बुधवार, 25 मार्च 2015

औरत ...

मैने भी जन्म लिया था एक दिन
मै भी तो किसी की बेटी थी
लाढो से पली थी मै भी माँ के
मेरी भी छोटी एक दुनिया थी

पिता का मिला था असीम प्यार
मै तो उनकी दुलारी थी
सपना था मेरी कुछ बनने का
लगती ये दुनिया बङी प्यारी थी

पलभर में सब कुछ खत्म हुआ
दो पल की बस ये आंधी थी
पाप मुझसे ऐसा क्या हुआ
कि ये कहानी मेरे दामन आनी थी

गुनाह था मेरी क्या
जो छीन लिये सपने मुझसे
हक नहीं था मुझे यू जीने का
क्योंकि मै बस एक नारी थी

रात के अंधेरे ने
लूट ली दुनिया मेरी
समाज ने कहा गलती तेरी थी
क्योकि तू थी एक पुरूष नहीं

क्या खुदा से था कहा मैने
मुझको तु ये श्राप दे
आखिर क्यो नहीं सोचा उसने
धरती पर लाने वाली उसे एक नारी थी

क्या मै हिस्सा नहीं इस श्रष्टि का
जो मुझे जीने की आजादी नहीं
कसूर था मेरा बस इतना
की मै आकाश में उङना चाहती थी

उठती सीने में टीस बङी
गलती थी मुझसे क्या हूई
आज उठती उंगलियों से पूछे तो कोई
क्या औरत के कोई अरमान नहीं

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