शनिवार, 7 मार्च 2015

मेला....

हर ओर एक अजीब सा शोर
शहर में शायद कोई मेला है
दुकानें बहुत सी सजी है यहाँ
पर सामान कुछ मैला है

कोई बेचता वादों को
तो कोई नए सपने दिखाता
कोई गिनाता यादों को
तो कोई अपनी झोली फैलाता

कोई देता सुरक्षा की टाँफी
तो कोई पिलाता पानी सबको
कोई पुर्खो की दुहाई देता
तो कोई बनाता मुद्दा बिजली को

कोई खुद को अफ्सर बतलाता
तो कोई कहता आम आदमी
बस इसी समय ये मिलते यहाँ पे
बाद में इनके काल निगल जाता

हर कोई यहाँ खेल खेलता
शहर में बस शोर मचाता
खुद को जनता का सेवक बतलाता
पर मन में है जरूर कुछ छुपाता

हर पाँच में लगता ये यहीं पे
हर बार दुकानें सजती है
पर सामान वहीं होता पुराना
बस आवाज कुछ अलग तरह से लगती है

हमारे भविष्य की चाबी है इनपर
सोच समझकर चुनना इनको
अच्छे माल की उम्मीद तो रखना
पर कभी अन्ध-भक्ति तुम इनकी न करना

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