शुक्रवार, 10 जून 2016

गांव में उड़ती मौत की राख !

छोटू राम थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली राख से पूरा गांव प्रभावित है। किसी को दमा है, किसी की आंखें चली गईं तो कोई चर्म रोग से पीड़ित है लेकिन गरीबी के दंश और थर्मल प्लांट के श्राप के साथ यहां के लोग जीने को मजबूर हैं।

 आज विकास का  उद्देश्य मानव जीवन को सरल बनाना है जबकि पहले इसका अर्थ बौद्धिकता से था लेकिन 20वीं शताब्दी के शुरुआत से ही इसके मायने बदल गए और दुनिया विकास के लिए आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौड़ पड़ी। पिछली शताब्दी के आखिरी दशकों में भारत भी इस दौड़ का हिस्सा हो गया और देखते ही देखते विकासशील देशों में शामिल हो गया। लेकिन आज भारत सहित दुनिया के कई देश हैं जहां विकास के नाम पर लोगों के जीवन से खेला जा रहा है। एक ऐसा ही गांव हरियाणा स्थित लापरा भी है।  जो यमुना नगर से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां की जिंदगियों के साथ पिछले 8 सालों से खिलवाड़ हो रहा है लेकिन ना तो राज्य सरकार को इनसे कोई लेना देना है और ना ही केंद्र को। दरअसल बिजली आपूर्ति की मांग पूरी करने के लिए लापरा गांव में बना दीन बंधू छोटू राम थर्मल पावर प्लांट स्थानीय लोगों के लिए मुसीबत बना हुआ है। थर्मल से उडऩे वाली राख से गांव छोटा लापरा के लोग बीमारियों की चपेट में आ गए हैं। थर्मल पावर प्लांट से उड़ने वाली राख यहां मौत बनकर घूम रही है। लापरा गांव के लोग मर-मरकर अपनी जिंदगी काट रहे हैं। गांव में सांस व एलर्जी के मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है।

ना नौकरी मिली ना रोशनी राख फांकने को मजबूर लोग
दीन बंधु छोटू राम विद्युत प्लांट लापरा गांव से सटे 1100 एकड़ भूमि पर स्थित है। इसकी शुरुआत 2008 में हुई थी। इस प्लांट को शुरु करने के लिए दर्जनों गांवों के ग्रामीणों की कृषि योग्य भूमि हमेशा के लिए अधिग्रहित कर ली गई थी। जिसके साथ ही प्रशासन व प्लांट मालिकों द्वारा गांव के लोगों से यह वादा किया गया था कि प्लांट के शुरु होने पर गांव को 24 घंटे बिजली व लोगों को नौकरी मिलेगी। इसके साथ ही गांव विकास की ओर बढेगा लेकिन 8 साल बाद गांव में जहां आज भी पहले की तरह अंधेरा है वहीं ग्रामीण या तो किसानी पर निर्भर हैं या गांव से बाहर जाकर नौकरियां करते हैं। हालांकि कुछ ग्रामीणों को प्लांट द्वारा नौकरी दी गई है लेकिन इनकी संख्या न के बराबर है।
विकास के बजाय इस गांवों के लोग आंखें और अपना स्वास्थ्य खो रहे हैं। लापरा गांवों के लोगों में बड़ी मात्रा में दमा, चर्मरोग, नेत्र संबंधी व फेफड़े की बीमारियां होने लगी हैं। बिजली के प्लांट से उन्हें रोशनी नहीं अंधेरा मिल रहा है। इस समस्या को लेकर गांव की पंचायत ने कई बार अपना विरोध दर्ज किया है। यहां तक की कई बार तो थर्मल प्लांट पर ताला लटकाने तक की धमकी दी है लेकिन हर बार इन्हें आश्वासनों द्वारा समझा बुझाकर चुप करवा दिया जाता है। गांव के सरपंच अजीज खान बताते हैं कि जब 2008 में यह प्लांट चालू हुआ था तो उससे पहले ही विद्युत विभाग के डायरेक्टर और उस समय की कांग्रेस सरकार ने यहां के लोगों को आश्वासन दिया था कि गांव को 24 घंटे बिजली मिलेगी। गांव के आसपास शुद्व वातावरण रहेगा, गांव में मुफ्त दवाई खाना रहेगा लेकिन सभी वादे कागजों की एक फाइल में बंद होकर रह गये।

राख का कुआं ले रहा लोगों की जान !
लापरा गांव इस प्लांट के थर्मल की सफेद राख को इकट्ठा करने के लिए बनाए गए टैंक से 350 मीटर की दूरी पर बसा है। थर्मल पावर प्लांट की वेस्ट सफेद राख को इकट्ठा करने के लिए कंपनी की ओर से गांव छोटा लापरा के नजदीक करीब 30 एकड़ से अधिक जमीन पर दो टैंक बनाए गए हैं। अधिकारियों की ओर से राख को हवा में उडऩे से बचाने के लिए कोई ठोस प्रबंध नहीं किया गया है। जिससे हवा चलने के साथ ही राख गांव को ढक लेती है। यह सिलसिला पिछले 8 सालों से जारी है। गांव के नंबरदार शिवदयाल इस बारे में कहते हैं कि थर्मल से उडऩे वाली राख से गांव में हर घर से लोग बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। गांव में सांस, टीबी व एलर्जी के मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। इन बीमारियों की चपेट में हर वर्ग के लोग आ रहे हैं। वह बताते हैं कि जिस दिन तेज हवा चलती है उस दिन लोग घरों में खाना भी नहीं बना पाते। गांव के सरपंच अजीज़ खान से बातचीत में उन्होंने असल न्यूज को बताया कि इस गांव में लगभग हर व्यक्ति चर्म रोग से ग्रसित हैं। गांव में हर तीन महीने में एक व्यक्ति की हार्ट अटैक से मौत हो जाती है और हर तीसरे व्यक्ति को दमा है।

नहीं हुआ कोई समाधान 

सरपंच अजीज खान ने हमें आगे बताया कि वह कई बार विद्युत प्लांट के चीफ इंजीनियर सदर भटनागर से मिले भी और लिखित में इस राख के विषय पर कारवाई की मांग की लेकिन किसी के सर पर आज तक जू नहीं रेंगी। उन्होंने बताया कि विभागीय अधिकारियों से मिलने के बाद राख पर मोटर से पानी का छिड़काव शुरू कर दिया गया। मगर पानी का यह छिड़काव राख को उडऩे से रोकने के लिए नाकाफी है। उन्होंने राज्य सरकार के पास भी गांव की समस्या को लेकर शिकायत के बारे में पत्र भेजा है लेकिन अभी तक इस बारें में कोई काम नहीं किया गया। वह बताते हैं कि इन टैंकों में पड़ी राख से जहां लोग बीमार हो रहे हैं वहीं किसानों की खेती भी बर्बाद हो रही है। उनके बताए मुताबिक जब यमुना का पानी ओवरफ्लो होता है तो टैंकों की वजह से वह गांव के बाहर नहीं निकल पाता और सीधा गांव में चला जाता है जिससे करीब 250 एकड़ जमीन प्रभावित होती है और यह लगभग हर साल हो रहा है। जिससे यहां का किसान बर्बादी की कगार पर खड़ा है। गांव की आशा वर्कर सुनीता हमें बताती हैं कि जब से यह प्लांट शुरु हुआ है गांव में समस्याओं का अंबार लग गया है। गांववाले तो इसकी जद में है हीं पशु भी इससे नहीं बच पा रहे हैं। दरअसल, राख उड़ने की वजह से वह पशुओं के चारे में मिल रही है। चाहें भुसा हो या घास हर जगह यह राख मौजूद है। इसे पशुओं को खिलाने से उनका लिवर खराब हो रहा है। पशु डॉक्टरों का कहना है कि यहां के भूसे व राख को पशुओं को ना खिलाया जाए ऐसे में गांववालों का सवाल है कि वह अपने पशुओं को खिलाएं तो क्या? सुनाती ने हमें आगे बताया कि इस राख की वजह से खेती भी खराब रही है। इससे फसलों को भी नुकसान हो रहा है। गांववाले एक जुट होकर कई बार प्लांट के चीफ के पास भी इस समस्या को लेकर गए हैं लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। उनके मुताबिक इस समस्या को लेकर प्लांट द्वारा यह भी कहा गया था कि गांव के लोगों को जरूरी उपचार प्लांट की तरफ से मुहैया कराया जाएगा लेकिन अभी तक उपचार के नाम पर भी प्लांट की ओर से कुछ नहीं किया गया है।  


गांव बेहाल प्लांट मालामाल
प्लांट से निकलने वाली राख जहां गांव के लोगों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है। वहीं दूसरी ओर प्लांट के चीफ व अन्य अधिकारी राख को सुखाकर सीमेंट की फैक्ट्रियों को बेचकर खूब माला-माल हो रहे हैं। अजीज खान ने इस बारे में बताया कि प्लांट के मालिकों द्वारा अपनी जेबें भरने के लिए गांव की समस्याओं को और बढाई जा रही हैं। सरपंच के मुताबिक प्लांट अधिकारी इस राख को सीमेंट की एक कंपनी श्री सीमेंट को बेचते हैं। ईंट बनाने के लिए राख का पतला होने जरूरी होता है मोटी राख को कंपनी लेती नहीं है इसलिए रात को समय प्लांट के लोग ट्रैकरों में कलटीवेटर की मदद से इस राख को पतला बना रहे हैं जिससे वह हल्की हो जाती है और थोड़ी सी भी हवा चलने पर ज्यादा उड़ती है। कई बार शिकायत करने पर प्लांट द्वारा यह काम बंद कर दिया गया लेकिन कुछ ही समय बाद वह फिर से ऐसा करने लगते हैं। अज़ीज खान ने हमें बताया कि डीआरडी के हिसाब से ऐसे थर्मल प्लांटों से निकलने वाली राख से जो कमाई होती है उसका पैसा राख से प्रभावित गांव की चिकित्सा पर खर्च होता है लेकिन प्लांट के मालिकों द्वारा चिकित्सा के स्तर पर गांव में कोई काम नहीं कराया जा रहा। प्लांट के आला अधिकारियों के लिए प्लांट से 2 गांवों की दूरी पर 500 एकड़ में रिहाइश की सुविधा की गई है। जो स्वच्छ वातावरण और हरियाली से पूर्ण है। कर्मचारियों की रिहाइश को गांव से मीलों दूर बनाने का कारण उसे राख के प्रदूषण से दूर रखना है।

2008 से पहले इस गांव को जो सपने दिखाए गए थे अब वह डरावनी हकीकत में तबदील हो चुके हैं। जिसे जीने के लिए ग्रामीण मजबूर हैं। दसियों दरखवास्तों के बाद भी ना तो प्लांट अधिकारी इनकी ओर देखने को तैयार हैं और ना ही प्रशासन इनकी सुन रहा है और इस गांव के युवाओं, बुजुर्गों और बच्चों की जिंदगी राख की चपेट में आकर बर्बाद हो रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कब तक ये गांववाले इसी तरह जीते रहेंगे या फिर इनकी जिंदगियों में बदलाव आएगा तो कब ?


प्लांट से निकलने वाली राख से प्रभावित कुछ ग्रामीण

पूजा, निवासी, लापरा गांव
पूजा की उम्र 20 वर्ष है। उसे दमे की बीमारी है। डॉक्टरों के मुताबिक उसे यह बीमारी थर्मल प्लांट से निकलने वाली जहरीली राख की वज़ह से हुई है। पूजा के भाई सुशील कुमार ने असल न्यूज को बताया कि करीब दो साल पहले जब पूजा को सांस में दिक्कत होने लगी तो उन्होंने उसके कुछ टेस्ट करवाये जिसके बाद पता लगा कि उसे दमा है। छोटी उम्र में इस बीमारी की वज़ह से पूजा की जिंदगी ठहर गई है। उसके भाई को दिन-रात यह चिंता सता रही है कि अब उसकी बहन की शादी कैसे होगी।






रिहान, निवासी, लापरा
राख का प्रभाव सिर्फ बड़ों पर ही नहीं बच्चों पर भी पड़ रहा है। जिसकी वज़ह से उनका बचपन खत्म हो रहा है। रिहान की उम्र सिर्फ 2 साल है और उसकी दोनों किडनियां खराब हो रही हैं। उसके पिता लायाकत अली ने हमें बताया कि करीब एक साल पहले रिहान ने घर की छत पर पड़ी मिट्टी खा ली थी जिसमें राख मिली हुई थी। जिसके बाद उसके पेट में तेज दर्द उठने लगा। कुछ टेस्ट कराने पर पता लगा कि मिट्टी में मिली राख का असर उसकी किडनियों पर पड़ा है। जिसकी वज़ह से उसकी दोनों किडनियां खराब होने की कगार पर हैं। लायाकत पिछले एक साल से अपने बेटे का इलाज चंड़ीगढ स्थित एक अस्पताल में करवा रहे हैं। जिसमें करीब दो लाख का खर्चा हो चुका है तथा अभी और पैसा खर्च होना बाकी है लेकिन लियाकत की हिम्मत टूटने लगी है क्योंकि पेशे से एक मजदूर होने के कारण अब उसके पास इतना पैसे नहीं है कि वो अपने बेटे का इलाज करा सके। 


सलामुद्दीन, निवासी, लापरा
सलामुद्दीन लापरा गांव में रहते हैं। प्लांट लगने के करीब 2 साल बाद उनकी आंखें चली गई। डॉक्टरों ने इसका कारण उन्हें राख का आंखों में जाना बताया। इस राख के कारण इनकी आंखें इस कदर खराब हो चुकी हैं कि ऑपरेशन के बाद भी वह ठीक नहीं हो सकीं। सलामुद्दीन के दो बेटे हैं जो उनके साथ ही मजदूरी करते थे। लेकिन उनकी आंखें चले जाने के कारण अब वह काम नहीं कर सकते। आज इस प्लांट की वजह से इनके परिवार की आय का एक स्त्रोत खत्म हो चुका है। सलामुद्दीन के बेटों को चर्म रोग है। ऐसे में उन्हें यह चिंता सता रही है कि इस राख के प्रकोप से कहीं उनकी पीढीयां ही खत्म ना हो जाए।


बुधवार, 4 मई 2016

1999-ए लव स्टोरी !

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कभी यू.पी की व्यवस्था को लेकर तो कभी अपने पिता मुलायम सिंह यादव की वज़ह से सुर्खियों में रहते हैं। लेकिन राजनीतिक मसलों से इतर भी अखिलेश यादव की अपनी एक पहचान है। जो उनकी पत्नी डिंपल यादव से है, जिनसे वह बेहद प्यार करते हैं। राजनीतिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले युवा सीएम की लव लाइफ काफी दिलचस्प रही है। अभूतपूर्व सुंदरता की मालकिन लेकिन बेहद ही सौम्य और शांत डिंपल यादव और उनके पति अखिलेश यादव की प्रेम-कहानी किसी भी हिंदी फिल्म से कम नहीं। डिंपल ठहरी एक आर्मी ऑफिसर की लविंग बेटी तो वहीं अखिलेश मियां देश की राजनीति में बड़ा स्थान रखने वाले सपा सु्प्रीमो मुलायम सिंह यादव के पुत्र। एक का परिवार सियासी दांवपेच से कोसो दूर तो वहीं एक के परिवार में सियासत के दो-चार के अलावा कुछ नहीं। लेकिन कहते हैं ना जोड़ियां तो आसमानों में बनती हैं और इसी कारण डिंपल और अखिलेश भी मिले, दोस्त बने, दोस्ती प्यार में बदली और धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे के हमसाये और हमसफर बन गये लेकिन दोनों के लिए एक दूसरे को पाना इतना आसान नहीं था।

प्यार और राज्य की दीवार
दोनों एक बिल्कुल अलग-अलग पृष्ठभूमि के थे। अखिलेश-डिंपव की पहली मुलाकात लखनऊ कैंट इलाके में कॉमन फ्रैंड के घर पर एक पार्टी के दौरान हुई थी। उस समय अखिलेश ने हाल ही में मैसूर के जयचामराजेंद्र कॉलेज से सिविल इनवायरनमेंट इंजीनयरिंग का पाठ्यक्रम पूरा किया था, जबकि डिम्पल लखनऊ के आर्मी स्कूल में स्कूल की पढ़ाई पूरी कर रही थी। शुरू में वे अच्छे दोस्त बने फिर एक-दूसरे के प्यार में पड़ गए। यह दोनों लड़ाकू जातियों से ताल्लुक रखते थे और राजनीतिक व ऐतिहासिक रूप से एक दूसरे के विरोधी थे। अखिलेश क्रमशः यादव और डिंपल राजपूत जाति से ताल्लुक रखती थीं। उससे भी बुरी बात यह थी की लड़की के गृहराज्य में लोग लड़के के पिता से घोर नफरत करते थे जो बाद में उत्तराखंड नाम का अलग प्रांत बन गया। उसके राज्य के लोग अखिलेश के पिता के उस आदेश को नहीं भूल पाए थे, जो उन्होंने मुजफ्फरनगर के पास रामपुर तिराह में निर्दोष पहाडियों पर हमले करने के लिए दिए थे। यह 1 अक्टूबर 1994 की बात थी। नतीजतन, अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव को एक तरह से उस सीमावर्ती पहाड़ी राज्य में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर दिया गया था।
लेकिन इन सभी बातों से पूरी तरह बेखबर यह जोड़ा नियमित तौर पर मिलता-जुलता रहा। कभी लखनऊ के मोहम्मद बाग क्लब में तो कभी कैंट इलाके के सूर्या क्लब में। वे अक्सर अपने दोस्तों से मिलने के बहाने आपस में मिलते।

परिवार को प्यार का पता चला
उस समय अखिलेश यादव उम्र के तीसरे दशक में प्रवेश कर चुके थे, और डिम्पल की उम्र 17 साल थी। जब वे एक दूसरे से मिलजुल रहे थे उस समय उत्तर प्रदेश के पहाड़ जल रहे थे। 1994 में पुलिस फायरिंग के बाद अलग राज्य की मांग जोर पकड़ चुकी थी। गढवाल और कुमायु के पहाड़ों में धरने-प्रदर्शनों की झड़ी लग गई थी और हरेक दिन अखिलेश के पिता के खिलाफ नारे लगते थे।
अखिलेश जो उस समय पर्यावरण इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, उन्होंने उत्तराखंडियों और अपने पिता के बीच तनाव के बारे में सुना था लेकिन वे इसके राजनीतिक नतीजों को नहीं समझ पा रहे थे। 1996 में अखिलेश ने इनवॉयरनमेंटल इंजीनियरिंग में एमएस करने का फैसला किया और सिड़नी (ऑस्ट्रेलिया) चले गए। हालांकि वे डिम्पल को पत्र लिखते रहे। कभी-कभी पत्र के साथ एक ग्रीटिंग कार्ड भी आ जाता। 1999 में अखिलेश ऑस्ट्रेलिया से पढ़ाई पूरी करके आए। यह वह दौर था जब अखिलेश डिंपल के साथ एक धागे में बंधने के लिए पूरी तरह से तैयार थे लेकिन घरवालों से बात करने में उन्हें थोड़ी हिचक थी
क्योंकि वह जानते थे कि उनके डिम्पल से सबंध में परिवार में कई तरह के विवाद है और उससे निपटना जरूरी है। लेकिन अखिलेश के लिए शादी की बात जल्द करना बहुत जरूरी था क्योंकि उनकी दादी की तबेयत खराब होने के कारण मुलायम सिंह ने उनपर शादी का दबाव डालना शुरू कर दिया था।
ऐसे में अखिलेश ने अपने परिवार को डिम्पल के साथ अपने संबंधों के बारे में बताने का फैसला कर लिया। उन्होंने सबसे पहले अपनी दादी मां मुरती देवी को इस विषय में बताया। उनकी दादी ने बचपन से ही उनका पालन-पोषण किया था और वह उन्हें बहुत प्यार करती थी। वह हर हाल में अखिलेश को खुश देखना चाहती थी इसलिए दादी ने अखिलेश को शादी के लिए अपना स्वीकृति दे दी।

मुलायम का डर
उस समय तक मुलायम को भी अपने बेटे के डिम्पल से सबंध के बारे में पता चल गया था। हालांकि मुलायम सिंह को डिम्पल से कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन उन्हें पहाड़ के आंदोलनकारियों से भय लग रहा था, जिन्होंने एक अलग राज्य की मांग के लिए आंदोलन तेज कर दिया था और यादव नेता को किसी कीमत पर माफ करने की मानसिकता में नहीं थे। उन्हें हाल में उनके भतीजे के बेटों तेजवीर ओर सिल्लू को मिली धमकी से भी चिंता थी जिन्हें हवाईजहाज से उठाकर स्कूल से घर लाया गया था। उन्हें पहाड़ के आंदोलनकारियों ने हमले की धमकी दी थी। बच्चों के दादा और मुलायम सिंह के चचेरे भाई प्रो. रामगोपाल यादव उन्हें सहारनपुर के सरसनवा हवाईपट्टी से वापस सुरक्षित जगहों पर ले गए थे।

उस समय मुलायम केंद्र में रक्षामंत्री थे। उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रमुख यादव घराने अखिलेश की शादी उनके परिवार में करना के लिए आग्रह कर रहे थे लेकिन डिम्पल को लेकर अखिलेश प्रतिबद्ध थे और एक बार दादी की स्वीकृति मिल जाने के बाद उन्होंने सभी को बता दिया कि वे सिर्फ डिम्पल से ही शादी करेंगे।
तत्कालीन सपा महासचिव अमर सिंह अखिलेश की शादी बिहार के एक जाने-माने राजनीतिक परिवार में करवाना चाहते थे लेकिन अखिलेश, डिम्पल के प्यार में इस कदर खोए हुए थे कि कोई अन्य लड़की उन्हें जीवनसाथी के तौर पर स्वीकार नहीं थी। उनके परिवार ने भी उनसे कुछ दिन रुकने के लिए कहा क्योंकि डिम्पल की बड़ी बहन की अभी शादी नहीं हुई थी और उनको ऐसा लग रहा था कि उनकी शादी डिम्पल की शादी से पहले जो जाएगी। उसी समय मीडिया में ये भी खबर तैर रही थी की एक राजनीतिक परिवार का लखनऊ आगमन हो रहा हैं। चूंकि अखिलेश ने अपने प्रेम को रहस्य बनाकर रखा था, स्थानीय अखबार इस खबर से भरे हुए थे कि बिहार और यूपी के दो राजनीतिक परिवारों का मिलन होने वाला है और दोनों रिश्तेदार बनने वाले हैं। हालांकि बाद में पता चला कि ये सारी बातें अफवाह थीं और अखिलेश इन अफवाहों से बिल्कुल बेखबर थे।

परिवार ने मुलायम को मनाया
मुलायम अखिलेश के जिद्दी स्वभाव को जानते थे। उन्होंने पहाड़ में अपने कुछ दोस्तों से बात की और सूर्यकांत धसमाना से राय ली जो डिम्पल के परिवार को नजदीकी से जानते थे। डिम्पल का परिवार किलबउखाल गांव का है जबकि धसमाना का गांव वहां से नजदीक ही है जो पौड़ी-गढ़वाल जिले में पड़ता है। घसमाना इस बारे में कहते हैं किशुरू में मुलायम इस बात से चिंतित थे कि पहाड़ के लोग उनसे नफरत करते है। उन्होंने अपने भाई शिवपाल से अखिलेश को राजी करने को कहा कि वो शादी न करे। अखिलेश ने शिवपाल के साथ बरसों गुजारे हैं। लेकिन हम लोग चाहते थे कि यह संबंध हो।
बिहार के वरिष्ठ समाजवादी नेता कपलि देव सिंह ऐसे नेता थे जिनसे मुलायम को डर भी लगाता था और वे उनकी इज्जत भी करते थे। उन्होंने मुलायम से कहा था कि, ‘ अगर उन्होंने अखिलेश की मर्जी के बिना उसकी शादी कहीं और कर दी तो वे चार परिवारों को दुखी कर देंगे। जहां अखिलेश की शादी होगी  वह लड़की और तुम्हारा घर और जहां डिम्पल की शादी होगी वह लड़का और डिम्पल का घर। आपके एक गलत फैसले से सभी लोग दुखी हो जाएंगे और उसे आजीवन महसूस करेंगे।
उत्तराखंड के वरिष्ठ सपा नेता विनोद बर्थवाल ने भी मुलायम को यही सलाह दी लेकिन जरा दूसरी तरीके से। उन्होंने कहां, ‘देवभूमि की हमारी लड़कियां बहुत ही सुसंस्कृत और पारंपरिक होती है। वे पारिवारिक मूल्यों की इज्जत करती हैं और उसे साथ रखती है। वह आपके बेटे और परिवार के लिए बहुत ही शुभ होगी। जिसके बाद मुलायम इस विवाह के लिए राजी हो गए।

अखिलेश वेडस डिंपल
डिम्पल के घरवालों से बात की गई और वह खुशी-खुशी राजी हो गए। अखिलेश के मुताबिक उस समय के हालात के मद्देनजर से बहुत आसान काम नहीं था। डिम्पल के माता-पिता के बारे में उनका कहना था, ‘वे लोग आसानी से मान गए, ये अच्छा हुआ।’ 

24 नवम्बर 1999 को अखिलेश की डिम्पल से उनके पैतृत गांव सैफई में शादी हो गई। दिल्ली और लखनऊ में प्रीतिभोज का आयोजन हुआ। अमर सिंह इन सब आयोजनों में मुख्य भूमिका में देखे गए। और देश की तमाम बड़ी राजनीतिक और कॉरपोरेट हस्तियां इन प्रीतिभोज में शामिल हुई, जिनमें उद्योग और मनोरंजन जगत की मशहूर हस्तियां शामिल थीं।

एक दूजे से बिल्कुल अलग
डिंपल और अखिलेश एक दूसरे से पूरी तरह से अलग हैं, इसके बाद भी वे सफल दंपति हैं। अखिलेश की रुचि राजनीति और स्पोर्टस हैं। वहीं डिंपल को घुड़सवारी और पेटिंग का शौक है। अखिलेश अपनी निजी जिंदगी में डिंपल का बहुत सम्मान करते हैं यही वजह है कि कई बार उनके मुंह से ये सुना गया कि शादी करके मेरी किस्मत खुल गई। 17 साल की इस शादी में इनके तीन प्यारे-प्यारे बच्चे अदिति, टीना और अर्जुन हैं। डिंपल अखिलेश को प्यार से अखिलेश दादा के नाम से पुकारती हैं। अपने बिजी शेड्यूल से समय निकालकर ये दोनों घंटों साथ में समय बिताते हैं। परिवार को जानने वाले बताते हैं कि अखिलेश देर रात को भी डिंपल के साथ समय बिताने के लिए कॉफी शॉप जाते हैं।

मंगलवार, 1 मार्च 2016

बदलाव और किसान

देश आजाद होने के 9 साल बाद फिल्म आई थी 'मदर इंडिया'। वैसे तो यह फिल्म एक मां पर आधारित थी लेकिन इसमें आजाद भारत के उस किसान की दुर्दशा का सटीक चित्रण किया गया था जो आजादी के 9 साल बाद भी गुलाम ही था। जुल्म उसपर तब भी उसी तरह ढाये जा रहे थे जैसे 1947 से पहले। बस फर्क इतना था कि जुल्म करने वाले हाथ गौरे नहीं काले थे। उस समय का किसान साहुकारों और जमीनदारों के पैरों तले दम तोड़ रहा था। आमदनी के नाम पर अगर उसे पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी भी मयस्सर हो जाए तो गनीमत थी। वो जीवन काट रहा था तो इस उम्मीद के सहारे की बदलते भारत के साथ उसकी दशा भी बदलेगी।
वक्त बदला, चहरे बदले, कमान एक पीढी से दूसरी पीढी ने संभाली, सत्ता में भी परिवर्तन आया, जय किसान के नारे दिए गए, हर चुनाव में, बजट में किसानों की बात की गई। परिवर्तन कि बियार चली लेकिन वक्त दर वक्त किसान के हालात शायद देश में इस स्तर तक गिर चुके थे कि बदलाव उसतक कभी पहुंच ही नहीं सकी। कुछ जिनकी उम्मीद टूट चुकी थी उन्होंने आत्महत्या से हाथ मिलाया तो कुछ ने शहरों की राह पकड़ ली तो कुछ अपनी जमीन को मां कहकर उसी से चिपके रहे। इस आस के सहारे की शायद 'दाता' 'अन्नदाता' की दुर्दशा की ओर ध्यान दे।
हाल ही में मोदी सरकार ने अपना तीसरा बजट देश की जनता के सामने रखा। जिसमें बीते करीब 85 बजटों की तरह ही कुछ सपने दिखाए गए। '2022 तक किसानों की आय दोगुनी होगी' जब यह बात अरुण जेटली ने संसद में कही तो तालियों की ग़ड़गड़ाहट से पूरा सदन गूंज उठा लेकिन इस गड़गड़ाहट के पीछे अंधेरे कोने में छुपे किसान का दर्द छुपा रहा गया और दबे रह गए कई सवाल। इन सवाल में सबसे बड़ा सवाल था कि यदि सरकार को अपना यह वादा याद भी रहा और 2022 तक उसकी आय दोगुनी हो भी गई तो उससे होगा क्या2003-2004 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार उस समय भारतीय किसान की प्रतिदिन आय करीब 70.5 रुपये थी यानि मासिक आय करीब 2115 रुपये। जो आज 2016 में 3000 से ज्यादा नहीं है। जिसके हिसाब से सरकार के वादे के अनुसार उसकी आय आज से 6 साल बाद हो जाएगी करीब 6000 रुपये प्रतिमाह यानि 200 रुपये प्रतिदिन। लेकिन उससे होगा क्या? वह अपने परिवार को दो वक्त की रोटी देगा। बच्चों को शिक्षा भी देगा और त्योहारों पर उन्हें नए कपड़े भी दिलाएगा। लेकिन तब भी साहूकारों या बैंकों से कर्ज लेकर ही, जो वो आज भी करता है। तब भी वैसा ही होगा, तो परिवर्तन कहां आया? जो किसान आज आत्महत्या कर रहा है तब भी करेगा। भारत में शायद आत्महत्या, बदहाली, गरीबी ही उसके जीवन का सत्य़ है और नियति भी क्योंकि इस देश में जीवन जीने का अधिकार किसान को कभी मिला ही नहीं।
आज किसानों की इस दशा की जिम्मेदार देश की सरकारें हैं। मैं स्पष्ट कर दूं की मै बात सिर्फ कांग्रेस की ही नहीं कर रहा वह सरकार चाहें मोरारजी देसाई की हो, चंद्रशेखर या अटल जी या नरेंद्र मोदी की किसी ने खेती की बदहाली कि ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया। आपको बता दूं की भारत में कुल 8 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर खेती होती है। जिसमें सिर्फ 28 प्रतिशत भूमि ऐसी है जिसपर सिंचाई के साधन उपलब्ध है बाकि 72 प्रतिशत भूमि आज भी इंद्रदेवता पर निर्भर करती है। खेती की बदहाली और गरीबी के कारण आज का किसान हल छोड़कर छेनी हथोड़ा चलाने के लिए विवश है।
 इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जहां एक धोबीअपने एक गधे के साथ महीना भर काम करने के बाद पांच से 6 हजार रुपये तक तक कमा लेता है। वहां एक किसान अपने चार-पांच पारिवारिक सदस्यों और एक जोड़े बैल के साथ महीना भर पसीना निकालने के बाद भी 3000 या 3200 रुपये से ज्यादा नहीं कमा पाता और इस आय में उसके पूरे परिवार का योगदान होता है। मेरे एक और उदाहरण से शायद आप किसानों की दयनीय स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। किसी महानगर में घरों में बर्तन मांजने और झाड़ू पोंछा करने वाली किसी महिला की आय से भी कम एक किसान परिवार की आय है। शहर में कोई महिला महीने में सिर्फ 60-90 घंटे काम करके 7 से 8 हजार रुपये मासिक कमा लेती हैऔर एक किसान परिवार पूरे महीने दिन-रात काम करने के बावजूद 3200 रुपये भी मुश्किल से कमा पाता है। इससे बड़ा दुर्भाग्य हमारे लिए और क्या हो सकता हैयह देश विकास के पथ पर कैसे आगे बढ सकता है जब उसका अन्नदाता ही भूखा है। 





शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

देश के लिए नासूर बन चुका है आईएसआईएस!

बात कुछ महीनों पहले कश्मीर घाटी में झंडे फहराने के साथ शुरु हुई थी। वो भी खास शुक्रवार के दिन नवाज पढने के बाद से। जिसमें कुछ घाटी के नौजवानों को काले झंडे लिए उद्दंड मचाते देखा गया था। जिसे सरकार ने नज़र अंदाज कर दिया। लेकिन यह सिलसिला कुछ यूं चला की घाटी में हर शुक्रवार ऐसे दर्शय आम हो गए। जिस बात का मैं जिक्र कर रहा हूं शायद इतने से आप उसे समझ गए होंगे क्योंकि देश में कश्मीर से होते हुए आईएसआईएस का खतरा दिनोंदिन कदम बढाता देश की दहलीज के एक कदम अंदर तक आ चुका है और अब उससे मुंह मोडा या इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। आईएस के निशान जो कल तक सिर्फ कश्मीर घाटी तक नज़र आ रहे थे अब एक-एक कर देश के करीब 13 राज्यों में दिखने लगे हैं। शायद इसी कारण कल तक जो इलैक्ट्रानिक न्यूज चेनल जिस आईएसआईएस को सिर्फ कुछ खास शोज में चला रहे थे अब वह प्राइम टाइम में भी जगह पाने लगा हैं।


हालात कुछ इस कदर खराब हो चले हैं कि देश की जो खुफिया एजेंसी आईसिस को आसानी से रोकने का दम भर रही थी उसकी हवा भी फुग्गे की तरह निकल गई है और शायद मोदी सरकार को भी इस बात का इल्म हो चला है कि अब सिर्फ नेटवर्क को तोड़ने या खुफिया एजेंसी से नज़र रखने से काम नहीं चलने वाला, शायद इसीलिए देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह मौलाना और मौलवियों से भी मदद मांगने में गुरेज़ नहीं कर रहे क्योंकि हकीकत में उन्हें उनके सिवा और कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। केंद्र सरकार के होश उड़ने का एक बड़ा कारण आईएस का वो वीडियो भी है जिसमें दो हिंदुस्तानी सीरिया में ट्रेनिंग लेते दिख रहें हैं और बगदादी ने यह दावा भी किया है कि ऐसे कई और भारतीय नौजवान हैं जो उसके लिए सीरिया में लड़ रहे हैं और लड़ने को तैयार बैठे हैं।
यानि देश के लिए आईसिस अब खतरे के निशान से ऊपर पहुंच चुका है। इस बात की पुष्टि पिछले कुछ महीनों में देश के तमाम राज्यों से पकड़े गए ऐसे नौजवान करते हैं जो आईएस में शामिल होने की फिराक में थे। इसमें सबसे ज्यादा चिंता की बात है कि इन नौजवानों में एक महिला भी शामिल है जिसकी उम्र करीब 26 साल बताई जा रही है। यानि कल तक जिस आईएसआईएस का प्रभाव विदेशी महिलाओं तक सीमित था वह अब भारत में भी दिखने लगा है। गंभीर मसला यह भी है कि पिछले दिनों हैदराबाद से जिस लड़के को आईसिस से संपर्क साधने के कारण गिरफ्तार किया गया था उसके स्कूल रिकॉर्ड के हिसाब से उसकी उम्र सिर्फ 16 साल थी और वह सीधे बगदादी के संपर्क में था और तो और अभी तक जितने लोगों को आईएस में जाना से रोका गया है उसमें निचले वर्ग से लेकर उच्च मध्यम वर्ग तक के लोग शामिल हैं। यानि नौजवान महिला-पुरुष, नाबालिग, गरीब-अमीर लगभग सभी तक आईएसआईएस पहुंच चुका है।
लेकिन यहां सवाल यह खड़ा होता है की आखिर देश के लिए गंभीर खतरा बन चुके आईएस को इतना अंदर तक घुसने देने की जिम्मेदारी बनती किसकी है
? सीधे तौर पर सरकार की। सरकार की आईएस को लेकर बेपरवाही इसका सबसे बड़ा कारण है क्योंकि 4 महीने पहले भी जब राजनाथ सिंह से आईएस के खतरे को लेकर मीडिया ने सवाल किया था तब इसे उन्होंने हवाहवाई बातों में उड़ा दिया था। अब दवा न लगाने के कारण आईएस देश के लिए नासूर हो चला है और देश को दर्द देने के लिए तैयार है। अगर सरकार ने इसे लेकर कोई कड़े कदम नहीं उठाए तो बहुत जल्द आईएस के निशान दिल्ली और फिर संसद भवन तक नज़र आने लगेंगे। जहां से उसे रोकना बहुत मुश्किल हो जाएगा।