शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

देश के लिए नासूर बन चुका है आईएसआईएस!

बात कुछ महीनों पहले कश्मीर घाटी में झंडे फहराने के साथ शुरु हुई थी। वो भी खास शुक्रवार के दिन नवाज पढने के बाद से। जिसमें कुछ घाटी के नौजवानों को काले झंडे लिए उद्दंड मचाते देखा गया था। जिसे सरकार ने नज़र अंदाज कर दिया। लेकिन यह सिलसिला कुछ यूं चला की घाटी में हर शुक्रवार ऐसे दर्शय आम हो गए। जिस बात का मैं जिक्र कर रहा हूं शायद इतने से आप उसे समझ गए होंगे क्योंकि देश में कश्मीर से होते हुए आईएसआईएस का खतरा दिनोंदिन कदम बढाता देश की दहलीज के एक कदम अंदर तक आ चुका है और अब उससे मुंह मोडा या इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। आईएस के निशान जो कल तक सिर्फ कश्मीर घाटी तक नज़र आ रहे थे अब एक-एक कर देश के करीब 13 राज्यों में दिखने लगे हैं। शायद इसी कारण कल तक जो इलैक्ट्रानिक न्यूज चेनल जिस आईएसआईएस को सिर्फ कुछ खास शोज में चला रहे थे अब वह प्राइम टाइम में भी जगह पाने लगा हैं।


हालात कुछ इस कदर खराब हो चले हैं कि देश की जो खुफिया एजेंसी आईसिस को आसानी से रोकने का दम भर रही थी उसकी हवा भी फुग्गे की तरह निकल गई है और शायद मोदी सरकार को भी इस बात का इल्म हो चला है कि अब सिर्फ नेटवर्क को तोड़ने या खुफिया एजेंसी से नज़र रखने से काम नहीं चलने वाला, शायद इसीलिए देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह मौलाना और मौलवियों से भी मदद मांगने में गुरेज़ नहीं कर रहे क्योंकि हकीकत में उन्हें उनके सिवा और कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। केंद्र सरकार के होश उड़ने का एक बड़ा कारण आईएस का वो वीडियो भी है जिसमें दो हिंदुस्तानी सीरिया में ट्रेनिंग लेते दिख रहें हैं और बगदादी ने यह दावा भी किया है कि ऐसे कई और भारतीय नौजवान हैं जो उसके लिए सीरिया में लड़ रहे हैं और लड़ने को तैयार बैठे हैं।
यानि देश के लिए आईसिस अब खतरे के निशान से ऊपर पहुंच चुका है। इस बात की पुष्टि पिछले कुछ महीनों में देश के तमाम राज्यों से पकड़े गए ऐसे नौजवान करते हैं जो आईएस में शामिल होने की फिराक में थे। इसमें सबसे ज्यादा चिंता की बात है कि इन नौजवानों में एक महिला भी शामिल है जिसकी उम्र करीब 26 साल बताई जा रही है। यानि कल तक जिस आईएसआईएस का प्रभाव विदेशी महिलाओं तक सीमित था वह अब भारत में भी दिखने लगा है। गंभीर मसला यह भी है कि पिछले दिनों हैदराबाद से जिस लड़के को आईसिस से संपर्क साधने के कारण गिरफ्तार किया गया था उसके स्कूल रिकॉर्ड के हिसाब से उसकी उम्र सिर्फ 16 साल थी और वह सीधे बगदादी के संपर्क में था और तो और अभी तक जितने लोगों को आईएस में जाना से रोका गया है उसमें निचले वर्ग से लेकर उच्च मध्यम वर्ग तक के लोग शामिल हैं। यानि नौजवान महिला-पुरुष, नाबालिग, गरीब-अमीर लगभग सभी तक आईएसआईएस पहुंच चुका है।
लेकिन यहां सवाल यह खड़ा होता है की आखिर देश के लिए गंभीर खतरा बन चुके आईएस को इतना अंदर तक घुसने देने की जिम्मेदारी बनती किसकी है
? सीधे तौर पर सरकार की। सरकार की आईएस को लेकर बेपरवाही इसका सबसे बड़ा कारण है क्योंकि 4 महीने पहले भी जब राजनाथ सिंह से आईएस के खतरे को लेकर मीडिया ने सवाल किया था तब इसे उन्होंने हवाहवाई बातों में उड़ा दिया था। अब दवा न लगाने के कारण आईएस देश के लिए नासूर हो चला है और देश को दर्द देने के लिए तैयार है। अगर सरकार ने इसे लेकर कोई कड़े कदम नहीं उठाए तो बहुत जल्द आईएस के निशान दिल्ली और फिर संसद भवन तक नज़र आने लगेंगे। जहां से उसे रोकना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

कठिन है डगर मंजिल की


कठिन है डगर मंजिल की
थकने लगा हूं चलते-चलते
छाले भी रो पड़े हैं अब
मेरे दामन में जो थे लिखे

कैसे रखूं संघर्ष को ज़ारी
अब हंसने लगी है दुनिया सारी
समझने लगी हैं बेगैरत मुझको
मेरे दामन की खुशियां सारी

पर लड़ना मुझको
यह संघर्ष है जीवन मेरा
पत्थरों पर लिखा है नसीब
लिखने वाले ने मेरा

पर हां,
इस दौर में दिखने लगे हैं
दुनिया के खेले
कुछ हसीन है इसमें, तो कुछ हैं मटमैले

डगर है कठिन मंजिल की
पर छूना है, आसमां मुझको
आशाएं कई है
मेरे नन्हें से जीवन की

शायद है एक वजह यही
दौड़ पड़ता हूं
उम्मीद की किरण दिखें
चाहें कहीं


पर सफर धुंधला रहा है
मेरी आंखों से कहीं
शायद डगर कठिन है मेरी
सोच से ज्यादा कहीं

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

अपनी चालों में फंसती कांग्रेस


संसद के चालू सत्र में विपक्ष का रुख कुछ ऐसा नजर आता है जैसे वह ठान कर बैठा है कि सत्ता दल जिस रास्ते पर देश को लेकर जाएगा वह उसके विरुध्द ही देश को खीचेगा। चाहें वह रास्ता सही हो या गलत। संसद के पिछले दो सदनों में भी विपक्ष का रुख कुछ ऐसा ही था। पिछली बार ललित मोदी और व्यापम घोटाले की आग में सदन की कार्रवाई जलकर खाक हो गई थी तो इस बार असहिष्णुता के बेजा बवाल में समय निकलता जा रहा है। इन परिस्तिथियों में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का यह डर भी बढ रहा है कि कहीं भूमि अधिग्रहण की तरह ही जीएसटी बिल भी विवाद की भेंट न चढ जाए। हाल ही में मोदी के सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को चाय पर बुलाने की घटना को हम भाजपा की जीएसटी बिल को पास कराने की प्रतिबध्दता के रूप में देखें तो गलत नही होगा। मोदी जी का यह रुख इस बात को दर्शाता है कि वह ठप पड़े देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए जहर के प्याले भी पीने को तैयार हैं। लेकिन इस मामले में राहुल गांधी की प्रतिक्रिया पर हैरानी भी होती है और हंसी भी आती है। चाय पर चर्चा के बुलावे को राहुल ने  जनता के दबाव किया फैसला बताया है। लेकिन राहुल को यह बताना जरूरी है कि यह कौन सी जनता है जिसने उन्हें 44 सीटें दी हैं या वह जिसने उसे 44 सीटों पर सीमित कर दिया। सवाल यह भी गहरा गया है कि क्या अतीत में संसद तभी चली है जब पीएम ने विपक्षी नेताओं को चाय पर बुलाया है? पता नहीं कांग्रेस जीएसटी पर हां भरेगी या नहीं? लेकिन कांग्रेस के रवैये से यह जरूर स्पष्ट है कि मोदी सरकार को वही करना चाहिए जैसा वह चाह रही है और राहुल तो चाहते हैं कि सरकार उनके आगे नतमस्तक हो जाए।
   
   खैर यह सब तो 2019 तक चलता ही रहेगा लेकिन कांग्रेस के जीएसटी विरोधी रुख को लेकर यह सवाल बहुत बड़ा है कि आखिर वह अपने ही बिल के विरोध में क्यों खड़ी है? आखिर पहली बार 2006-07 में कांग्रेस ने ही तो जीएसटी का मुद्दा उठाया था और उसके बाद 2014 में वह खुद उसे लेकर आई थी। लेकिन अब जिस तरह से कांग्रेस इस बिल पर सत्ता दल का विरोध कर रही है उससे यह बात स्पष्ट है कि उसे डर सता रहा है कि यदि यह बिल अस्तित्व में आया और देश को उम्मीद के मुताबिक इससे लाभ पहुंचा तो कांग्रेस की हालत 2019 के लोकसभा चुनाव में भी इन चुनावों जैसी ही होगी।
   
   इस समय मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौता है संसद के इसी सत्र में बिल को पास कराना क्योंकि यदि 2016 की शुरुआत में ही जीएसटी देश में लागू नहीं हुआ तो विदेशी निवेश के माहौल को गहरा छटका लगेगा। जिसका जिक्र मूडीज ने भी अपनी एक रिपोर्ट में किया है। लेकिन कांग्रेस के अड़ियल रवैये से लगता है कि उसे इस बात से कोई फ्रक नहीं पड़ता। उसे तो बस विपक्ष के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी है। फिलहाल कांग्रेस ने जीएसटी को समर्थन देने के लिए अपनी तीन शर्त रखी हैं। सबसे पहली है जीएसटी की सीमा तय की जाए जो कांग्रेस 18 फीसदी रखना चाहती है लेकिन यदि यह शर्त मान ली जाती है और बिल पास हो जाता है तो भविष्य में सरकार को जीएसटी की सीमा बढाने या घटाने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी जिसके न मिलने पर इसे बदला नहीं जा सकेगा। हाल के हालातों में देश व राज्य की स्थिति को देखते हुए करों को सरकार तीव्रता से बदल देती है जिससे अक्सर राजस्व को गंभीर नुकसान होने से बच जाता है लेकिन सीमा तय करने की सूरत में इससे बचा नहीं जा सकेगा और सरकार कर के मामले में छोटी सी भी तबदीली करने के लिए विपक्ष की मुंह देखा हो जाएगी। कांग्रेस की दूसरी शर्त है राज्यों के साथ विवाद होने पर जीएसटी समीति के मौजूदा सदस्यों में से 75 फीसदी की मंजूरी और तीसरी उत्पादक राज्यों से किसी भी प्रकार की खरीद पर राज्य को एक फीसदी अधिक टैक्स अदा करने की। यहां उल्लेखनीय है कि कांग्रेस जिन तीन मांगों पर अड़ी है वह उसके द्वारा लाए गए 2014 के बिल में नहीं थी। जब उस समय इनकी जरुरत नहीं थी तो अब ऐसी क्या आफ्त है कि इसके बिना यह बिल देश को नुकसान पहुंचा देगा। हकीकत में कांग्रेस की इन तीन शर्तों का कारण है उसका अबतक का बेवजह का विरोध। जिसके कारण कांग्रेस इस बिल पर चर्चा से भागती रही है और हकीकत में उसने जनता को इसका कोई ठोस कारण भी नहीं दिया है लेकिन जिस तरह से हर हाल में भाजपा बिल पर चर्चा करना चाहती है उससे कांग्रेस घबरा गई है और अपनी ही चालों में फंसने लगी है तथा इस तरह की बचकानी मांगे सामने रख रही है। इसीलिए कांग्रेस सदन में असहिष्णता का मुद्दा उठाकर सदन के समय को बर्बाद करना चाहती है।  
   
   हालांकि भाजपा की भी इसे नाकामी ही कहा जाएगा की भूमि अधिग्रहण की तरह ही वह जनता को इस बिल के बारे में देश को नहीं समझा सकी। जिसके कारण जनता में अभी असमंजस का माहौल है। उसे देश को यह बताना जरूरी है कि जीएसटी क्या हैइससे किस तरह देश को फायदा होगा और घोटालों पर लगाम लगेगी? किस तरह इस बिल के पास होने से नुकसान तो होगा लेकिन उनका जो टैक्स की चोरी करते हैं। 

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

मुद्दों से भटकता भारत

असहिष्णुता आज ऐसा शब्द बन गया है जिससे देश में शायद ही कोई अपरिचित हो। फेसबुक वैल पर किसी न्यूज वेबसाइट की खबर लगी हो और उसमें इस शब्द का इस्तेमाल हो तो मिनटों में हजारों व्यूज उस खबर को मिल जाते हैं।  नेता, अभिनेता, फिल्मकार, समाजसेवी आज सभी की जुबान पर यह शब्द है। यह मुद्दा अखलाक की मौत के बाद उठा था। उम्मीद के मुताबिक लगता था कि बिहार चुनावों के बाद शायद असहिष्णुता का मुद्दा फीका पड़ जाए पर ऐसा नहीं हुआ। फिलहाल आसार ऐसे हैं की संसद का शीतकालीन सत्र भी इसी असहिष्णुता की भेंट चढ सकता है। इन परिस्तिथियों को देखकर ऐसा लगता है जैसे इसके अलावा देश में और कोई समस्या है ही नहीं। बढती असहिष्णुता के कारण देश में आग लगने वाली है और सभी ने बीड़ा उठाया है देश को बचाने का। लेकिन फिर भी देश बच नहीं पा रहा। वैसे भी यह हमारे देश की खासियत है कि जिस मामले को सुलझाने में पूरा देश लग जाता है वह कभी सुलझता ही नहीं और आखिर में तंग आकर सभी किसी और मुद्दे को पकड़ लेते हैं और लग जाते है देश को उससे निजात दिलाने में।
भारत में वर्ष 2000 के करीब बच्चों के अधिकारों का मुद्दा भी बहुत जोर शोर से उछला था। इसी वर्ष भारत सरकार द्वारा किशोर न्याय अधिनियम भी लाया गया था। जो भारत के बाकी कानूनों की तरह ही बहुत प्रगतिशील कानून था। इसके तहत अठारह वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे के साथ व्यस्कों की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता है। इस कानून के दूसरे हिस्से में  अत्यंत गरीब परिवारों के, अनाथ या छोड़े गए बच्चों के संरक्षण की व्यवस्था भी की गई। 2007 में केंद्र सरकार ने किशोर न्याय अधिनियम को मजबूती से लागू करवाने के लिए समेकित बाल संरक्षण योजना बनाई। इस अधिनियम के अनुसार देश के प्रत्येक जिले में एक बाल गृह, एक आश्रय गृह, एक देखरेख गृह, एक विशेष गृह बनाने के आदेश दिए गए। इन आश्रय गृहों और बाल गृहों में जरूरतमंद बच्चों को रखा जाता है। भारत ही नहीं कई और देशों में भी बच्चों व उनके भविष्य से जुड़े कई कानून लागू है जिनका पालन सख्ती से किया जाता है। लेकिन भारत में बने बाकी कानूनों और नीतियों की तरह ही यह कानून भी सिर्फ पन्नों में दर्ज है। गांव की बात तो बहुत दूर है देश के महानगरों में हजारों बच्चे भूखे पेट सोते हैं। 2012 में सेव दा चिल्ड्रन नामक एक संगठन द्वारा पेश जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक देश में प्रतिदिन करीब 24 फीसदी बच्चे भूखे पेट सो जाते हैं। इस भूख को मिटाने के लिए उन्हें अपने बचपन को छोड़ व्यस्क बन काम करना पड़ता है। वो भी होटलों पर झूठे बर्तन धोने का या फिर शहरों में भीख मांगने वाले गिरोहों में सड़कों पर भीख मांगने का। देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधानपालिकाओं के सामने चाय की दुकानों, होटलों तथा सड़कों पर भींख मांगते कई बच्चे आपको दिख जाएंगे जिन्हें देख अक्सर लोगों को उनपर दया आ जाती है। लेकिन लोकतंत्र के किसी भी अंग को न तो इन मासमों का दर्द दिखाई देता है और न ही किशोर न्याय अधिनियम कानून की याद आती है। यहां तक की बच्चों की देखभाल के नाम पर लाखों की डोनेशन लेने वाले एनजीओ भी इनकी ओर ध्यान नहीं देता। सोचने वाली बात है कि फिलहाल असहिष्णुता को सबसे बड़ा मुद्दा मानने वाला देश वैश्विक भूख सूचकांक के 81 देशों की सूची में 67वां स्थान रखता है। लेकिन यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं। इसीलिए इसपर किसी को बात करने का समय नहीं है। वैसे भी देश हाईटैक हो रहा है बच्चों के भविष्य को संवारने की अब क्या जरूरत।
खैर यह तो बात हुई उन बच्चों की जो बिल्कुल लाचार है जिनके पास व्यव्स्था की अनदेखी के कारण और छोटी उम्र में काम करने के अलावा और कोई चारा ही नहीं है। देश में गरीब और अनाथ बच्चों का एक वर्ग ऐसा भी है जिनकी ओर शायद आजतक कभी किसी का ध्यान ही नहीं दिया गया। एक ऐसी वर्ग जिसकी उम्र 16 या 17 वर्ष है जो दसवीं या बारहवीं कक्षाओं तक पढा है। वह घर के खराब हालातों तथा अन्य कई वजहों के कारण पढाई छोड़ काम करने को मजबूर है लेकिन नाबालिग होने और देश की लचर शिक्षा व्यवस्था के कारण उन्हें कहीं कोई ढंग का काम नहीं मिल पाता। वह लगातार मानसिक तनाव से गुजरते रहते हैं क्योंकि एक ओर जहां इन्हें अपने भविष्य की चिंता होता है वहीं परिवार को पालने का दायित्व इनके छोटे कंधों पर आ पड़ता है और कम उम्र व स्कूल में स्किल डेवेलोपमेंट को लेकर किसी प्रकार की पढाई न होने के कारण यह लगातार पिछड़ते रहते हैं तथा अपना आत्मविश्वास खो बैठते हैं। देश में इसके जैसी ही गरीबी, हर साल बढती किसान आत्महत्या दर, महिला उत्पीड़न, बेरोजगारी और न जाने कितने मसले हैं जो सालों से सुलझने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन बुध्दिजीवी वर्ग, तंत्र और विपक्ष को उनकी सुध लेने का समय ही नहीं है उन्हें तो देश में बढती असहिष्णुता को रोकना है और खुद को चमकाना है। फिलहाल सवाल तो कई हैं लेकिन सबसे महत्तवपूर्ण यह है कि कब तक राजनीति और निजी स्वार्थ को साधने के लिए इस प्रकार के कृत्य होते रहेंगे? और बिना सिर पैर के मुद्दों पर देश में बवाल उठता रहेगा? आखिर कब तक असल मुद्दों को भूल देश का माहौल बिगाड़ने वाले मुद्दे प्रमुख होते रहेंगे?