मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

बिहार चुनाव और विकास की बात


चुनाव लोकतंत्र की सबसे महत्तवपूर्ण इकाई है क्योंकि यह किसी भी देश की जनता को अपना प्रतिनिधि चुनने की ताकत देता है। वह प्रतिनिधि जो उस देश व उसके निवासियों के विकास में सबसे महत्तवपूर्ण किरदार निभाता है। अपनी नीतियों व एजेंडों से विकास के नए कीर्तिमान गढता है। ऐसे में अहम प्रश्न यह उठता है कि लोग अपने प्रतिनिधि को कैसे चुने। कैसे हजारों चहरों की भीड़ में वह उस चेहरे की पहचान करें, जो उनके भविष्य को विकास की ओर की अग्रसर करेगा। आमतौर पर नेताओं के इतिहास व उनके वादों को ध्यान में रखकर चुनावों में लोग वोट डालते हैं। भई, तर्क तो यही कहता है। लेकिन यदि भारत के संदर्भ में बात करें तो यह स्थिति कुछ अटपटी है। क्योंकि यहां विकास के नाम पर वोट कम और जाति के नाम पर ज्यादा डाले जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि विकास का मुद्दा चुनावों में उठता ही नहीं है। लेकिन जाति के नारे के सामने विकास की बातें अक्सर बोनी रह जाती हैं। यदि इस मसले पर हम बात बिहार चुनावों के संदर्भ में करें तो विकास का मुद्दे जैसे अपनी जान बचाकर कहीं छुप कर बैठ गया है और बाहर आने तो तैयार ही नहीं।
बिहार चुनावों की शुरुआत तो विकास के नाम पर ही हुई थी लेकिन बातें कैसे जाति, धर्म, गौमांस, तांत्रिक बाबा, ब्रह्मपिशाच, नरभक्षी आदि पर आकर सिमट गयी इस बात को एक बार में बताना काफी मुश्किल है और यदि सिलसिलेवार तरीके से सब बताया जाए तो वक्त बहुत निकल जाएगा। तो सीधा मुद्दे पर आते हैं। आखिर बिहार में विकास का मुद्दा क्यों गायब हो गया। इसके दो कारण हो सकते हैं या तो आजादी के बाद से बिहार में नेता इतने वादे कर चुके हैं कि अब नया कहने को कुछ बचा नही है या फिर महागठबंधन के घटक दल और भाजपा सरकार दोनों ही अपनी नाकामियाबियों का उल्लेख करना नहीं चाहते।
बिहार में नीतीश दो बार सत्ता का स्वाद चख चुके है। लालू भी कुछ वक्त खुद तो कुछ वक्त राबड़ी देवी के द्वारा बिहार की कुर्सी पर काबिज हो चुके हैं और कांग्रेस की तो खैर बिहार में पूरी एक पीढी निकल गई। भाजपा भी पांच साल नीतीश के सहारे बिहार में राज जमा चुकी है। सब सुशासन की दुहाई देकर सत्ता में आए और बिहार में विकास का दावा ठोका लेकिन इस विकास की हकीकत क्या है?  इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के सकल घरेलु उत्पाद में 2001 से 2010 तक बिहार का योगदान 2.1 प्रतिशत था जो आज पांच साल बाद भी इतना ही है। यानि कि पिछले पंद्रह सालों में बिहार में उत्पाद बढा ही नहीं।  प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी बिहार सबसे पीछे है। बिहार के कुछ जिलों में तो प्रति व्यक्ति मासिक आय आज भी 750 रुपये है।  2011 की जनगणना के मुताबिक बिहार में कुल 36 फीसदी लोग साक्षर हैं। जबकि भारत की कुल साक्षरता दर 74 प्रतिशत है। बिहार में सरकारी और गैर सरकारी महाविद्यालयों की संख्या मात्र 665 है। जिसमें जहां 10 महाविद्यालय तकनीकी अभियंत्रण के हैं तो वहीं मेडिकल कॉलिज की संख्या और भी कम है। यानि बिहार शिक्षा के मामले अभी कहीं पीछे है।
देश की जनसंख्या में बिहार की हिस्सेदारी 8.6 फीसदी है लेकिन देश में कुल हिंसापूर्ण अपराध में उसका योगदान 10 फीसदी है। 2011-12 में बिहार के सकल घरेलु उत्पादन में औद्योगिक उत्पादन का योगदान 19.9 प्रतिशत था जो की 2014 में घटकर 18.4 प्रतिशत हो गया। 2006 से 07 के बीच में बिहार में एक लाख 63 हजार छोटे व बड़े औद्योगिक इकाइयां थी बीते दस सालों में इसमें मात्र 35000 इकाइयां और बढी है यानि औद्योगिक इकाइयो में वृध्दि मात्र 2.5 प्रतिशत से भी कम है। ऐसे में बिहार का सारा दारोमदार खेती पर आ पडता है लेकिन उस ओर भी किसी सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। विशेषकर नीतीश के शासन में जिसके कारण नीतीश के शासन काल में न तो खेतिहर भूमि में कोई वृध्दि हुई और न ही उत्पादन में।
विदेशी पूंजी निवेश के मामले में बिहार की तुलना यदि उत्तर प्रदेश से भी की जाए तो वह उससे भी काफी पीछे है। 2014 में जहां उत्तरप्रदेश को 37 विदेशी पूंजी निवेश के आवेदन मिले तो बिहार को मात्र 7 मिले। बिजली मुहैया कराने के मामले में भी बिहार कहीं नहीं टिकता। खैर इन सब में बिहार चाहे पीछे हो लेकिन दशकीय जनसंख्या वृध्दि में बिहार काफी आगे है। जहां राष्ट्रीय जनसंख्या वृध्दि दर 17.6 प्रतिशत है वहीं बिहार की जनसंख्या वृध्दि दर 25.1 प्रतिशत की रफ्तार से आगे बढ रही है। ऐसे में यदि बिहार की जनता को पिछले कुछ दिनों में कुछ मिला है तो वह हैं सड़कें। 2013 में बिहार मे कुल 1 लाख 80 हजार किलोमीटर की पक्की सड़क थी। जो 2014 में बढकर 2 लाख 25 हजार किलोमीटर हो गई। यानि एक साल से भी कम वर्ष में 45,000 किलोमीटर पक्की सड़क।

इन सभी आंकड़ों को देखकर यहां सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इस तरह की बदतर औसत बिहार की बदहाली के लिए जिम्मदार नहीं है? क्या बिहार की जनता को यह जानने का हक नहीं है कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्या बिहार की जनता नहीं चाहती की बिहार में भी विकास की बातें हों? बिहार भी खुशहाल राज्य बने। लेकिन कहते है न की राजनेता अक्सर जनता को वही बताते और दिखाते हैं जो वह चाहते हैं। बिहार का चुनाव मात्र अपशब्दों और आरोप – प्रत्यारोपों तक सिमट कर रह गया है। कोई दल विकास की बात करना ही नहीं चाहता।  

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

कृषिप्रधान देश से किसान कब्रगाह में तब्दील होता भारत

देश में 1995 से लेकर अब तक तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके है लेकिन शायद ही किसी ने कृषि क्षेत्र में होते इस मृत्यू तांडव पर चिंता जताई हो। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 में तकरीबन 13,754 और 2013 में 11,772 किसानों ने आत्महत्या की है। भारत में ज्यादातर किसान कर्ज़, फसल की लागत बढ़ने, सिंचाई की सुविधा न होने, कीमतों में कमी और फसल के बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं। इस साल भी किसान मृत्यू दर का आंकड़ा हजारों के आंकड़े को पार कर चुका है। लगातार 12वें साल महाराष्ट्र के किसान आत्महत्या के मामले में अव्वल है। यहां का सूखाग्रस्त विदर्भ क्षेत्र किसानों की कब्रगाह है। अकेले महाराष्ट्र में 1995 से अब तक 60,750 किसान आत्महत्या कर चुके हैं।
देश के अन्नदाता अन्न के लिए मौहताज 
देश डिजिटल हो रहा है। देश की जीडीपी दर बढ रही है साथ ही देश में राजनीतिक असहयोग की दर भी लगातार बढती जा रही है। हालात यह हैं कि भूमि अधिग्रहण बिल पर सरकार के घुटनों को टिकाकर कांग्रेस किसानों की हिमायती होने का दम ठोक रही है और बीजेपी यह रोना लेकर बैठी है कि वह किसानों के लिए विपक्षियों के अड़ियल रवैये के कारण कुछ नहीं कर सकती। लेकिन बिहार चुनावों में कोई दल बेबस नहीं नजर आता है। उसकी रणनीति बनाने को लेकर विपक्षी और सत्ताधारी दलों में मीटिंगों के दौर भी चल पड़े है। चीन में आई मंदी को भारत के लिए एक सुनहरे अवसर के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री ने इससे देश को फायदा पहुंचाने के लिए इंडिया इंक और इकोनॉमिस्ट के साथ मीटिंग भी की है। लेकिन शायद ही किसी को याद हो की खेती की बिगड़ी अर्थव्यव्सथा को लेकर प्रधानमंत्री या किसी अन्य दल ने ऐसी मीटिंग की तो कब की? देश में हर कोई अपना उल्लू सीधे करने में व्यस्त है लेकिन किसानों की चिंता किसी को नहीं है। शायद इसी का नतीजा है की कर्नाटक देश का पहला सूखा राज्य घोषित हो चुका है और महाराष्ट्र में भी सूखे के हालात बनते जा रहे हैं। तेलांगना में भी सूखे से हालात बद से बदतर हो गए हैं। यानि किसानों के सामने जिंदगी का सवाल है लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। देश के बड़े हिस्से में मानसून की बारिश धम चुकी है और शायद सरकार इस बात से अनभिज्ञ भी नहीं होगी कि इस बरस मानसून की बारिश सामान्य के मुकाबले 14 फीसदी कम दर्ज की गई है। स्थिति कितनी गंभीर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की देश के 641 जिलों में से 283 जिलों में मानसून की बारिश 30 से 60 फीसदी तक कम रिकार्ड की गई है। कभी अकाल ओलावृष्टि और बारिश की वजह से किसान मरता है तो कभी सूखे की वजह से, मरता हर बार किसान ही है। लेकिन जैसे किसी को कोई प्रवाह ही नहीं है। 

मराठावाड़ा में चार सालों के सूखे से घुटने टेकता किसान
मराठावाड़ा के दो किसानों का शव
महाराष्ट्र के मराठावाड़ा में पिछले महीने तक करीब 1300 किसानों के आत्महत्या करने के आंकड़े दर्ज किए गए। मराठवाड़ा के औरंगाबाद, जालना, उस्मानाबाद, नांदेड़, परभनी, बीड़, लातूर, हिंगोली में भयंकर सूखे की स्थिति है और हर तरफ से सिर्फ किसानों की चीख पुकार ही सुनने को मिल रही है। हालात यह तब हैं जब इस सूखा का अंदेशा सरकार को पिछले वर्ष सितंबर में ही लग गया था। लेकिन सरकार को हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार चुनावों की तैयारियां भी तो करनी थी, ऐसी में किसानों के लिए उसके पास वक्त ही कहां था। वैसे तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मराठवाड़ा क्षेत्र के तीन दौरे किए और ख़स्ता  हालात में जीवन बिता रहे किसानो से मिलकर सीएम ने उनका हाल भी जाना। लेकिन लच्छेदार भाषण और झूठे  वायदों के अलावा किसानों को और कुछ नहीं दिया। हालांकि महाराष्ट्र के तीन जिलों हिंगोली, ओसमानाबा और लातूर में खाने के कैंप जरूर लगाए गए है क्योंकि सबसे ज्यादा किसानों के मरने की खबर यहीं से आ रही है। उल्लेखनीय है कि मराठावाड़ा में इस वर्ष 52 फीसदी कम बारिश हुई है। यहां के बांधों में कुल 7.6 फीसदी पानी बचा है। इसके प्रमुख 11 बांधों में से 5 का पानी पूरी तरह सूख चुका है। यहां के हालात इतने खराब है कि लोगों को कई किलोमीटर दूर तक पानी के लिए खानाबदोशों की तरह घूमना पड़ता है। 
ऐसा भी नहीं है कि यहां के ऐसे हालात पहली बार बने हैं। 2014, 13 और 12 में भी यहां का नजारा कुछ ऐसा ही था और इस बार की भाजपा सरकार भी पिछली सरकारों की तरह बेबस बस किसानों को ढांढस बंधाने में लगी थी। पूरे मराठावाड़ा के किसान बोतलबंद पानी और टैंकरों पर निर्भर हैं। इस साल अब तक 1,291 टैंकरों की सप्लाई हो चुकी है और पिछले वर्ष करीब 718 टैंकरों की सप्लाई की गई थी। स्थिति यहां यह है कि कुछ इलाकों में तो लोग हफ्ते भर में सिर्फ दो बार ही नहाते हैं। इतने खराब हालात के बाद भी राज्य के कृषि मंत्री एकनाथ खड़से का कहना है की अगले दो हफ्तों तक हालातों की समीक्षा की जाएगी उसके बाद सूखे से प्रभावित गांवों की घोषणा होगी। जिसका मतलब है कि तबतक किसानों के लिए राहत कार्य शुरू नहीं होगा और दिन बा दिन देश का अन्नदाता दम तोड़ता रहेगा।

यहां के भीषण सूखे का कारण

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक रूप से सूखा रहने वाले इस इलाके में बहुत बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है। जो पानी के पीछे मौजूदा संकट का सबसे बड़ा कारण है। मराठावाड़ा में कम से 70 चीनी की मिले हैं। इस इलाके की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से गन्ने की फसल यहां के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। क्योंकि गन्ने की फसल में पानी और सिंचाई की बहुत जरूरत पड़ती है और इस इलाके में सिंचाई की व्यवस्था न के बराबर है। यहां के किसान इस बात से बिल्कुल अनभिज्ञ है। आज यहां का भूमिगत जल बिल्कुल सूख चुका है। जमीन के 40 फीट नीचे तक पानी का कोई पता ठिकाना नहीं है। यहां की करीब 76 तालुकाओं में से 66 का जल भी पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। जिसकी सबसे बड़ी वजह गन्ने की खेती है। यह बहुत जरूरी है कि इस इलाके को बचाने के लिए सरकार जल्द से जल्द कड़े कदम उठाए तथा यहां गन्ने की खेती पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दे। वैसे यहां सूखे की स्थिति साल 2012 से ही बनी हुई है। इस साल भी यहां केवल जून के शुरूआती माह में बारिश हुई थी। इसके बाद इस इलाके में पानी की एक बूंद तक नहीं दिखी। कम बारिश के कारण ही यहां की खरीफ की फसल पूरी तरह नष्ट हो चुकी है और रबी की फसल की भी कोई गारंटी नहीं है। जिसके कारण यहां का किसान पूरी तरह से टूट चुकी हैं। यदि सरकार ने इस और जल्द ध्यान नही दिया तो भविष्य में स्थिति इससे कहीं गंभीर हो सकती है।

पूरे देश में मंडरा रहा कृषि संकट

देश की करीब 60 प्रतिशत जनसंख्या की आजीविका कृषि क्षेत्र पर आधारित है। लेकिन इस क्षेत्र को लेकर सरकार ने अब तक किसी बड़े नीतिगत बदलाव या घोषणा से परहेज ही किया है। कृषि पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। चालू वित्त वर्ष  में कृषि विकास दर सिर्फ़ 1.1 फीसदी रही है। कृषि की दयनीय हालत के बावजूद अपने पहले बजट में मोदी सरकार ने कृषि आय की बात तो की, लेकिन कृषि बजट में कटौती कर दी। बजट में किसानों के  लिए कुछ खास नहीं रहा। सरकार द्वारा जिस कृषि लोन की बात की जाती है, उसका फायदा किसानों से ज्यादा कृषि उद्योग से जुड़े लोगों को होता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पूरे देश में केवल किसान ही एक ऐसा उत्पादक है जो अपने उत्पाद का मुल्य स्वयं निर्धारित नहीं करता। जिसके कारण अन्य उत्पादक तो मुनाफा कमा लेते है लेकिन किसान के लिए उसकी लागत निकालना ही भारी पड़ जाता है और ऊपर से प्रकृति की मार पड़ जाए तो मौत को गले लगाने से ज्यादा सुख उसे और कोई चीज नहीं दे सकती। यहां एक गंभीर समस्या किसानों में बढते असंतोष के रूप में भी पनप रही है। शायद इसीलिए पुलिस और किसान के संघर्ष की घटनाएं भी बढ रही हैं। इस साल अबतक पुलिस और किसानों के बीच करीब 74 घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जो पिछले वर्ष के मुकाबले दुगनी हैं। कहीं न कहीं इस असंतोष का कारण बढने की प्रमुख वजह सरकार की कॉरपोरेट प्राथमिकता नीति भी है। लेकिन यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि डिजिटल इंडिया के सपने दिखाने वाली सरकार के पास प्रकृति की मार से प्रभावित राज्यों के लिए कोई नीति नहीं है। और एक विडंबना यह भी है कि आखिर ऐसी नौबत आती ही क्यों है कि देश के अन्नदाता को हर साल खुद अन्न के लिए मौहताज होना पड़ता है और तंग आकर मौत को गले लगाना पड़ रहा है। जिसकी वजह से यह देश कृषि प्रधान देश की जगह किसानों की कब्रगाह में तबदील होता जा रहा है।
 

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

आरक्षण की समीक्षा का सही समय आ गया है



देश में एक बार फिर आरक्षण का मुद्दा सिर उठाए खड़ा है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस बार यह चिंगारी गुजरात में जली है। उस गुजरात में जिसे कुछ समय पहले तक विकास के सफल मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा था। गुजरात में युवा हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पटेल समुदाय आरक्षण की मांग कर रहा है। पूरा पटेल समुदाय सड़कों पर उतर आया है। जिसके कारण राज्य में कई जगह हिंसक घटनाएं भी हुई। सरकारी संपत्ति को नुकसान भी पहुंचाया गया। कुछ जगहों पर कर्फ्यू भी लगा तथा अहमदाबाद सहित कई जगहों पर इंटरनेट सेवा भी बंद कर दी गई।
यह सब उस गुजरात में हो रहा है जिसकी समृद्धि और विकास मॉडल का उदाहरण पूरे विश्व में दिया जा रहा था। लेकिन आज इस राज्य की हालत देख दया आती है कि यहां राजनैतिक व आर्थिक रूप में सबसे ताकतवर पटेल समुदाय आज इस तरह सड़कों पर उतरकर आरक्षण की मांग कर रहा है। माना की हमारे देश में हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का पूरा हक है साथ ही गुजरात के पटेल समुदाय की आरक्षण की मांग कितनी उचित है, इस पर बहस की गुंजाइश भी है। लेकिन अपनी मांग रखने का जो तरीका उन्होंने अपनाया है वह कहां तक सही है आखिर आप इस तरह के हिंसक प्रदर्शन करके क्या साबित करना चाहते हैं ?
पटेलों ने आरक्षण को लेकर जिस प्रकार का उग्र रूपधारण किया है उससे आऱक्षण का मुद्दा एक बार फिर सतह पर आ गया है। शायद गुर्जर आंदोलन भी लोगों के ज़हन से अभी तक नहीं उतरा होगा। पटेल अपनी इस मांग के पीछे यह तर्क दे रहे है कि पटेल उम्मीदवार को 90 प्रतिशत अंक आने के बाद भी एमबीबीएम कॉलेजों में प्रवेश नहीं मिल पाता वहीं आरक्षण प्राप्त उम्मीदवार केवल 45 प्रतिशत अंक प्राप्त कर प्रवेश पा लेते हैं। हालांकि पटेलों का यह तर्क पूरे देश में आरक्षण से बाहर जातियों की कुंठा और पीड़ा का कुछ हद तक चित्रण जरूर करता है। इस पटेल आंदोलन से कहीं न कहीं यह संदेश जरूर जाता है कि शायद अब वक्त आ गया है कि देश से आरक्षण को खत्म कर दिया जाए क्योंकि इस बात को कोई नहीं झूठला सकते कि आज आरक्षण सिर्फ एक राजनैतिक हथियार के अलावा और कुछ नहीं रह गया तथा ज्यादातर जातियों को पता है कि इसे जन बल के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। कुछ समय पहले राजस्थान में जाट आरक्षण की मांग रद्द करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि पिछड़ेपन की पहचान आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षणिकता को ध्यान में रखकर करना चाहिए न की जाति के पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए।
सर्वोच्च न्यायालय की बात शत् प्रतिशत सही भी है और अब आरक्षण की समीक्षा होना बहुत जरूरी है क्योंकि हकीकत में जिन जातियों को इसका लाभ मिलना चाहिए उन तक इसका लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। आज आए दिन देश के किसी न किसी कोने से आरक्षण की मांग उठती ही रहती है। जबकि आरक्षण की व्यवस्था आजादी के सिर्फ दस साल बाद तक थी। लेकिन सिर्फ अपना वोट बैंक खोने के डर से किसी भी सरकार ने इसे खत्म करने या इसकी समीक्षा करने की कोशिश नहीं की। हमारे देश के संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर भी देश में सदा के लिए आरक्षण जारी रखने के पक्ष में नहीं थे। अगस्त 1949 में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का समर्थन करते हुए भीमराव अंबेडकर, पं जवाहर लाल नेहरू आदि सभी नेताओं ने इसे 10 साल बाद खत्म करने की सिफारिश की थी। देश के सबसे बड़े दलित नेता अंबेडकर बड़े दूरदर्शी थे उन्होंने कहा था कि कुछ वर्षों बाद आरक्षण कुछ अपवादों को छोड़कर सिर्फ गरीबी, पिछडेपन, सामाजिक भेदभाव, अकुशलता आदि को ही जन्म देगा। यह देश के विकास में एक दिन रोड़ा बनकर खड़ा होगा। आज के संदर्भ में देखे तो यह बात बिल्कुल सही साबित होती है। नेहरू जी ने  भी 1961 में सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख आरक्षण का विरोध किया था।
लेकिन इसके बाद भी आज आरक्षण जारी है। हालांकि यह बात सच है कि आरक्षण से कई प्रतिभाएं उभर कर सामने आई लेकिन इस सत्य को भी कोई नहीं झुठला सकता की उससे कहीं अधिक प्रतिभाएं ने आरक्षण के कारण ही अंधेरी गलियों में दम तोड़ दिया। इस आरक्षण की वजह से ही साल दर साल देश की हालत बिगड़ती रही लेकिन भारतीय राजनैतिक पार्टियों अपने मतलब की रोटियां सेकती रही। आज हालात यह है कि कई राज्यों में आरक्षण 50 प्रतिशत से भी अधिक है। अब पार्टियां जातियों के बाद धर्म के नाम पर आरक्षण देने का खेल खेल रही हैं। जिसका उदाहरण हमने पिछली यूपीए सरकार के दौरान देखा जिसने रागनाथन मिश्र आयोग का गठन कर यह सिफारिश की कि अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों में 15 प्रतिशत का आरक्षण होना चाहिए।

संक्षिप्त रूप में हम कहें तो आरक्षण आज सिर्फ देश को पीछे धकेलने और राजनैतिक पार्टियों का हथियार बनकर रह गया है। यह परिस्तिथियों की मांग है कि आरक्षण की समीक्षा होना ही चाहिए। तथा जाति के आधार पर आरक्षण पूर्णरूप से खत्म होना चाहिए। वरना कभी राजस्थान तो कभी गुजरात जैसी घटनाएं देश में प्रतिवर्ष होती ही रहेंगी।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

क्या हम यह स्वतंत्रता दिवस मनाने के हकदार हैं?


इस 15 अगस्त  हम अपनी आजादी का 69वां जश्न मना रहे हैं। बीते 68 वर्षों के दौरान देश ने युद्ध, आपातकाल, दंगे इत्यादि न जाने कितने उतार-चढाव देखे। 200 साल लंबी गुलामी की बेड़ियां टूटने के बाद उसके निशान मिटने में कई वर्षों का समय लग गया जिसके कारण हमारा देश आज भी विकसित देशों की श्रेणी में नहीं आ पाया है। लेकिन इस बारे में बात हम फिर कभी करेंगे। कैसी अजीब विडंबना है ना, जहां एक ओर देश की सरहदों पर लड़ने वालों को आज जंतर-मंतर पर यह कहकर खदेड़ दिया जाता है कि उनके यहां धरना प्रदर्शन करने से देश की सुरक्षा को खतरा है तो वहीं एक स्वतंत्रता सेनानी को अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने में 32 वर्षों का समय लग जाता है।

गौर हरिदास, पुर्व स्वतंत्रता सेनानी...
मैं बात कर रहा हूं गौर हरिदास की। आपने शायद ही उनका नाम कभी सुना होगा। इनका जन्म 1931 में उड़ीसा में हुआ था। गौर हरिदास स्वयं ही नहीं बल्कि उनके पिता और भाई भी स्वतंत्रता सेनानी थे। गौर हरिदास सिर्फ 6 साल उम्र से ही पिता के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने लगे थे और मात्र 14 वर्ष की उम्र में अपने गांव में भारत का झंडा फहराने के कारण अंग्रेज सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया था। देश स्वतंत्र होने के बाद भी उनका देश के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ और वह उड़ीसा से वर्धा आकर महात्मा गांधी के सेवाग्राम आश्रम में राष्ट्र निर्माण का प्रशिक्षण लेने लगे। 1951 में वह सर्वोदय समाज का हिस्सा बनकर संत विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़ गए। उस समय उनकी उम्र मात्र 20 वर्ष थी जब वह तेलंगाना से बिहार तक गांव-गांव जाकर लोगों को भूदान के लिए प्रेरित करते थे। तत्कालीन मुंबई प्रांत के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई को चरखा सिखाने का काम करते-करते खादी बोर्ड में नौकरी कर ली। वह एक सच्चे गांधीवादी थे शायद इसी वजह से कभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में खुद को प्रदर्शित करने की जरूरत नहीं समझी।

पहली बार उन्हें इसकी जरूरत तब महसूस हुई जब उनके बड़े बेटे अनिल के वीजेटीआइ इंजीनियरिंग कोर्स में प्रवेश के लिए कुछ अंक कम पड़ गए। अनिल को पता चला कि स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र को पांच फीसद अंकों की छूट है। तब बेटे की जिद पर पहली बार हरिदास जी 1945 की अपनी जेलयात्रा के कागजात लेकर स्वतंत्रता सेनानी का प्रमाणपत्र हासिल करने मुंबई के कलेक्टर कार्यालय गए। लेकिन उन्हें लचर सरकारी व्यवस्था ने अपने आगे झुका दिया और वह लगातार सरकारी ऑफिसों के चक्कर काटते रहे। सरकारी बाबुओ को यह समझ नहीं आ रहा था की उड़ीसा के स्वतंत्रता सेनानी को महाराष्ट्र में प्रमाणपत्र कैसे दिया जाए? और इसी बात को समझने में उन्हें 32 वर्षों का समय लग गया। शायद उन्हें यह नहीं पता था कि उड़ीसा और महाराष्ट्र भारत के ही हिस्से है और उन्होंने भारत को आजाद कराने की लड़ाई लड़ी थी सिर्फ उड़ीसा या महाराष्ट्र को नहीं। आखिरकार 2008 में महाराष्ट्र सरकार को यह बात समझ आ गई और वह उन्हें 400 रु प्रतिमाह की पेंशन व स्वतंत्रता सेनानी का प्रमाणपत्र देने को राजी हो गई। यह 400 रु पेंशन उन्हें खादी ग्रामोध्योग आयोग की नौकरी से रिटायर होने के बाद दी जानी थी। 78 वर्ष की उम्र में इस बकाया राशि का 40 फीसदी भाग तो उसी समय उन्हें मिल गया था लेकिन शेष 60 फीसद पांच वर्ष के लिए डाकघर में जमा किया जाना था। जिसे पाने के लिए उन्हें मंत्रालय के कई और चक्कर काटने पड़े।

एक स्वतंत्रता सेनानी ने अपना हक पाने के लिए पूरा जीवन अपने ही देश के सिस्टम से संघर्ष करते काट दिया। यह कहानी तो कुछ लोगों के सामने आ गई पर न जाने आज भी कितने गौर हरिदास भारत में है जो ऐसा ही संघर्ष अपने मूलभूत अधिकारों के लिए कर रहे होंगे या शायद कई इस देश की मंगलकामनाऐं करते हुए अपने प्राणों को त्याग चुके होंगे। आज हमारे पास परमाणु बम, टैंक, अत्याधुनिक हथियार न जाने क्या-क्या है लेकिन वो सब किस काम का जब हम अपने सैनिकों व स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान नहीं दे सकते। क्या सच में हम उन्हें बिना सम्मान दिए इस स्वतंत्रता के जश्न में शरीक होने के हकदार हैं?