मंगलवार, 1 मार्च 2016

बदलाव और किसान

देश आजाद होने के 9 साल बाद फिल्म आई थी 'मदर इंडिया'। वैसे तो यह फिल्म एक मां पर आधारित थी लेकिन इसमें आजाद भारत के उस किसान की दुर्दशा का सटीक चित्रण किया गया था जो आजादी के 9 साल बाद भी गुलाम ही था। जुल्म उसपर तब भी उसी तरह ढाये जा रहे थे जैसे 1947 से पहले। बस फर्क इतना था कि जुल्म करने वाले हाथ गौरे नहीं काले थे। उस समय का किसान साहुकारों और जमीनदारों के पैरों तले दम तोड़ रहा था। आमदनी के नाम पर अगर उसे पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी भी मयस्सर हो जाए तो गनीमत थी। वो जीवन काट रहा था तो इस उम्मीद के सहारे की बदलते भारत के साथ उसकी दशा भी बदलेगी।
वक्त बदला, चहरे बदले, कमान एक पीढी से दूसरी पीढी ने संभाली, सत्ता में भी परिवर्तन आया, जय किसान के नारे दिए गए, हर चुनाव में, बजट में किसानों की बात की गई। परिवर्तन कि बियार चली लेकिन वक्त दर वक्त किसान के हालात शायद देश में इस स्तर तक गिर चुके थे कि बदलाव उसतक कभी पहुंच ही नहीं सकी। कुछ जिनकी उम्मीद टूट चुकी थी उन्होंने आत्महत्या से हाथ मिलाया तो कुछ ने शहरों की राह पकड़ ली तो कुछ अपनी जमीन को मां कहकर उसी से चिपके रहे। इस आस के सहारे की शायद 'दाता' 'अन्नदाता' की दुर्दशा की ओर ध्यान दे।
हाल ही में मोदी सरकार ने अपना तीसरा बजट देश की जनता के सामने रखा। जिसमें बीते करीब 85 बजटों की तरह ही कुछ सपने दिखाए गए। '2022 तक किसानों की आय दोगुनी होगी' जब यह बात अरुण जेटली ने संसद में कही तो तालियों की ग़ड़गड़ाहट से पूरा सदन गूंज उठा लेकिन इस गड़गड़ाहट के पीछे अंधेरे कोने में छुपे किसान का दर्द छुपा रहा गया और दबे रह गए कई सवाल। इन सवाल में सबसे बड़ा सवाल था कि यदि सरकार को अपना यह वादा याद भी रहा और 2022 तक उसकी आय दोगुनी हो भी गई तो उससे होगा क्या2003-2004 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार उस समय भारतीय किसान की प्रतिदिन आय करीब 70.5 रुपये थी यानि मासिक आय करीब 2115 रुपये। जो आज 2016 में 3000 से ज्यादा नहीं है। जिसके हिसाब से सरकार के वादे के अनुसार उसकी आय आज से 6 साल बाद हो जाएगी करीब 6000 रुपये प्रतिमाह यानि 200 रुपये प्रतिदिन। लेकिन उससे होगा क्या? वह अपने परिवार को दो वक्त की रोटी देगा। बच्चों को शिक्षा भी देगा और त्योहारों पर उन्हें नए कपड़े भी दिलाएगा। लेकिन तब भी साहूकारों या बैंकों से कर्ज लेकर ही, जो वो आज भी करता है। तब भी वैसा ही होगा, तो परिवर्तन कहां आया? जो किसान आज आत्महत्या कर रहा है तब भी करेगा। भारत में शायद आत्महत्या, बदहाली, गरीबी ही उसके जीवन का सत्य़ है और नियति भी क्योंकि इस देश में जीवन जीने का अधिकार किसान को कभी मिला ही नहीं।
आज किसानों की इस दशा की जिम्मेदार देश की सरकारें हैं। मैं स्पष्ट कर दूं की मै बात सिर्फ कांग्रेस की ही नहीं कर रहा वह सरकार चाहें मोरारजी देसाई की हो, चंद्रशेखर या अटल जी या नरेंद्र मोदी की किसी ने खेती की बदहाली कि ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया। आपको बता दूं की भारत में कुल 8 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर खेती होती है। जिसमें सिर्फ 28 प्रतिशत भूमि ऐसी है जिसपर सिंचाई के साधन उपलब्ध है बाकि 72 प्रतिशत भूमि आज भी इंद्रदेवता पर निर्भर करती है। खेती की बदहाली और गरीबी के कारण आज का किसान हल छोड़कर छेनी हथोड़ा चलाने के लिए विवश है।
 इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जहां एक धोबीअपने एक गधे के साथ महीना भर काम करने के बाद पांच से 6 हजार रुपये तक तक कमा लेता है। वहां एक किसान अपने चार-पांच पारिवारिक सदस्यों और एक जोड़े बैल के साथ महीना भर पसीना निकालने के बाद भी 3000 या 3200 रुपये से ज्यादा नहीं कमा पाता और इस आय में उसके पूरे परिवार का योगदान होता है। मेरे एक और उदाहरण से शायद आप किसानों की दयनीय स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। किसी महानगर में घरों में बर्तन मांजने और झाड़ू पोंछा करने वाली किसी महिला की आय से भी कम एक किसान परिवार की आय है। शहर में कोई महिला महीने में सिर्फ 60-90 घंटे काम करके 7 से 8 हजार रुपये मासिक कमा लेती हैऔर एक किसान परिवार पूरे महीने दिन-रात काम करने के बावजूद 3200 रुपये भी मुश्किल से कमा पाता है। इससे बड़ा दुर्भाग्य हमारे लिए और क्या हो सकता हैयह देश विकास के पथ पर कैसे आगे बढ सकता है जब उसका अन्नदाता ही भूखा है। 





शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

देश के लिए नासूर बन चुका है आईएसआईएस!

बात कुछ महीनों पहले कश्मीर घाटी में झंडे फहराने के साथ शुरु हुई थी। वो भी खास शुक्रवार के दिन नवाज पढने के बाद से। जिसमें कुछ घाटी के नौजवानों को काले झंडे लिए उद्दंड मचाते देखा गया था। जिसे सरकार ने नज़र अंदाज कर दिया। लेकिन यह सिलसिला कुछ यूं चला की घाटी में हर शुक्रवार ऐसे दर्शय आम हो गए। जिस बात का मैं जिक्र कर रहा हूं शायद इतने से आप उसे समझ गए होंगे क्योंकि देश में कश्मीर से होते हुए आईएसआईएस का खतरा दिनोंदिन कदम बढाता देश की दहलीज के एक कदम अंदर तक आ चुका है और अब उससे मुंह मोडा या इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। आईएस के निशान जो कल तक सिर्फ कश्मीर घाटी तक नज़र आ रहे थे अब एक-एक कर देश के करीब 13 राज्यों में दिखने लगे हैं। शायद इसी कारण कल तक जो इलैक्ट्रानिक न्यूज चेनल जिस आईएसआईएस को सिर्फ कुछ खास शोज में चला रहे थे अब वह प्राइम टाइम में भी जगह पाने लगा हैं।


हालात कुछ इस कदर खराब हो चले हैं कि देश की जो खुफिया एजेंसी आईसिस को आसानी से रोकने का दम भर रही थी उसकी हवा भी फुग्गे की तरह निकल गई है और शायद मोदी सरकार को भी इस बात का इल्म हो चला है कि अब सिर्फ नेटवर्क को तोड़ने या खुफिया एजेंसी से नज़र रखने से काम नहीं चलने वाला, शायद इसीलिए देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह मौलाना और मौलवियों से भी मदद मांगने में गुरेज़ नहीं कर रहे क्योंकि हकीकत में उन्हें उनके सिवा और कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। केंद्र सरकार के होश उड़ने का एक बड़ा कारण आईएस का वो वीडियो भी है जिसमें दो हिंदुस्तानी सीरिया में ट्रेनिंग लेते दिख रहें हैं और बगदादी ने यह दावा भी किया है कि ऐसे कई और भारतीय नौजवान हैं जो उसके लिए सीरिया में लड़ रहे हैं और लड़ने को तैयार बैठे हैं।
यानि देश के लिए आईसिस अब खतरे के निशान से ऊपर पहुंच चुका है। इस बात की पुष्टि पिछले कुछ महीनों में देश के तमाम राज्यों से पकड़े गए ऐसे नौजवान करते हैं जो आईएस में शामिल होने की फिराक में थे। इसमें सबसे ज्यादा चिंता की बात है कि इन नौजवानों में एक महिला भी शामिल है जिसकी उम्र करीब 26 साल बताई जा रही है। यानि कल तक जिस आईएसआईएस का प्रभाव विदेशी महिलाओं तक सीमित था वह अब भारत में भी दिखने लगा है। गंभीर मसला यह भी है कि पिछले दिनों हैदराबाद से जिस लड़के को आईसिस से संपर्क साधने के कारण गिरफ्तार किया गया था उसके स्कूल रिकॉर्ड के हिसाब से उसकी उम्र सिर्फ 16 साल थी और वह सीधे बगदादी के संपर्क में था और तो और अभी तक जितने लोगों को आईएस में जाना से रोका गया है उसमें निचले वर्ग से लेकर उच्च मध्यम वर्ग तक के लोग शामिल हैं। यानि नौजवान महिला-पुरुष, नाबालिग, गरीब-अमीर लगभग सभी तक आईएसआईएस पहुंच चुका है।
लेकिन यहां सवाल यह खड़ा होता है की आखिर देश के लिए गंभीर खतरा बन चुके आईएस को इतना अंदर तक घुसने देने की जिम्मेदारी बनती किसकी है
? सीधे तौर पर सरकार की। सरकार की आईएस को लेकर बेपरवाही इसका सबसे बड़ा कारण है क्योंकि 4 महीने पहले भी जब राजनाथ सिंह से आईएस के खतरे को लेकर मीडिया ने सवाल किया था तब इसे उन्होंने हवाहवाई बातों में उड़ा दिया था। अब दवा न लगाने के कारण आईएस देश के लिए नासूर हो चला है और देश को दर्द देने के लिए तैयार है। अगर सरकार ने इसे लेकर कोई कड़े कदम नहीं उठाए तो बहुत जल्द आईएस के निशान दिल्ली और फिर संसद भवन तक नज़र आने लगेंगे। जहां से उसे रोकना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

कठिन है डगर मंजिल की


कठिन है डगर मंजिल की
थकने लगा हूं चलते-चलते
छाले भी रो पड़े हैं अब
मेरे दामन में जो थे लिखे

कैसे रखूं संघर्ष को ज़ारी
अब हंसने लगी है दुनिया सारी
समझने लगी हैं बेगैरत मुझको
मेरे दामन की खुशियां सारी

पर लड़ना मुझको
यह संघर्ष है जीवन मेरा
पत्थरों पर लिखा है नसीब
लिखने वाले ने मेरा

पर हां,
इस दौर में दिखने लगे हैं
दुनिया के खेले
कुछ हसीन है इसमें, तो कुछ हैं मटमैले

डगर है कठिन मंजिल की
पर छूना है, आसमां मुझको
आशाएं कई है
मेरे नन्हें से जीवन की

शायद है एक वजह यही
दौड़ पड़ता हूं
उम्मीद की किरण दिखें
चाहें कहीं


पर सफर धुंधला रहा है
मेरी आंखों से कहीं
शायद डगर कठिन है मेरी
सोच से ज्यादा कहीं

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

अपनी चालों में फंसती कांग्रेस


संसद के चालू सत्र में विपक्ष का रुख कुछ ऐसा नजर आता है जैसे वह ठान कर बैठा है कि सत्ता दल जिस रास्ते पर देश को लेकर जाएगा वह उसके विरुध्द ही देश को खीचेगा। चाहें वह रास्ता सही हो या गलत। संसद के पिछले दो सदनों में भी विपक्ष का रुख कुछ ऐसा ही था। पिछली बार ललित मोदी और व्यापम घोटाले की आग में सदन की कार्रवाई जलकर खाक हो गई थी तो इस बार असहिष्णुता के बेजा बवाल में समय निकलता जा रहा है। इन परिस्तिथियों में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का यह डर भी बढ रहा है कि कहीं भूमि अधिग्रहण की तरह ही जीएसटी बिल भी विवाद की भेंट न चढ जाए। हाल ही में मोदी के सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को चाय पर बुलाने की घटना को हम भाजपा की जीएसटी बिल को पास कराने की प्रतिबध्दता के रूप में देखें तो गलत नही होगा। मोदी जी का यह रुख इस बात को दर्शाता है कि वह ठप पड़े देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए जहर के प्याले भी पीने को तैयार हैं। लेकिन इस मामले में राहुल गांधी की प्रतिक्रिया पर हैरानी भी होती है और हंसी भी आती है। चाय पर चर्चा के बुलावे को राहुल ने  जनता के दबाव किया फैसला बताया है। लेकिन राहुल को यह बताना जरूरी है कि यह कौन सी जनता है जिसने उन्हें 44 सीटें दी हैं या वह जिसने उसे 44 सीटों पर सीमित कर दिया। सवाल यह भी गहरा गया है कि क्या अतीत में संसद तभी चली है जब पीएम ने विपक्षी नेताओं को चाय पर बुलाया है? पता नहीं कांग्रेस जीएसटी पर हां भरेगी या नहीं? लेकिन कांग्रेस के रवैये से यह जरूर स्पष्ट है कि मोदी सरकार को वही करना चाहिए जैसा वह चाह रही है और राहुल तो चाहते हैं कि सरकार उनके आगे नतमस्तक हो जाए।
   
   खैर यह सब तो 2019 तक चलता ही रहेगा लेकिन कांग्रेस के जीएसटी विरोधी रुख को लेकर यह सवाल बहुत बड़ा है कि आखिर वह अपने ही बिल के विरोध में क्यों खड़ी है? आखिर पहली बार 2006-07 में कांग्रेस ने ही तो जीएसटी का मुद्दा उठाया था और उसके बाद 2014 में वह खुद उसे लेकर आई थी। लेकिन अब जिस तरह से कांग्रेस इस बिल पर सत्ता दल का विरोध कर रही है उससे यह बात स्पष्ट है कि उसे डर सता रहा है कि यदि यह बिल अस्तित्व में आया और देश को उम्मीद के मुताबिक इससे लाभ पहुंचा तो कांग्रेस की हालत 2019 के लोकसभा चुनाव में भी इन चुनावों जैसी ही होगी।
   
   इस समय मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौता है संसद के इसी सत्र में बिल को पास कराना क्योंकि यदि 2016 की शुरुआत में ही जीएसटी देश में लागू नहीं हुआ तो विदेशी निवेश के माहौल को गहरा छटका लगेगा। जिसका जिक्र मूडीज ने भी अपनी एक रिपोर्ट में किया है। लेकिन कांग्रेस के अड़ियल रवैये से लगता है कि उसे इस बात से कोई फ्रक नहीं पड़ता। उसे तो बस विपक्ष के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी है। फिलहाल कांग्रेस ने जीएसटी को समर्थन देने के लिए अपनी तीन शर्त रखी हैं। सबसे पहली है जीएसटी की सीमा तय की जाए जो कांग्रेस 18 फीसदी रखना चाहती है लेकिन यदि यह शर्त मान ली जाती है और बिल पास हो जाता है तो भविष्य में सरकार को जीएसटी की सीमा बढाने या घटाने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी जिसके न मिलने पर इसे बदला नहीं जा सकेगा। हाल के हालातों में देश व राज्य की स्थिति को देखते हुए करों को सरकार तीव्रता से बदल देती है जिससे अक्सर राजस्व को गंभीर नुकसान होने से बच जाता है लेकिन सीमा तय करने की सूरत में इससे बचा नहीं जा सकेगा और सरकार कर के मामले में छोटी सी भी तबदीली करने के लिए विपक्ष की मुंह देखा हो जाएगी। कांग्रेस की दूसरी शर्त है राज्यों के साथ विवाद होने पर जीएसटी समीति के मौजूदा सदस्यों में से 75 फीसदी की मंजूरी और तीसरी उत्पादक राज्यों से किसी भी प्रकार की खरीद पर राज्य को एक फीसदी अधिक टैक्स अदा करने की। यहां उल्लेखनीय है कि कांग्रेस जिन तीन मांगों पर अड़ी है वह उसके द्वारा लाए गए 2014 के बिल में नहीं थी। जब उस समय इनकी जरुरत नहीं थी तो अब ऐसी क्या आफ्त है कि इसके बिना यह बिल देश को नुकसान पहुंचा देगा। हकीकत में कांग्रेस की इन तीन शर्तों का कारण है उसका अबतक का बेवजह का विरोध। जिसके कारण कांग्रेस इस बिल पर चर्चा से भागती रही है और हकीकत में उसने जनता को इसका कोई ठोस कारण भी नहीं दिया है लेकिन जिस तरह से हर हाल में भाजपा बिल पर चर्चा करना चाहती है उससे कांग्रेस घबरा गई है और अपनी ही चालों में फंसने लगी है तथा इस तरह की बचकानी मांगे सामने रख रही है। इसीलिए कांग्रेस सदन में असहिष्णता का मुद्दा उठाकर सदन के समय को बर्बाद करना चाहती है।  
   
   हालांकि भाजपा की भी इसे नाकामी ही कहा जाएगा की भूमि अधिग्रहण की तरह ही वह जनता को इस बिल के बारे में देश को नहीं समझा सकी। जिसके कारण जनता में अभी असमंजस का माहौल है। उसे देश को यह बताना जरूरी है कि जीएसटी क्या हैइससे किस तरह देश को फायदा होगा और घोटालों पर लगाम लगेगी? किस तरह इस बिल के पास होने से नुकसान तो होगा लेकिन उनका जो टैक्स की चोरी करते हैं।