शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

आरक्षण की समीक्षा का सही समय आ गया है



देश में एक बार फिर आरक्षण का मुद्दा सिर उठाए खड़ा है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस बार यह चिंगारी गुजरात में जली है। उस गुजरात में जिसे कुछ समय पहले तक विकास के सफल मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा था। गुजरात में युवा हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पटेल समुदाय आरक्षण की मांग कर रहा है। पूरा पटेल समुदाय सड़कों पर उतर आया है। जिसके कारण राज्य में कई जगह हिंसक घटनाएं भी हुई। सरकारी संपत्ति को नुकसान भी पहुंचाया गया। कुछ जगहों पर कर्फ्यू भी लगा तथा अहमदाबाद सहित कई जगहों पर इंटरनेट सेवा भी बंद कर दी गई।
यह सब उस गुजरात में हो रहा है जिसकी समृद्धि और विकास मॉडल का उदाहरण पूरे विश्व में दिया जा रहा था। लेकिन आज इस राज्य की हालत देख दया आती है कि यहां राजनैतिक व आर्थिक रूप में सबसे ताकतवर पटेल समुदाय आज इस तरह सड़कों पर उतरकर आरक्षण की मांग कर रहा है। माना की हमारे देश में हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का पूरा हक है साथ ही गुजरात के पटेल समुदाय की आरक्षण की मांग कितनी उचित है, इस पर बहस की गुंजाइश भी है। लेकिन अपनी मांग रखने का जो तरीका उन्होंने अपनाया है वह कहां तक सही है आखिर आप इस तरह के हिंसक प्रदर्शन करके क्या साबित करना चाहते हैं ?
पटेलों ने आरक्षण को लेकर जिस प्रकार का उग्र रूपधारण किया है उससे आऱक्षण का मुद्दा एक बार फिर सतह पर आ गया है। शायद गुर्जर आंदोलन भी लोगों के ज़हन से अभी तक नहीं उतरा होगा। पटेल अपनी इस मांग के पीछे यह तर्क दे रहे है कि पटेल उम्मीदवार को 90 प्रतिशत अंक आने के बाद भी एमबीबीएम कॉलेजों में प्रवेश नहीं मिल पाता वहीं आरक्षण प्राप्त उम्मीदवार केवल 45 प्रतिशत अंक प्राप्त कर प्रवेश पा लेते हैं। हालांकि पटेलों का यह तर्क पूरे देश में आरक्षण से बाहर जातियों की कुंठा और पीड़ा का कुछ हद तक चित्रण जरूर करता है। इस पटेल आंदोलन से कहीं न कहीं यह संदेश जरूर जाता है कि शायद अब वक्त आ गया है कि देश से आरक्षण को खत्म कर दिया जाए क्योंकि इस बात को कोई नहीं झूठला सकते कि आज आरक्षण सिर्फ एक राजनैतिक हथियार के अलावा और कुछ नहीं रह गया तथा ज्यादातर जातियों को पता है कि इसे जन बल के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। कुछ समय पहले राजस्थान में जाट आरक्षण की मांग रद्द करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि पिछड़ेपन की पहचान आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षणिकता को ध्यान में रखकर करना चाहिए न की जाति के पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए।
सर्वोच्च न्यायालय की बात शत् प्रतिशत सही भी है और अब आरक्षण की समीक्षा होना बहुत जरूरी है क्योंकि हकीकत में जिन जातियों को इसका लाभ मिलना चाहिए उन तक इसका लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। आज आए दिन देश के किसी न किसी कोने से आरक्षण की मांग उठती ही रहती है। जबकि आरक्षण की व्यवस्था आजादी के सिर्फ दस साल बाद तक थी। लेकिन सिर्फ अपना वोट बैंक खोने के डर से किसी भी सरकार ने इसे खत्म करने या इसकी समीक्षा करने की कोशिश नहीं की। हमारे देश के संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर भी देश में सदा के लिए आरक्षण जारी रखने के पक्ष में नहीं थे। अगस्त 1949 में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का समर्थन करते हुए भीमराव अंबेडकर, पं जवाहर लाल नेहरू आदि सभी नेताओं ने इसे 10 साल बाद खत्म करने की सिफारिश की थी। देश के सबसे बड़े दलित नेता अंबेडकर बड़े दूरदर्शी थे उन्होंने कहा था कि कुछ वर्षों बाद आरक्षण कुछ अपवादों को छोड़कर सिर्फ गरीबी, पिछडेपन, सामाजिक भेदभाव, अकुशलता आदि को ही जन्म देगा। यह देश के विकास में एक दिन रोड़ा बनकर खड़ा होगा। आज के संदर्भ में देखे तो यह बात बिल्कुल सही साबित होती है। नेहरू जी ने  भी 1961 में सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख आरक्षण का विरोध किया था।
लेकिन इसके बाद भी आज आरक्षण जारी है। हालांकि यह बात सच है कि आरक्षण से कई प्रतिभाएं उभर कर सामने आई लेकिन इस सत्य को भी कोई नहीं झुठला सकता की उससे कहीं अधिक प्रतिभाएं ने आरक्षण के कारण ही अंधेरी गलियों में दम तोड़ दिया। इस आरक्षण की वजह से ही साल दर साल देश की हालत बिगड़ती रही लेकिन भारतीय राजनैतिक पार्टियों अपने मतलब की रोटियां सेकती रही। आज हालात यह है कि कई राज्यों में आरक्षण 50 प्रतिशत से भी अधिक है। अब पार्टियां जातियों के बाद धर्म के नाम पर आरक्षण देने का खेल खेल रही हैं। जिसका उदाहरण हमने पिछली यूपीए सरकार के दौरान देखा जिसने रागनाथन मिश्र आयोग का गठन कर यह सिफारिश की कि अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों में 15 प्रतिशत का आरक्षण होना चाहिए।

संक्षिप्त रूप में हम कहें तो आरक्षण आज सिर्फ देश को पीछे धकेलने और राजनैतिक पार्टियों का हथियार बनकर रह गया है। यह परिस्तिथियों की मांग है कि आरक्षण की समीक्षा होना ही चाहिए। तथा जाति के आधार पर आरक्षण पूर्णरूप से खत्म होना चाहिए। वरना कभी राजस्थान तो कभी गुजरात जैसी घटनाएं देश में प्रतिवर्ष होती ही रहेंगी।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

क्या हम यह स्वतंत्रता दिवस मनाने के हकदार हैं?


इस 15 अगस्त  हम अपनी आजादी का 69वां जश्न मना रहे हैं। बीते 68 वर्षों के दौरान देश ने युद्ध, आपातकाल, दंगे इत्यादि न जाने कितने उतार-चढाव देखे। 200 साल लंबी गुलामी की बेड़ियां टूटने के बाद उसके निशान मिटने में कई वर्षों का समय लग गया जिसके कारण हमारा देश आज भी विकसित देशों की श्रेणी में नहीं आ पाया है। लेकिन इस बारे में बात हम फिर कभी करेंगे। कैसी अजीब विडंबना है ना, जहां एक ओर देश की सरहदों पर लड़ने वालों को आज जंतर-मंतर पर यह कहकर खदेड़ दिया जाता है कि उनके यहां धरना प्रदर्शन करने से देश की सुरक्षा को खतरा है तो वहीं एक स्वतंत्रता सेनानी को अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने में 32 वर्षों का समय लग जाता है।

गौर हरिदास, पुर्व स्वतंत्रता सेनानी...
मैं बात कर रहा हूं गौर हरिदास की। आपने शायद ही उनका नाम कभी सुना होगा। इनका जन्म 1931 में उड़ीसा में हुआ था। गौर हरिदास स्वयं ही नहीं बल्कि उनके पिता और भाई भी स्वतंत्रता सेनानी थे। गौर हरिदास सिर्फ 6 साल उम्र से ही पिता के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने लगे थे और मात्र 14 वर्ष की उम्र में अपने गांव में भारत का झंडा फहराने के कारण अंग्रेज सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया था। देश स्वतंत्र होने के बाद भी उनका देश के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ और वह उड़ीसा से वर्धा आकर महात्मा गांधी के सेवाग्राम आश्रम में राष्ट्र निर्माण का प्रशिक्षण लेने लगे। 1951 में वह सर्वोदय समाज का हिस्सा बनकर संत विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़ गए। उस समय उनकी उम्र मात्र 20 वर्ष थी जब वह तेलंगाना से बिहार तक गांव-गांव जाकर लोगों को भूदान के लिए प्रेरित करते थे। तत्कालीन मुंबई प्रांत के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई को चरखा सिखाने का काम करते-करते खादी बोर्ड में नौकरी कर ली। वह एक सच्चे गांधीवादी थे शायद इसी वजह से कभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में खुद को प्रदर्शित करने की जरूरत नहीं समझी।

पहली बार उन्हें इसकी जरूरत तब महसूस हुई जब उनके बड़े बेटे अनिल के वीजेटीआइ इंजीनियरिंग कोर्स में प्रवेश के लिए कुछ अंक कम पड़ गए। अनिल को पता चला कि स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र को पांच फीसद अंकों की छूट है। तब बेटे की जिद पर पहली बार हरिदास जी 1945 की अपनी जेलयात्रा के कागजात लेकर स्वतंत्रता सेनानी का प्रमाणपत्र हासिल करने मुंबई के कलेक्टर कार्यालय गए। लेकिन उन्हें लचर सरकारी व्यवस्था ने अपने आगे झुका दिया और वह लगातार सरकारी ऑफिसों के चक्कर काटते रहे। सरकारी बाबुओ को यह समझ नहीं आ रहा था की उड़ीसा के स्वतंत्रता सेनानी को महाराष्ट्र में प्रमाणपत्र कैसे दिया जाए? और इसी बात को समझने में उन्हें 32 वर्षों का समय लग गया। शायद उन्हें यह नहीं पता था कि उड़ीसा और महाराष्ट्र भारत के ही हिस्से है और उन्होंने भारत को आजाद कराने की लड़ाई लड़ी थी सिर्फ उड़ीसा या महाराष्ट्र को नहीं। आखिरकार 2008 में महाराष्ट्र सरकार को यह बात समझ आ गई और वह उन्हें 400 रु प्रतिमाह की पेंशन व स्वतंत्रता सेनानी का प्रमाणपत्र देने को राजी हो गई। यह 400 रु पेंशन उन्हें खादी ग्रामोध्योग आयोग की नौकरी से रिटायर होने के बाद दी जानी थी। 78 वर्ष की उम्र में इस बकाया राशि का 40 फीसदी भाग तो उसी समय उन्हें मिल गया था लेकिन शेष 60 फीसद पांच वर्ष के लिए डाकघर में जमा किया जाना था। जिसे पाने के लिए उन्हें मंत्रालय के कई और चक्कर काटने पड़े।

एक स्वतंत्रता सेनानी ने अपना हक पाने के लिए पूरा जीवन अपने ही देश के सिस्टम से संघर्ष करते काट दिया। यह कहानी तो कुछ लोगों के सामने आ गई पर न जाने आज भी कितने गौर हरिदास भारत में है जो ऐसा ही संघर्ष अपने मूलभूत अधिकारों के लिए कर रहे होंगे या शायद कई इस देश की मंगलकामनाऐं करते हुए अपने प्राणों को त्याग चुके होंगे। आज हमारे पास परमाणु बम, टैंक, अत्याधुनिक हथियार न जाने क्या-क्या है लेकिन वो सब किस काम का जब हम अपने सैनिकों व स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान नहीं दे सकते। क्या सच में हम उन्हें बिना सम्मान दिए इस स्वतंत्रता के जश्न में शरीक होने के हकदार हैं?    

बुधवार, 12 अगस्त 2015

याकूब की फांसी सही या नहीं?

एक लंबी बहस, याकूब की दरखवास्तें और 22 वर्षों के इंतजार के बाद आखिरकार मुम्बई धमाकों के दोषी याकूब मेमन को फांसी दे दी गई। इतिहास में पहली बार 30 जुलाई की रात तीन बजे ऐसा हुआ जब सर्वोच्च न्यायालय में किसी केस पर सुनवाई हुई हो । मामले के सभी पहलुओं को देखने के बाद न्यायालय ने अपने फैसले को कायम रखते हुए फांसी की सज़ा को टालने से इंकार कर दिया। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर अब सवाल उठ रहे हैं। माना जाता है सर्वोच्च न्यायालय का फैसला, जनता का फैसला होता है। इसका मतलब याकूब को फांसी जनता ने सुनाई है तो सवाल यह है कि वो कौन लोग है जो अपने ही फैसले पर उंगली उठा रहे हैं? कुछ मुस्लिम सरप्रस्तों की ओर से आवाज यह उठाई जा रही है कि राजीव गांधी के हत्यारों को क्यों बक्शा गया? भुल्लर ने कौन सी समाज सेवा की थी? गोधरा कांड के दोषियों को सजा क्यों नहीं मिली? 1992 के दंगों के दोषियों का क्या हुआ? बाबरी कांड में अभी तक किसी को सजा क्यों नहीं हुई? अगर इन सभी को बक्शा जा सकता है तो याकूब को क्यों नहीं? प्रश्न यहां यह उठता है कि क्या सच में याकूब के साथ अन्याय हुआ? अगर हम

कुछ तथ्यों पर नजर डालों तो जान पाएंगे की याकूब के साथ अन्याय हुआ या नहीं।

1992 के मुंबई दंगे

1992 के मुम्बई धमाकों के जख्म आज भी देश की व्यवसायिक नगरी भुला नहीं पाई हैं। यह देश के दामन पर एक दाग की तरह आज भी वैसे के वैसे हैं। हालांकि 1992 के बाद हुए दंगों के कत्लेआम से लगे खून के छीटों के पीछे, 1992 के दाग छुप जरूर गए हैं लेकिन खत्म नहीं हुए। 1992 के इन दंगों में करीब 900 लोगों ने अपनी जान गवाई थी। लेकिन दंगों के आरोपियों को सजा दिलाने में न राज्य सरकार न केंद्र और न न्यायालय ने ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। यह बात किसी ओर ने नहीं खुद जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा ने एक टीवी चैनल् से कही। अगर 900 लोगों की जान में किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई तो 1993 बम धमाकों में मरे 257 लोगों की लाशों में ऐसा क्या था जो सरकार ने 100 से भी ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी की। शायद इसका कारण था दंगो की रिपोर्ट की उंगलियां शिवसेना और दिवंगत बाल ठाकरे पर उठना । इस रिपोर्ट में बाल ठाकरे को ‘वर्चुल जनरल’ कहा गया था। लेकिन इस रिपोर्ट पर सरकार ने कभी कोई कार्रवाई नहीं की। इसमें कांग्रेस-एनसीपी और शिवसेना-बीजेपी की सरकारें शामिल थी। शायद यही कारण था कि दंगों के 22 साल बाद भी 900 लोगों की मौत के लिए सिर्फ तीन लोगों को दोषी पाया गया और 1993 मुम्बई धमाकों में 100 लोगों को दोषी करार दिया गया। अगर याकूब के पीछे भी राजनीतिक पार्टियां होती तो शायद इस मामले में भी 2 या तीन लोगों को ही दोषी पाया जाता।

1993 दिल्ली बम धमाके


भुल्लर और याकूब के केस में कई समानताएं है। दोनों का जन्म 1960 में हुआ। याकूब 1993 मुम्बई धमाकों का मुख्य आरोपी है और भुल्लर 1993 दिल्ली के बम धमाकों का मुख्य आरोपी। बम धमाकों में शामिल होने से पहले भुल्लर प्रोफेसर बन चुका था और याकूब चार्टिड अकाउंटेंट। भुल्लर ने अपने ‘खालिस्तान-प्रेम’ के मौह में बम धमाके किए और याकूब ने ‘पाकिस्तान प्रेम’ में। याकूब धमाकों के बाद पाकिस्तान भाग गया और भुल्लर जर्मनी। दोनों को ही दूसरे मुल्कों ने भारत को सौंपा। याकूब को नेपाल ने तो भुल्लर को जर्मनी ने भारत को सौंपा। दोनों के खिलाफ टाडा के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया और दोनों को ही निचली अदालतों ने फांसी की सजा सुनाई। इसके बाद भी दोनों का सफर एक जैसा ही रहा। दोनों की अपील सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दी। राष्ट्रपति ने भी दोनों ही के अपराध को अक्षम्य माना और दया याचिका को ठुकरा दिया। दोनों ने फिर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और दोनों को ही निराशा हाथ लगी। और हैरानी की बात तो यह है कि दोनो एक ही तरह की मानसिक बीमारी की चपेट में आए। लेकिन 31 अप्रैल 2014 को दोनो अपराधियों की समानता का सिलसिला टूट गया। सर्वोच्च न्यायालय ने भुल्लर की फांसी उम्र कैद मे बदल दी और 30 जुलाई 2015 को याकूब को फांसी दी गई। क्या इसका कारण यह था कि अकाली दल लगातार भुल्लर की फांसी का विरोध कर रहा था? या भुल्लर के मामले में ऐसा जनआक्रोश नहीं था जैसा याकूब के मामले में था जिसके कारण 30 जुलाई की रात 2 बजे सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन भी किया गया। लेकिन इन जनआक्रोश की तीव्रता में फर्क आया किसकी वजह से आम लोगों की वजह से या ?

राजीव गांधी के हत्यारों को माफी क्यों ?


फरवरी 2014 में सर्वोच्च न्यायलय ने राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी को उम्र कैद में बदल दिया। जिसका कारण कोर्ट ने दिया कि इनकी फांसी की सजा की तारीख तय करने में सरकार ने काफी ज्यादा देर लगा दी। राजीव गांधी के तीनों हत्यारों को टाडा कोर्ट ने 1998 में फांसी की सजा सुनाई थी। लेकिन 16 सालों के बाद भी सरकार इनकी फांसी की तारीख मुकर्रर नहीं कर पाई। जिसके कारण इनकी सजा को उम्र कैद में बदल दिया गया। कोर्ट ने कारण बता दिया लेकिन यह बात भी पूरे देश को पता है कि राजीव गांधी के हत्यारों को सदा तमिलनाडू सरकार का समर्थन मिलता रहा है। आज भी तमिलनाडू सरकार इस कोशिश में जुटी है कि अब राजीव गांधी के हत्यारों को जेल से रिहा कर दिया जाए। यहां सवाल उठता है कि याकूब की सजा भी तो आठ साल पहले सुनाई गई थी और करीब इक्कीस साल वह जेल में काट चुका था तो क्या यह आधार काफी नहीं था उसकी सजा को माफ करने के लिए। यहां शायद कमी इस बात की थी कि भारत में कोई मुस्लिम बहुल राज्य नहीं है या मुस्लिम सरकार नहीं है जो याकूब के समर्थन में खड़ी हो सकती।

1992 बाबरी मस्जिद कांड


बाबरी मस्जिद कांड एक ऐसी घटना जो हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष होने के एजेंडे को गाली देती है। आज भी लोगों के जहन में अयोध्या में हुआ इस कांड की यादें ताजा हैं। राममन्दिर के नाम पर किस तरह से सियासी दलों ने अपनी सियासत की जमीन पुख्ता की थी इससे सभी वाकिफ हैं। 1992 में करीब डेढ लाख कार सेवकों ने मिलकर ऐतिहासिक मस्जिद को गिरा दिया। जिसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए दंगों में करीब दो हजार जाने गई। यहां हैरान करने वाली बात है कि जब यह घटना घटी उस समय देश के लोकप्रिय नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी स्वयं मौजूद थे। इन सभी ने न्यायालय के आदेशों की भी धचियां उड़ा दी। इस विध्वंस की जांच करीब 17 वर्षों तक चलती रही अंत में आडवाणी, जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती आदि कई बड़े नेताओं को इसमें दोषी ठहराया गया। कांड के समय और जब रिपोर्ट आई दोनों बार देश में कांग्रेस की सरकार थी और राज्य में जनता दल लेकिन फिर भी इस कांड को न तो रोका गया और न ही दोषियों को सजा मिली। एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने माना की इस कांड के पीछे सिर्फ हिंदू दल ही नहीं बल्कि कांग्रेस, सपा और बसपा भी शामिल थी। यह बात किसी से नहीं छुपी की देश के कई राजनैतिक दलों के हाथ इसमें रंगे है इसीलिए चाहे सत्ता दल हो या विपक्ष किसी पर भी अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

यही नहीं 1984 के दंगे, हाशिमपुरा हत्याकांड, गोधरा दंगे, मुजफ्फरनगर दंगे आदि देश में कई ऐसे कांड हुए जिनपर आज तक दो या तीन लोगों की ही गिरफ्तारी हुई है और फांसी तो खैर शायद हुई ही नहीं। तो क्या यह मान लिया जिए कि याकूब के साथ नाइंसीफी हुई और उसे फांसी नहीं होना चाहिए थी। नहीं, ऐसा कतई नहीं है कि याकूब को फांसी नहीं होना चाहिए थी वो हजारों लोगों का गुनाहगार है और ऐसे जघ्नय अपराध के लिए फांसी की सजा भी कम है। न्यायलय ने याकूब को अपनी बात कहना का पूरा मौका दिया। लेकिन फिर भी मुस्लिम समुदाय में रोश है। शायद इसका कारण ओवेसी जैसे नेता और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले कुछ दल है। जिन्हें हमारी खस्ताहाल न्यायिक प्रणाली के कारण याकूब जैसे आतंकवादियों को फंसी देने पर देश के अल्पसंख्यक लोगों में देश के खिलाफ जहर खोलने का मौका मिल जाता हैं। लेकिन इन्हें यह नहीं पता कि मुस्लिम समुदाय के बीच इस तरह का जहर घोलना कितना खतरनाक है।