के सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को चाय पर बुलाने की घटना को हम भाजपा की जीएसटी बिल को पास कराने की प्रतिबध्दता के रूप में देखें तो गलत नही होगा। मोदी जी का यह रुख इस बात को दर्शाता है कि वह ठप पड़े देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए जहर के प्याले भी पीने को तैयार हैं। लेकिन इस मामले में राहुल गांधी की प्रतिक्रिया पर हैरानी भी होती है और हंसी भी आती है। चाय पर चर्चा के बुलावे को राहुल ने  जनता के दबाव किया फैसला बताया है। लेकिन राहुल को यह बताना जरूरी है कि यह कौन सी जनता है जिसने उन्हें 44 सीटें दी हैं या वह जिसने उसे 44 सीटों पर सीमित कर दिया। सवाल यह भी गहरा गया है कि क्या अतीत में संसद तभी चली है जब पीएम ने विपक्षी नेताओं को चाय पर बुलाया है? पता नहीं कांग्रेस जीएसटी पर हां भरेगी या नहीं? लेकिन कांग्रेस के रवैये से यह जरूर स्पष्ट है कि मोदी सरकार को वही करना चाहिए जैसा वह चाह रही है और राहुल तो चाहते हैं कि सरकार उनके आगे नतमस्तक हो जाए।
   
   खैर यह सब तो 2019 तक चलता ही रहेगा लेकिन कांग्रेस के जीएसटी विरोधी रुख को लेकर यह सवाल बहुत बड़ा है कि आखिर वह अपने ही बिल के विरोध में क्यों खड़ी है? आखिर पहली बार 2006-07 में कांग्रेस ने ही तो जीएसटी का मुद्दा उठाया था और उसके बाद 2014 में वह खुद उसे लेकर आई थी। लेकिन अब जिस तरह से कांग्रेस इस बिल पर सत्ता दल का विरोध कर रही है उससे यह बात स्पष्ट है कि उसे डर सता रहा है कि यदि यह बिल अस्तित्व में आया और देश को उम्मीद के मुताबिक इससे लाभ पहुंचा तो कांग्रेस की हालत 2019 के लोकसभा चुनाव में भी इन चुनावों जैसी ही होगी।
   
   इस समय मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौता है संसद के इसी सत्र में बिल को पास कराना क्योंकि यदि 2016 की शुरुआत में ही जीएसटी देश में लागू नहीं हुआ तो विदेशी निवेश के माहौल को गहरा छटका लगेगा। जिसका जिक्र मूडीज ने भी अपनी एक रिपोर्ट में किया है। लेकिन कांग्रेस के अड़ियल रवैये से लगता है कि उसे इस बात से कोई फ्रक नहीं पड़ता। उसे तो बस विपक्ष के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी है। फिलहाल कांग्रेस ने जीएसटी को समर्थन देने के लिए अपनी तीन शर्त रखी हैं। सबसे पहली है जीएसटी की सीमा तय की जाए जो कांग्रेस 18 फीसदी रखना चाहती है लेकिन यदि यह शर्त मान ली जाती है और बिल पास हो जाता है तो भविष्य में सरकार को जीएसटी की सीमा बढाने या घटाने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी जिसके न मिलने पर इसे बदला नहीं जा सकेगा। हाल के हालातों में देश व राज्य की स्थिति को देखते हुए करों को सरकार तीव्रता से बदल देती है जिससे अक्सर राजस्व को गंभीर नुकसान होने से बच जाता है लेकिन सीमा तय करने की सूरत में इससे बचा नहीं जा सकेगा और सरकार कर के मामले में छोटी सी भी तबदीली करने के लिए विपक्ष की मुंह देखा हो जाएगी। कांग्रेस की दूसरी शर्त है राज्यों के साथ विवाद होने पर जीएसटी समीति के मौजूदा सदस्यों में से 75 फीसदी की मंजूरी और तीसरी उत्पादक राज्यों से किसी भी प्रकार की खरीद पर राज्य को एक फीसदी अधिक टैक्स अदा करने की। यहां उल्लेखनीय है कि कांग्रेस जिन तीन मांगों पर अड़ी है वह उसके द्वारा लाए गए 2014 के बिल में नहीं थी। जब उस समय इनकी जरुरत नहीं थी तो अब ऐसी क्या आफ्त है कि इसके बिना यह बिल देश को नुकसान पहुंचा देगा। हकीकत में कांग्रेस की इन तीन शर्तों का कारण है उसका अबतक का बेवजह का विरोध। जिसके कारण कांग्रेस इस बिल पर चर्चा से भागती रही है और हकीकत में उसने जनता को इसका कोई ठोस कारण भी नहीं दिया है लेकिन जिस तरह से हर हाल में भाजपा बिल पर चर्चा करना चाहती है उससे कांग्रेस घबरा गई है और अपनी ही चालों में फंसने लगी है तथा इस तरह की बचकानी मांगे सामने रख रही है। इसीलिए कांग्रेस सदन में असहिष्णता का मुद्दा उठाकर सदन के समय को बर्बाद करना चाहती है।  
   
   हालांकि भाजपा की भी इसे नाकामी ही कहा जाएगा की भूमि अधिग्रहण की तरह ही वह जनता को इस बिल के बारे में देश को नहीं समझा सकी। जिसके कारण जनता में अभी असमंजस का माहौल है। उसे देश को यह बताना जरूरी है कि जीएसटी क्या हैइससे किस तरह देश को फायदा होगा और घोटालों पर लगाम लगेगी? किस तरह इस बिल के पास होने से नुकसान तो होगा लेकिन उनका जो टैक्स की चोरी करते हैं।