मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

कठिन है डगर मंजिल की


कठिन है डगर मंजिल की
थकने लगा हूं चलते-चलते
छाले भी रो पड़े हैं अब
मेरे दामन में जो थे लिखे

कैसे रखूं संघर्ष को ज़ारी
अब हंसने लगी है दुनिया सारी
समझने लगी हैं बेगैरत मुझको
मेरे दामन की खुशियां सारी

पर लड़ना मुझको
यह संघर्ष है जीवन मेरा
पत्थरों पर लिखा है नसीब
लिखने वाले ने मेरा

पर हां,
इस दौर में दिखने लगे हैं
दुनिया के खेले
कुछ हसीन है इसमें, तो कुछ हैं मटमैले

डगर है कठिन मंजिल की
पर छूना है, आसमां मुझको
आशाएं कई है
मेरे नन्हें से जीवन की

शायद है एक वजह यही
दौड़ पड़ता हूं
उम्मीद की किरण दिखें
चाहें कहीं


पर सफर धुंधला रहा है
मेरी आंखों से कहीं
शायद डगर कठिन है मेरी
सोच से ज्यादा कहीं

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

अपनी चालों में फंसती कांग्रेस


संसद के चालू सत्र में विपक्ष का रुख कुछ ऐसा नजर आता है जैसे वह ठान कर बैठा है कि सत्ता दल जिस रास्ते पर देश को लेकर जाएगा वह उसके विरुध्द ही देश को खीचेगा। चाहें वह रास्ता सही हो या गलत। संसद के पिछले दो सदनों में भी विपक्ष का रुख कुछ ऐसा ही था। पिछली बार ललित मोदी और व्यापम घोटाले की आग में सदन की कार्रवाई जलकर खाक हो गई थी तो इस बार असहिष्णुता के बेजा बवाल में समय निकलता जा रहा है। इन परिस्तिथियों में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का यह डर भी बढ रहा है कि कहीं भूमि अधिग्रहण की तरह ही जीएसटी बिल भी विवाद की भेंट न चढ जाए। हाल ही में मोदी के सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को चाय पर बुलाने की घटना को हम भाजपा की जीएसटी बिल को पास कराने की प्रतिबध्दता के रूप में देखें तो गलत नही होगा। मोदी जी का यह रुख इस बात को दर्शाता है कि वह ठप पड़े देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए जहर के प्याले भी पीने को तैयार हैं। लेकिन इस मामले में राहुल गांधी की प्रतिक्रिया पर हैरानी भी होती है और हंसी भी आती है। चाय पर चर्चा के बुलावे को राहुल ने  जनता के दबाव किया फैसला बताया है। लेकिन राहुल को यह बताना जरूरी है कि यह कौन सी जनता है जिसने उन्हें 44 सीटें दी हैं या वह जिसने उसे 44 सीटों पर सीमित कर दिया। सवाल यह भी गहरा गया है कि क्या अतीत में संसद तभी चली है जब पीएम ने विपक्षी नेताओं को चाय पर बुलाया है? पता नहीं कांग्रेस जीएसटी पर हां भरेगी या नहीं? लेकिन कांग्रेस के रवैये से यह जरूर स्पष्ट है कि मोदी सरकार को वही करना चाहिए जैसा वह चाह रही है और राहुल तो चाहते हैं कि सरकार उनके आगे नतमस्तक हो जाए।
   
   खैर यह सब तो 2019 तक चलता ही रहेगा लेकिन कांग्रेस के जीएसटी विरोधी रुख को लेकर यह सवाल बहुत बड़ा है कि आखिर वह अपने ही बिल के विरोध में क्यों खड़ी है? आखिर पहली बार 2006-07 में कांग्रेस ने ही तो जीएसटी का मुद्दा उठाया था और उसके बाद 2014 में वह खुद उसे लेकर आई थी। लेकिन अब जिस तरह से कांग्रेस इस बिल पर सत्ता दल का विरोध कर रही है उससे यह बात स्पष्ट है कि उसे डर सता रहा है कि यदि यह बिल अस्तित्व में आया और देश को उम्मीद के मुताबिक इससे लाभ पहुंचा तो कांग्रेस की हालत 2019 के लोकसभा चुनाव में भी इन चुनावों जैसी ही होगी।
   
   इस समय मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौता है संसद के इसी सत्र में बिल को पास कराना क्योंकि यदि 2016 की शुरुआत में ही जीएसटी देश में लागू नहीं हुआ तो विदेशी निवेश के माहौल को गहरा छटका लगेगा। जिसका जिक्र मूडीज ने भी अपनी एक रिपोर्ट में किया है। लेकिन कांग्रेस के अड़ियल रवैये से लगता है कि उसे इस बात से कोई फ्रक नहीं पड़ता। उसे तो बस विपक्ष के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी है। फिलहाल कांग्रेस ने जीएसटी को समर्थन देने के लिए अपनी तीन शर्त रखी हैं। सबसे पहली है जीएसटी की सीमा तय की जाए जो कांग्रेस 18 फीसदी रखना चाहती है लेकिन यदि यह शर्त मान ली जाती है और बिल पास हो जाता है तो भविष्य में सरकार को जीएसटी की सीमा बढाने या घटाने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी जिसके न मिलने पर इसे बदला नहीं जा सकेगा। हाल के हालातों में देश व राज्य की स्थिति को देखते हुए करों को सरकार तीव्रता से बदल देती है जिससे अक्सर राजस्व को गंभीर नुकसान होने से बच जाता है लेकिन सीमा तय करने की सूरत में इससे बचा नहीं जा सकेगा और सरकार कर के मामले में छोटी सी भी तबदीली करने के लिए विपक्ष की मुंह देखा हो जाएगी। कांग्रेस की दूसरी शर्त है राज्यों के साथ विवाद होने पर जीएसटी समीति के मौजूदा सदस्यों में से 75 फीसदी की मंजूरी और तीसरी उत्पादक राज्यों से किसी भी प्रकार की खरीद पर राज्य को एक फीसदी अधिक टैक्स अदा करने की। यहां उल्लेखनीय है कि कांग्रेस जिन तीन मांगों पर अड़ी है वह उसके द्वारा लाए गए 2014 के बिल में नहीं थी। जब उस समय इनकी जरुरत नहीं थी तो अब ऐसी क्या आफ्त है कि इसके बिना यह बिल देश को नुकसान पहुंचा देगा। हकीकत में कांग्रेस की इन तीन शर्तों का कारण है उसका अबतक का बेवजह का विरोध। जिसके कारण कांग्रेस इस बिल पर चर्चा से भागती रही है और हकीकत में उसने जनता को इसका कोई ठोस कारण भी नहीं दिया है लेकिन जिस तरह से हर हाल में भाजपा बिल पर चर्चा करना चाहती है उससे कांग्रेस घबरा गई है और अपनी ही चालों में फंसने लगी है तथा इस तरह की बचकानी मांगे सामने रख रही है। इसीलिए कांग्रेस सदन में असहिष्णता का मुद्दा उठाकर सदन के समय को बर्बाद करना चाहती है।  
   
   हालांकि भाजपा की भी इसे नाकामी ही कहा जाएगा की भूमि अधिग्रहण की तरह ही वह जनता को इस बिल के बारे में देश को नहीं समझा सकी। जिसके कारण जनता में अभी असमंजस का माहौल है। उसे देश को यह बताना जरूरी है कि जीएसटी क्या हैइससे किस तरह देश को फायदा होगा और घोटालों पर लगाम लगेगी? किस तरह इस बिल के पास होने से नुकसान तो होगा लेकिन उनका जो टैक्स की चोरी करते हैं। 

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

मुद्दों से भटकता भारत

असहिष्णुता आज ऐसा शब्द बन गया है जिससे देश में शायद ही कोई अपरिचित हो। फेसबुक वैल पर किसी न्यूज वेबसाइट की खबर लगी हो और उसमें इस शब्द का इस्तेमाल हो तो मिनटों में हजारों व्यूज उस खबर को मिल जाते हैं।  नेता, अभिनेता, फिल्मकार, समाजसेवी आज सभी की जुबान पर यह शब्द है। यह मुद्दा अखलाक की मौत के बाद उठा था। उम्मीद के मुताबिक लगता था कि बिहार चुनावों के बाद शायद असहिष्णुता का मुद्दा फीका पड़ जाए पर ऐसा नहीं हुआ। फिलहाल आसार ऐसे हैं की संसद का शीतकालीन सत्र भी इसी असहिष्णुता की भेंट चढ सकता है। इन परिस्तिथियों को देखकर ऐसा लगता है जैसे इसके अलावा देश में और कोई समस्या है ही नहीं। बढती असहिष्णुता के कारण देश में आग लगने वाली है और सभी ने बीड़ा उठाया है देश को बचाने का। लेकिन फिर भी देश बच नहीं पा रहा। वैसे भी यह हमारे देश की खासियत है कि जिस मामले को सुलझाने में पूरा देश लग जाता है वह कभी सुलझता ही नहीं और आखिर में तंग आकर सभी किसी और मुद्दे को पकड़ लेते हैं और लग जाते है देश को उससे निजात दिलाने में।
भारत में वर्ष 2000 के करीब बच्चों के अधिकारों का मुद्दा भी बहुत जोर शोर से उछला था। इसी वर्ष भारत सरकार द्वारा किशोर न्याय अधिनियम भी लाया गया था। जो भारत के बाकी कानूनों की तरह ही बहुत प्रगतिशील कानून था। इसके तहत अठारह वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे के साथ व्यस्कों की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता है। इस कानून के दूसरे हिस्से में  अत्यंत गरीब परिवारों के, अनाथ या छोड़े गए बच्चों के संरक्षण की व्यवस्था भी की गई। 2007 में केंद्र सरकार ने किशोर न्याय अधिनियम को मजबूती से लागू करवाने के लिए समेकित बाल संरक्षण योजना बनाई। इस अधिनियम के अनुसार देश के प्रत्येक जिले में एक बाल गृह, एक आश्रय गृह, एक देखरेख गृह, एक विशेष गृह बनाने के आदेश दिए गए। इन आश्रय गृहों और बाल गृहों में जरूरतमंद बच्चों को रखा जाता है। भारत ही नहीं कई और देशों में भी बच्चों व उनके भविष्य से जुड़े कई कानून लागू है जिनका पालन सख्ती से किया जाता है। लेकिन भारत में बने बाकी कानूनों और नीतियों की तरह ही यह कानून भी सिर्फ पन्नों में दर्ज है। गांव की बात तो बहुत दूर है देश के महानगरों में हजारों बच्चे भूखे पेट सोते हैं। 2012 में सेव दा चिल्ड्रन नामक एक संगठन द्वारा पेश जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक देश में प्रतिदिन करीब 24 फीसदी बच्चे भूखे पेट सो जाते हैं। इस भूख को मिटाने के लिए उन्हें अपने बचपन को छोड़ व्यस्क बन काम करना पड़ता है। वो भी होटलों पर झूठे बर्तन धोने का या फिर शहरों में भीख मांगने वाले गिरोहों में सड़कों पर भीख मांगने का। देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधानपालिकाओं के सामने चाय की दुकानों, होटलों तथा सड़कों पर भींख मांगते कई बच्चे आपको दिख जाएंगे जिन्हें देख अक्सर लोगों को उनपर दया आ जाती है। लेकिन लोकतंत्र के किसी भी अंग को न तो इन मासमों का दर्द दिखाई देता है और न ही किशोर न्याय अधिनियम कानून की याद आती है। यहां तक की बच्चों की देखभाल के नाम पर लाखों की डोनेशन लेने वाले एनजीओ भी इनकी ओर ध्यान नहीं देता। सोचने वाली बात है कि फिलहाल असहिष्णुता को सबसे बड़ा मुद्दा मानने वाला देश वैश्विक भूख सूचकांक के 81 देशों की सूची में 67वां स्थान रखता है। लेकिन यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं। इसीलिए इसपर किसी को बात करने का समय नहीं है। वैसे भी देश हाईटैक हो रहा है बच्चों के भविष्य को संवारने की अब क्या जरूरत।
खैर यह तो बात हुई उन बच्चों की जो बिल्कुल लाचार है जिनके पास व्यव्स्था की अनदेखी के कारण और छोटी उम्र में काम करने के अलावा और कोई चारा ही नहीं है। देश में गरीब और अनाथ बच्चों का एक वर्ग ऐसा भी है जिनकी ओर शायद आजतक कभी किसी का ध्यान ही नहीं दिया गया। एक ऐसी वर्ग जिसकी उम्र 16 या 17 वर्ष है जो दसवीं या बारहवीं कक्षाओं तक पढा है। वह घर के खराब हालातों तथा अन्य कई वजहों के कारण पढाई छोड़ काम करने को मजबूर है लेकिन नाबालिग होने और देश की लचर शिक्षा व्यवस्था के कारण उन्हें कहीं कोई ढंग का काम नहीं मिल पाता। वह लगातार मानसिक तनाव से गुजरते रहते हैं क्योंकि एक ओर जहां इन्हें अपने भविष्य की चिंता होता है वहीं परिवार को पालने का दायित्व इनके छोटे कंधों पर आ पड़ता है और कम उम्र व स्कूल में स्किल डेवेलोपमेंट को लेकर किसी प्रकार की पढाई न होने के कारण यह लगातार पिछड़ते रहते हैं तथा अपना आत्मविश्वास खो बैठते हैं। देश में इसके जैसी ही गरीबी, हर साल बढती किसान आत्महत्या दर, महिला उत्पीड़न, बेरोजगारी और न जाने कितने मसले हैं जो सालों से सुलझने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन बुध्दिजीवी वर्ग, तंत्र और विपक्ष को उनकी सुध लेने का समय ही नहीं है उन्हें तो देश में बढती असहिष्णुता को रोकना है और खुद को चमकाना है। फिलहाल सवाल तो कई हैं लेकिन सबसे महत्तवपूर्ण यह है कि कब तक राजनीति और निजी स्वार्थ को साधने के लिए इस प्रकार के कृत्य होते रहेंगे? और बिना सिर पैर के मुद्दों पर देश में बवाल उठता रहेगा? आखिर कब तक असल मुद्दों को भूल देश का माहौल बिगाड़ने वाले मुद्दे प्रमुख होते रहेंगे?
 

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

बिहार चुनाव और विकास की बात


चुनाव लोकतंत्र की सबसे महत्तवपूर्ण इकाई है क्योंकि यह किसी भी देश की जनता को अपना प्रतिनिधि चुनने की ताकत देता है। वह प्रतिनिधि जो उस देश व उसके निवासियों के विकास में सबसे महत्तवपूर्ण किरदार निभाता है। अपनी नीतियों व एजेंडों से विकास के नए कीर्तिमान गढता है। ऐसे में अहम प्रश्न यह उठता है कि लोग अपने प्रतिनिधि को कैसे चुने। कैसे हजारों चहरों की भीड़ में वह उस चेहरे की पहचान करें, जो उनके भविष्य को विकास की ओर की अग्रसर करेगा। आमतौर पर नेताओं के इतिहास व उनके वादों को ध्यान में रखकर चुनावों में लोग वोट डालते हैं। भई, तर्क तो यही कहता है। लेकिन यदि भारत के संदर्भ में बात करें तो यह स्थिति कुछ अटपटी है। क्योंकि यहां विकास के नाम पर वोट कम और जाति के नाम पर ज्यादा डाले जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि विकास का मुद्दा चुनावों में उठता ही नहीं है। लेकिन जाति के नारे के सामने विकास की बातें अक्सर बोनी रह जाती हैं। यदि इस मसले पर हम बात बिहार चुनावों के संदर्भ में करें तो विकास का मुद्दे जैसे अपनी जान बचाकर कहीं छुप कर बैठ गया है और बाहर आने तो तैयार ही नहीं।
बिहार चुनावों की शुरुआत तो विकास के नाम पर ही हुई थी लेकिन बातें कैसे जाति, धर्म, गौमांस, तांत्रिक बाबा, ब्रह्मपिशाच, नरभक्षी आदि पर आकर सिमट गयी इस बात को एक बार में बताना काफी मुश्किल है और यदि सिलसिलेवार तरीके से सब बताया जाए तो वक्त बहुत निकल जाएगा। तो सीधा मुद्दे पर आते हैं। आखिर बिहार में विकास का मुद्दा क्यों गायब हो गया। इसके दो कारण हो सकते हैं या तो आजादी के बाद से बिहार में नेता इतने वादे कर चुके हैं कि अब नया कहने को कुछ बचा नही है या फिर महागठबंधन के घटक दल और भाजपा सरकार दोनों ही अपनी नाकामियाबियों का उल्लेख करना नहीं चाहते।
बिहार में नीतीश दो बार सत्ता का स्वाद चख चुके है। लालू भी कुछ वक्त खुद तो कुछ वक्त राबड़ी देवी के द्वारा बिहार की कुर्सी पर काबिज हो चुके हैं और कांग्रेस की तो खैर बिहार में पूरी एक पीढी निकल गई। भाजपा भी पांच साल नीतीश के सहारे बिहार में राज जमा चुकी है। सब सुशासन की दुहाई देकर सत्ता में आए और बिहार में विकास का दावा ठोका लेकिन इस विकास की हकीकत क्या है?  इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के सकल घरेलु उत्पाद में 2001 से 2010 तक बिहार का योगदान 2.1 प्रतिशत था जो आज पांच साल बाद भी इतना ही है। यानि कि पिछले पंद्रह सालों में बिहार में उत्पाद बढा ही नहीं।  प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी बिहार सबसे पीछे है। बिहार के कुछ जिलों में तो प्रति व्यक्ति मासिक आय आज भी 750 रुपये है।  2011 की जनगणना के मुताबिक बिहार में कुल 36 फीसदी लोग साक्षर हैं। जबकि भारत की कुल साक्षरता दर 74 प्रतिशत है। बिहार में सरकारी और गैर सरकारी महाविद्यालयों की संख्या मात्र 665 है। जिसमें जहां 10 महाविद्यालय तकनीकी अभियंत्रण के हैं तो वहीं मेडिकल कॉलिज की संख्या और भी कम है। यानि बिहार शिक्षा के मामले अभी कहीं पीछे है।
देश की जनसंख्या में बिहार की हिस्सेदारी 8.6 फीसदी है लेकिन देश में कुल हिंसापूर्ण अपराध में उसका योगदान 10 फीसदी है। 2011-12 में बिहार के सकल घरेलु उत्पादन में औद्योगिक उत्पादन का योगदान 19.9 प्रतिशत था जो की 2014 में घटकर 18.4 प्रतिशत हो गया। 2006 से 07 के बीच में बिहार में एक लाख 63 हजार छोटे व बड़े औद्योगिक इकाइयां थी बीते दस सालों में इसमें मात्र 35000 इकाइयां और बढी है यानि औद्योगिक इकाइयो में वृध्दि मात्र 2.5 प्रतिशत से भी कम है। ऐसे में बिहार का सारा दारोमदार खेती पर आ पडता है लेकिन उस ओर भी किसी सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। विशेषकर नीतीश के शासन में जिसके कारण नीतीश के शासन काल में न तो खेतिहर भूमि में कोई वृध्दि हुई और न ही उत्पादन में।
विदेशी पूंजी निवेश के मामले में बिहार की तुलना यदि उत्तर प्रदेश से भी की जाए तो वह उससे भी काफी पीछे है। 2014 में जहां उत्तरप्रदेश को 37 विदेशी पूंजी निवेश के आवेदन मिले तो बिहार को मात्र 7 मिले। बिजली मुहैया कराने के मामले में भी बिहार कहीं नहीं टिकता। खैर इन सब में बिहार चाहे पीछे हो लेकिन दशकीय जनसंख्या वृध्दि में बिहार काफी आगे है। जहां राष्ट्रीय जनसंख्या वृध्दि दर 17.6 प्रतिशत है वहीं बिहार की जनसंख्या वृध्दि दर 25.1 प्रतिशत की रफ्तार से आगे बढ रही है। ऐसे में यदि बिहार की जनता को पिछले कुछ दिनों में कुछ मिला है तो वह हैं सड़कें। 2013 में बिहार मे कुल 1 लाख 80 हजार किलोमीटर की पक्की सड़क थी। जो 2014 में बढकर 2 लाख 25 हजार किलोमीटर हो गई। यानि एक साल से भी कम वर्ष में 45,000 किलोमीटर पक्की सड़क।

इन सभी आंकड़ों को देखकर यहां सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इस तरह की बदतर औसत बिहार की बदहाली के लिए जिम्मदार नहीं है? क्या बिहार की जनता को यह जानने का हक नहीं है कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्या बिहार की जनता नहीं चाहती की बिहार में भी विकास की बातें हों? बिहार भी खुशहाल राज्य बने। लेकिन कहते है न की राजनेता अक्सर जनता को वही बताते और दिखाते हैं जो वह चाहते हैं। बिहार का चुनाव मात्र अपशब्दों और आरोप – प्रत्यारोपों तक सिमट कर रह गया है। कोई दल विकास की बात करना ही नहीं चाहता।  

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

कृषिप्रधान देश से किसान कब्रगाह में तब्दील होता भारत

देश में 1995 से लेकर अब तक तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके है लेकिन शायद ही किसी ने कृषि क्षेत्र में होते इस मृत्यू तांडव पर चिंता जताई हो। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 में तकरीबन 13,754 और 2013 में 11,772 किसानों ने आत्महत्या की है। भारत में ज्यादातर किसान कर्ज़, फसल की लागत बढ़ने, सिंचाई की सुविधा न होने, कीमतों में कमी और फसल के बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं। इस साल भी किसान मृत्यू दर का आंकड़ा हजारों के आंकड़े को पार कर चुका है। लगातार 12वें साल महाराष्ट्र के किसान आत्महत्या के मामले में अव्वल है। यहां का सूखाग्रस्त विदर्भ क्षेत्र किसानों की कब्रगाह है। अकेले महाराष्ट्र में 1995 से अब तक 60,750 किसान आत्महत्या कर चुके हैं।
देश के अन्नदाता अन्न के लिए मौहताज 
देश डिजिटल हो रहा है। देश की जीडीपी दर बढ रही है साथ ही देश में राजनीतिक असहयोग की दर भी लगातार बढती जा रही है। हालात यह हैं कि भूमि अधिग्रहण बिल पर सरकार के घुटनों को टिकाकर कांग्रेस किसानों की हिमायती होने का दम ठोक रही है और बीजेपी यह रोना लेकर बैठी है कि वह किसानों के लिए विपक्षियों के अड़ियल रवैये के कारण कुछ नहीं कर सकती। लेकिन बिहार चुनावों में कोई दल बेबस नहीं नजर आता है। उसकी रणनीति बनाने को लेकर विपक्षी और सत्ताधारी दलों में मीटिंगों के दौर भी चल पड़े है। चीन में आई मंदी को भारत के लिए एक सुनहरे अवसर के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री ने इससे देश को फायदा पहुंचाने के लिए इंडिया इंक और इकोनॉमिस्ट के साथ मीटिंग भी की है। लेकिन शायद ही किसी को याद हो की खेती की बिगड़ी अर्थव्यव्सथा को लेकर प्रधानमंत्री या किसी अन्य दल ने ऐसी मीटिंग की तो कब की? देश में हर कोई अपना उल्लू सीधे करने में व्यस्त है लेकिन किसानों की चिंता किसी को नहीं है। शायद इसी का नतीजा है की कर्नाटक देश का पहला सूखा राज्य घोषित हो चुका है और महाराष्ट्र में भी सूखे के हालात बनते जा रहे हैं। तेलांगना में भी सूखे से हालात बद से बदतर हो गए हैं। यानि किसानों के सामने जिंदगी का सवाल है लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। देश के बड़े हिस्से में मानसून की बारिश धम चुकी है और शायद सरकार इस बात से अनभिज्ञ भी नहीं होगी कि इस बरस मानसून की बारिश सामान्य के मुकाबले 14 फीसदी कम दर्ज की गई है। स्थिति कितनी गंभीर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की देश के 641 जिलों में से 283 जिलों में मानसून की बारिश 30 से 60 फीसदी तक कम रिकार्ड की गई है। कभी अकाल ओलावृष्टि और बारिश की वजह से किसान मरता है तो कभी सूखे की वजह से, मरता हर बार किसान ही है। लेकिन जैसे किसी को कोई प्रवाह ही नहीं है। 

मराठावाड़ा में चार सालों के सूखे से घुटने टेकता किसान
मराठावाड़ा के दो किसानों का शव
महाराष्ट्र के मराठावाड़ा में पिछले महीने तक करीब 1300 किसानों के आत्महत्या करने के आंकड़े दर्ज किए गए। मराठवाड़ा के औरंगाबाद, जालना, उस्मानाबाद, नांदेड़, परभनी, बीड़, लातूर, हिंगोली में भयंकर सूखे की स्थिति है और हर तरफ से सिर्फ किसानों की चीख पुकार ही सुनने को मिल रही है। हालात यह तब हैं जब इस सूखा का अंदेशा सरकार को पिछले वर्ष सितंबर में ही लग गया था। लेकिन सरकार को हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार चुनावों की तैयारियां भी तो करनी थी, ऐसी में किसानों के लिए उसके पास वक्त ही कहां था। वैसे तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मराठवाड़ा क्षेत्र के तीन दौरे किए और ख़स्ता  हालात में जीवन बिता रहे किसानो से मिलकर सीएम ने उनका हाल भी जाना। लेकिन लच्छेदार भाषण और झूठे  वायदों के अलावा किसानों को और कुछ नहीं दिया। हालांकि महाराष्ट्र के तीन जिलों हिंगोली, ओसमानाबा और लातूर में खाने के कैंप जरूर लगाए गए है क्योंकि सबसे ज्यादा किसानों के मरने की खबर यहीं से आ रही है। उल्लेखनीय है कि मराठावाड़ा में इस वर्ष 52 फीसदी कम बारिश हुई है। यहां के बांधों में कुल 7.6 फीसदी पानी बचा है। इसके प्रमुख 11 बांधों में से 5 का पानी पूरी तरह सूख चुका है। यहां के हालात इतने खराब है कि लोगों को कई किलोमीटर दूर तक पानी के लिए खानाबदोशों की तरह घूमना पड़ता है। 
ऐसा भी नहीं है कि यहां के ऐसे हालात पहली बार बने हैं। 2014, 13 और 12 में भी यहां का नजारा कुछ ऐसा ही था और इस बार की भाजपा सरकार भी पिछली सरकारों की तरह बेबस बस किसानों को ढांढस बंधाने में लगी थी। पूरे मराठावाड़ा के किसान बोतलबंद पानी और टैंकरों पर निर्भर हैं। इस साल अब तक 1,291 टैंकरों की सप्लाई हो चुकी है और पिछले वर्ष करीब 718 टैंकरों की सप्लाई की गई थी। स्थिति यहां यह है कि कुछ इलाकों में तो लोग हफ्ते भर में सिर्फ दो बार ही नहाते हैं। इतने खराब हालात के बाद भी राज्य के कृषि मंत्री एकनाथ खड़से का कहना है की अगले दो हफ्तों तक हालातों की समीक्षा की जाएगी उसके बाद सूखे से प्रभावित गांवों की घोषणा होगी। जिसका मतलब है कि तबतक किसानों के लिए राहत कार्य शुरू नहीं होगा और दिन बा दिन देश का अन्नदाता दम तोड़ता रहेगा।

यहां के भीषण सूखे का कारण

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक रूप से सूखा रहने वाले इस इलाके में बहुत बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है। जो पानी के पीछे मौजूदा संकट का सबसे बड़ा कारण है। मराठावाड़ा में कम से 70 चीनी की मिले हैं। इस इलाके की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से गन्ने की फसल यहां के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। क्योंकि गन्ने की फसल में पानी और सिंचाई की बहुत जरूरत पड़ती है और इस इलाके में सिंचाई की व्यवस्था न के बराबर है। यहां के किसान इस बात से बिल्कुल अनभिज्ञ है। आज यहां का भूमिगत जल बिल्कुल सूख चुका है। जमीन के 40 फीट नीचे तक पानी का कोई पता ठिकाना नहीं है। यहां की करीब 76 तालुकाओं में से 66 का जल भी पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। जिसकी सबसे बड़ी वजह गन्ने की खेती है। यह बहुत जरूरी है कि इस इलाके को बचाने के लिए सरकार जल्द से जल्द कड़े कदम उठाए तथा यहां गन्ने की खेती पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दे। वैसे यहां सूखे की स्थिति साल 2012 से ही बनी हुई है। इस साल भी यहां केवल जून के शुरूआती माह में बारिश हुई थी। इसके बाद इस इलाके में पानी की एक बूंद तक नहीं दिखी। कम बारिश के कारण ही यहां की खरीफ की फसल पूरी तरह नष्ट हो चुकी है और रबी की फसल की भी कोई गारंटी नहीं है। जिसके कारण यहां का किसान पूरी तरह से टूट चुकी हैं। यदि सरकार ने इस और जल्द ध्यान नही दिया तो भविष्य में स्थिति इससे कहीं गंभीर हो सकती है।

पूरे देश में मंडरा रहा कृषि संकट

देश की करीब 60 प्रतिशत जनसंख्या की आजीविका कृषि क्षेत्र पर आधारित है। लेकिन इस क्षेत्र को लेकर सरकार ने अब तक किसी बड़े नीतिगत बदलाव या घोषणा से परहेज ही किया है। कृषि पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। चालू वित्त वर्ष  में कृषि विकास दर सिर्फ़ 1.1 फीसदी रही है। कृषि की दयनीय हालत के बावजूद अपने पहले बजट में मोदी सरकार ने कृषि आय की बात तो की, लेकिन कृषि बजट में कटौती कर दी। बजट में किसानों के  लिए कुछ खास नहीं रहा। सरकार द्वारा जिस कृषि लोन की बात की जाती है, उसका फायदा किसानों से ज्यादा कृषि उद्योग से जुड़े लोगों को होता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पूरे देश में केवल किसान ही एक ऐसा उत्पादक है जो अपने उत्पाद का मुल्य स्वयं निर्धारित नहीं करता। जिसके कारण अन्य उत्पादक तो मुनाफा कमा लेते है लेकिन किसान के लिए उसकी लागत निकालना ही भारी पड़ जाता है और ऊपर से प्रकृति की मार पड़ जाए तो मौत को गले लगाने से ज्यादा सुख उसे और कोई चीज नहीं दे सकती। यहां एक गंभीर समस्या किसानों में बढते असंतोष के रूप में भी पनप रही है। शायद इसीलिए पुलिस और किसान के संघर्ष की घटनाएं भी बढ रही हैं। इस साल अबतक पुलिस और किसानों के बीच करीब 74 घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जो पिछले वर्ष के मुकाबले दुगनी हैं। कहीं न कहीं इस असंतोष का कारण बढने की प्रमुख वजह सरकार की कॉरपोरेट प्राथमिकता नीति भी है। लेकिन यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि डिजिटल इंडिया के सपने दिखाने वाली सरकार के पास प्रकृति की मार से प्रभावित राज्यों के लिए कोई नीति नहीं है। और एक विडंबना यह भी है कि आखिर ऐसी नौबत आती ही क्यों है कि देश के अन्नदाता को हर साल खुद अन्न के लिए मौहताज होना पड़ता है और तंग आकर मौत को गले लगाना पड़ रहा है। जिसकी वजह से यह देश कृषि प्रधान देश की जगह किसानों की कब्रगाह में तबदील होता जा रहा है।
 

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

आरक्षण की समीक्षा का सही समय आ गया है



देश में एक बार फिर आरक्षण का मुद्दा सिर उठाए खड़ा है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस बार यह चिंगारी गुजरात में जली है। उस गुजरात में जिसे कुछ समय पहले तक विकास के सफल मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा था। गुजरात में युवा हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पटेल समुदाय आरक्षण की मांग कर रहा है। पूरा पटेल समुदाय सड़कों पर उतर आया है। जिसके कारण राज्य में कई जगह हिंसक घटनाएं भी हुई। सरकारी संपत्ति को नुकसान भी पहुंचाया गया। कुछ जगहों पर कर्फ्यू भी लगा तथा अहमदाबाद सहित कई जगहों पर इंटरनेट सेवा भी बंद कर दी गई।
यह सब उस गुजरात में हो रहा है जिसकी समृद्धि और विकास मॉडल का उदाहरण पूरे विश्व में दिया जा रहा था। लेकिन आज इस राज्य की हालत देख दया आती है कि यहां राजनैतिक व आर्थिक रूप में सबसे ताकतवर पटेल समुदाय आज इस तरह सड़कों पर उतरकर आरक्षण की मांग कर रहा है। माना की हमारे देश में हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का पूरा हक है साथ ही गुजरात के पटेल समुदाय की आरक्षण की मांग कितनी उचित है, इस पर बहस की गुंजाइश भी है। लेकिन अपनी मांग रखने का जो तरीका उन्होंने अपनाया है वह कहां तक सही है आखिर आप इस तरह के हिंसक प्रदर्शन करके क्या साबित करना चाहते हैं ?
पटेलों ने आरक्षण को लेकर जिस प्रकार का उग्र रूपधारण किया है उससे आऱक्षण का मुद्दा एक बार फिर सतह पर आ गया है। शायद गुर्जर आंदोलन भी लोगों के ज़हन से अभी तक नहीं उतरा होगा। पटेल अपनी इस मांग के पीछे यह तर्क दे रहे है कि पटेल उम्मीदवार को 90 प्रतिशत अंक आने के बाद भी एमबीबीएम कॉलेजों में प्रवेश नहीं मिल पाता वहीं आरक्षण प्राप्त उम्मीदवार केवल 45 प्रतिशत अंक प्राप्त कर प्रवेश पा लेते हैं। हालांकि पटेलों का यह तर्क पूरे देश में आरक्षण से बाहर जातियों की कुंठा और पीड़ा का कुछ हद तक चित्रण जरूर करता है। इस पटेल आंदोलन से कहीं न कहीं यह संदेश जरूर जाता है कि शायद अब वक्त आ गया है कि देश से आरक्षण को खत्म कर दिया जाए क्योंकि इस बात को कोई नहीं झूठला सकते कि आज आरक्षण सिर्फ एक राजनैतिक हथियार के अलावा और कुछ नहीं रह गया तथा ज्यादातर जातियों को पता है कि इसे जन बल के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। कुछ समय पहले राजस्थान में जाट आरक्षण की मांग रद्द करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि पिछड़ेपन की पहचान आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षणिकता को ध्यान में रखकर करना चाहिए न की जाति के पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए।
सर्वोच्च न्यायालय की बात शत् प्रतिशत सही भी है और अब आरक्षण की समीक्षा होना बहुत जरूरी है क्योंकि हकीकत में जिन जातियों को इसका लाभ मिलना चाहिए उन तक इसका लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। आज आए दिन देश के किसी न किसी कोने से आरक्षण की मांग उठती ही रहती है। जबकि आरक्षण की व्यवस्था आजादी के सिर्फ दस साल बाद तक थी। लेकिन सिर्फ अपना वोट बैंक खोने के डर से किसी भी सरकार ने इसे खत्म करने या इसकी समीक्षा करने की कोशिश नहीं की। हमारे देश के संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर भी देश में सदा के लिए आरक्षण जारी रखने के पक्ष में नहीं थे। अगस्त 1949 में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का समर्थन करते हुए भीमराव अंबेडकर, पं जवाहर लाल नेहरू आदि सभी नेताओं ने इसे 10 साल बाद खत्म करने की सिफारिश की थी। देश के सबसे बड़े दलित नेता अंबेडकर बड़े दूरदर्शी थे उन्होंने कहा था कि कुछ वर्षों बाद आरक्षण कुछ अपवादों को छोड़कर सिर्फ गरीबी, पिछडेपन, सामाजिक भेदभाव, अकुशलता आदि को ही जन्म देगा। यह देश के विकास में एक दिन रोड़ा बनकर खड़ा होगा। आज के संदर्भ में देखे तो यह बात बिल्कुल सही साबित होती है। नेहरू जी ने  भी 1961 में सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख आरक्षण का विरोध किया था।
लेकिन इसके बाद भी आज आरक्षण जारी है। हालांकि यह बात सच है कि आरक्षण से कई प्रतिभाएं उभर कर सामने आई लेकिन इस सत्य को भी कोई नहीं झुठला सकता की उससे कहीं अधिक प्रतिभाएं ने आरक्षण के कारण ही अंधेरी गलियों में दम तोड़ दिया। इस आरक्षण की वजह से ही साल दर साल देश की हालत बिगड़ती रही लेकिन भारतीय राजनैतिक पार्टियों अपने मतलब की रोटियां सेकती रही। आज हालात यह है कि कई राज्यों में आरक्षण 50 प्रतिशत से भी अधिक है। अब पार्टियां जातियों के बाद धर्म के नाम पर आरक्षण देने का खेल खेल रही हैं। जिसका उदाहरण हमने पिछली यूपीए सरकार के दौरान देखा जिसने रागनाथन मिश्र आयोग का गठन कर यह सिफारिश की कि अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों में 15 प्रतिशत का आरक्षण होना चाहिए।

संक्षिप्त रूप में हम कहें तो आरक्षण आज सिर्फ देश को पीछे धकेलने और राजनैतिक पार्टियों का हथियार बनकर रह गया है। यह परिस्तिथियों की मांग है कि आरक्षण की समीक्षा होना ही चाहिए। तथा जाति के आधार पर आरक्षण पूर्णरूप से खत्म होना चाहिए। वरना कभी राजस्थान तो कभी गुजरात जैसी घटनाएं देश में प्रतिवर्ष होती ही रहेंगी।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

क्या हम यह स्वतंत्रता दिवस मनाने के हकदार हैं?


इस 15 अगस्त  हम अपनी आजादी का 69वां जश्न मना रहे हैं। बीते 68 वर्षों के दौरान देश ने युद्ध, आपातकाल, दंगे इत्यादि न जाने कितने उतार-चढाव देखे। 200 साल लंबी गुलामी की बेड़ियां टूटने के बाद उसके निशान मिटने में कई वर्षों का समय लग गया जिसके कारण हमारा देश आज भी विकसित देशों की श्रेणी में नहीं आ पाया है। लेकिन इस बारे में बात हम फिर कभी करेंगे। कैसी अजीब विडंबना है ना, जहां एक ओर देश की सरहदों पर लड़ने वालों को आज जंतर-मंतर पर यह कहकर खदेड़ दिया जाता है कि उनके यहां धरना प्रदर्शन करने से देश की सुरक्षा को खतरा है तो वहीं एक स्वतंत्रता सेनानी को अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने में 32 वर्षों का समय लग जाता है।

गौर हरिदास, पुर्व स्वतंत्रता सेनानी...
मैं बात कर रहा हूं गौर हरिदास की। आपने शायद ही उनका नाम कभी सुना होगा। इनका जन्म 1931 में उड़ीसा में हुआ था। गौर हरिदास स्वयं ही नहीं बल्कि उनके पिता और भाई भी स्वतंत्रता सेनानी थे। गौर हरिदास सिर्फ 6 साल उम्र से ही पिता के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने लगे थे और मात्र 14 वर्ष की उम्र में अपने गांव में भारत का झंडा फहराने के कारण अंग्रेज सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया था। देश स्वतंत्र होने के बाद भी उनका देश के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ और वह उड़ीसा से वर्धा आकर महात्मा गांधी के सेवाग्राम आश्रम में राष्ट्र निर्माण का प्रशिक्षण लेने लगे। 1951 में वह सर्वोदय समाज का हिस्सा बनकर संत विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़ गए। उस समय उनकी उम्र मात्र 20 वर्ष थी जब वह तेलंगाना से बिहार तक गांव-गांव जाकर लोगों को भूदान के लिए प्रेरित करते थे। तत्कालीन मुंबई प्रांत के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई को चरखा सिखाने का काम करते-करते खादी बोर्ड में नौकरी कर ली। वह एक सच्चे गांधीवादी थे शायद इसी वजह से कभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में खुद को प्रदर्शित करने की जरूरत नहीं समझी।

पहली बार उन्हें इसकी जरूरत तब महसूस हुई जब उनके बड़े बेटे अनिल के वीजेटीआइ इंजीनियरिंग कोर्स में प्रवेश के लिए कुछ अंक कम पड़ गए। अनिल को पता चला कि स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र को पांच फीसद अंकों की छूट है। तब बेटे की जिद पर पहली बार हरिदास जी 1945 की अपनी जेलयात्रा के कागजात लेकर स्वतंत्रता सेनानी का प्रमाणपत्र हासिल करने मुंबई के कलेक्टर कार्यालय गए। लेकिन उन्हें लचर सरकारी व्यवस्था ने अपने आगे झुका दिया और वह लगातार सरकारी ऑफिसों के चक्कर काटते रहे। सरकारी बाबुओ को यह समझ नहीं आ रहा था की उड़ीसा के स्वतंत्रता सेनानी को महाराष्ट्र में प्रमाणपत्र कैसे दिया जाए? और इसी बात को समझने में उन्हें 32 वर्षों का समय लग गया। शायद उन्हें यह नहीं पता था कि उड़ीसा और महाराष्ट्र भारत के ही हिस्से है और उन्होंने भारत को आजाद कराने की लड़ाई लड़ी थी सिर्फ उड़ीसा या महाराष्ट्र को नहीं। आखिरकार 2008 में महाराष्ट्र सरकार को यह बात समझ आ गई और वह उन्हें 400 रु प्रतिमाह की पेंशन व स्वतंत्रता सेनानी का प्रमाणपत्र देने को राजी हो गई। यह 400 रु पेंशन उन्हें खादी ग्रामोध्योग आयोग की नौकरी से रिटायर होने के बाद दी जानी थी। 78 वर्ष की उम्र में इस बकाया राशि का 40 फीसदी भाग तो उसी समय उन्हें मिल गया था लेकिन शेष 60 फीसद पांच वर्ष के लिए डाकघर में जमा किया जाना था। जिसे पाने के लिए उन्हें मंत्रालय के कई और चक्कर काटने पड़े।

एक स्वतंत्रता सेनानी ने अपना हक पाने के लिए पूरा जीवन अपने ही देश के सिस्टम से संघर्ष करते काट दिया। यह कहानी तो कुछ लोगों के सामने आ गई पर न जाने आज भी कितने गौर हरिदास भारत में है जो ऐसा ही संघर्ष अपने मूलभूत अधिकारों के लिए कर रहे होंगे या शायद कई इस देश की मंगलकामनाऐं करते हुए अपने प्राणों को त्याग चुके होंगे। आज हमारे पास परमाणु बम, टैंक, अत्याधुनिक हथियार न जाने क्या-क्या है लेकिन वो सब किस काम का जब हम अपने सैनिकों व स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान नहीं दे सकते। क्या सच में हम उन्हें बिना सम्मान दिए इस स्वतंत्रता के जश्न में शरीक होने के हकदार हैं?    

बुधवार, 12 अगस्त 2015

याकूब की फांसी सही या नहीं?

एक लंबी बहस, याकूब की दरखवास्तें और 22 वर्षों के इंतजार के बाद आखिरकार मुम्बई धमाकों के दोषी याकूब मेमन को फांसी दे दी गई। इतिहास में पहली बार 30 जुलाई की रात तीन बजे ऐसा हुआ जब सर्वोच्च न्यायालय में किसी केस पर सुनवाई हुई हो । मामले के सभी पहलुओं को देखने के बाद न्यायालय ने अपने फैसले को कायम रखते हुए फांसी की सज़ा को टालने से इंकार कर दिया। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर अब सवाल उठ रहे हैं। माना जाता है सर्वोच्च न्यायालय का फैसला, जनता का फैसला होता है। इसका मतलब याकूब को फांसी जनता ने सुनाई है तो सवाल यह है कि वो कौन लोग है जो अपने ही फैसले पर उंगली उठा रहे हैं? कुछ मुस्लिम सरप्रस्तों की ओर से आवाज यह उठाई जा रही है कि राजीव गांधी के हत्यारों को क्यों बक्शा गया? भुल्लर ने कौन सी समाज सेवा की थी? गोधरा कांड के दोषियों को सजा क्यों नहीं मिली? 1992 के दंगों के दोषियों का क्या हुआ? बाबरी कांड में अभी तक किसी को सजा क्यों नहीं हुई? अगर इन सभी को बक्शा जा सकता है तो याकूब को क्यों नहीं? प्रश्न यहां यह उठता है कि क्या सच में याकूब के साथ अन्याय हुआ? अगर हम

कुछ तथ्यों पर नजर डालों तो जान पाएंगे की याकूब के साथ अन्याय हुआ या नहीं।

1992 के मुंबई दंगे

1992 के मुम्बई धमाकों के जख्म आज भी देश की व्यवसायिक नगरी भुला नहीं पाई हैं। यह देश के दामन पर एक दाग की तरह आज भी वैसे के वैसे हैं। हालांकि 1992 के बाद हुए दंगों के कत्लेआम से लगे खून के छीटों के पीछे, 1992 के दाग छुप जरूर गए हैं लेकिन खत्म नहीं हुए। 1992 के इन दंगों में करीब 900 लोगों ने अपनी जान गवाई थी। लेकिन दंगों के आरोपियों को सजा दिलाने में न राज्य सरकार न केंद्र और न न्यायालय ने ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। यह बात किसी ओर ने नहीं खुद जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा ने एक टीवी चैनल् से कही। अगर 900 लोगों की जान में किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई तो 1993 बम धमाकों में मरे 257 लोगों की लाशों में ऐसा क्या था जो सरकार ने 100 से भी ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी की। शायद इसका कारण था दंगो की रिपोर्ट की उंगलियां शिवसेना और दिवंगत बाल ठाकरे पर उठना । इस रिपोर्ट में बाल ठाकरे को ‘वर्चुल जनरल’ कहा गया था। लेकिन इस रिपोर्ट पर सरकार ने कभी कोई कार्रवाई नहीं की। इसमें कांग्रेस-एनसीपी और शिवसेना-बीजेपी की सरकारें शामिल थी। शायद यही कारण था कि दंगों के 22 साल बाद भी 900 लोगों की मौत के लिए सिर्फ तीन लोगों को दोषी पाया गया और 1993 मुम्बई धमाकों में 100 लोगों को दोषी करार दिया गया। अगर याकूब के पीछे भी राजनीतिक पार्टियां होती तो शायद इस मामले में भी 2 या तीन लोगों को ही दोषी पाया जाता।

1993 दिल्ली बम धमाके


भुल्लर और याकूब के केस में कई समानताएं है। दोनों का जन्म 1960 में हुआ। याकूब 1993 मुम्बई धमाकों का मुख्य आरोपी है और भुल्लर 1993 दिल्ली के बम धमाकों का मुख्य आरोपी। बम धमाकों में शामिल होने से पहले भुल्लर प्रोफेसर बन चुका था और याकूब चार्टिड अकाउंटेंट। भुल्लर ने अपने ‘खालिस्तान-प्रेम’ के मौह में बम धमाके किए और याकूब ने ‘पाकिस्तान प्रेम’ में। याकूब धमाकों के बाद पाकिस्तान भाग गया और भुल्लर जर्मनी। दोनों को ही दूसरे मुल्कों ने भारत को सौंपा। याकूब को नेपाल ने तो भुल्लर को जर्मनी ने भारत को सौंपा। दोनों के खिलाफ टाडा के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया और दोनों को ही निचली अदालतों ने फांसी की सजा सुनाई। इसके बाद भी दोनों का सफर एक जैसा ही रहा। दोनों की अपील सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दी। राष्ट्रपति ने भी दोनों ही के अपराध को अक्षम्य माना और दया याचिका को ठुकरा दिया। दोनों ने फिर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और दोनों को ही निराशा हाथ लगी। और हैरानी की बात तो यह है कि दोनो एक ही तरह की मानसिक बीमारी की चपेट में आए। लेकिन 31 अप्रैल 2014 को दोनो अपराधियों की समानता का सिलसिला टूट गया। सर्वोच्च न्यायालय ने भुल्लर की फांसी उम्र कैद मे बदल दी और 30 जुलाई 2015 को याकूब को फांसी दी गई। क्या इसका कारण यह था कि अकाली दल लगातार भुल्लर की फांसी का विरोध कर रहा था? या भुल्लर के मामले में ऐसा जनआक्रोश नहीं था जैसा याकूब के मामले में था जिसके कारण 30 जुलाई की रात 2 बजे सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन भी किया गया। लेकिन इन जनआक्रोश की तीव्रता में फर्क आया किसकी वजह से आम लोगों की वजह से या ?

राजीव गांधी के हत्यारों को माफी क्यों ?


फरवरी 2014 में सर्वोच्च न्यायलय ने राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी को उम्र कैद में बदल दिया। जिसका कारण कोर्ट ने दिया कि इनकी फांसी की सजा की तारीख तय करने में सरकार ने काफी ज्यादा देर लगा दी। राजीव गांधी के तीनों हत्यारों को टाडा कोर्ट ने 1998 में फांसी की सजा सुनाई थी। लेकिन 16 सालों के बाद भी सरकार इनकी फांसी की तारीख मुकर्रर नहीं कर पाई। जिसके कारण इनकी सजा को उम्र कैद में बदल दिया गया। कोर्ट ने कारण बता दिया लेकिन यह बात भी पूरे देश को पता है कि राजीव गांधी के हत्यारों को सदा तमिलनाडू सरकार का समर्थन मिलता रहा है। आज भी तमिलनाडू सरकार इस कोशिश में जुटी है कि अब राजीव गांधी के हत्यारों को जेल से रिहा कर दिया जाए। यहां सवाल उठता है कि याकूब की सजा भी तो आठ साल पहले सुनाई गई थी और करीब इक्कीस साल वह जेल में काट चुका था तो क्या यह आधार काफी नहीं था उसकी सजा को माफ करने के लिए। यहां शायद कमी इस बात की थी कि भारत में कोई मुस्लिम बहुल राज्य नहीं है या मुस्लिम सरकार नहीं है जो याकूब के समर्थन में खड़ी हो सकती।

1992 बाबरी मस्जिद कांड


बाबरी मस्जिद कांड एक ऐसी घटना जो हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष होने के एजेंडे को गाली देती है। आज भी लोगों के जहन में अयोध्या में हुआ इस कांड की यादें ताजा हैं। राममन्दिर के नाम पर किस तरह से सियासी दलों ने अपनी सियासत की जमीन पुख्ता की थी इससे सभी वाकिफ हैं। 1992 में करीब डेढ लाख कार सेवकों ने मिलकर ऐतिहासिक मस्जिद को गिरा दिया। जिसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए दंगों में करीब दो हजार जाने गई। यहां हैरान करने वाली बात है कि जब यह घटना घटी उस समय देश के लोकप्रिय नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी स्वयं मौजूद थे। इन सभी ने न्यायालय के आदेशों की भी धचियां उड़ा दी। इस विध्वंस की जांच करीब 17 वर्षों तक चलती रही अंत में आडवाणी, जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती आदि कई बड़े नेताओं को इसमें दोषी ठहराया गया। कांड के समय और जब रिपोर्ट आई दोनों बार देश में कांग्रेस की सरकार थी और राज्य में जनता दल लेकिन फिर भी इस कांड को न तो रोका गया और न ही दोषियों को सजा मिली। एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने माना की इस कांड के पीछे सिर्फ हिंदू दल ही नहीं बल्कि कांग्रेस, सपा और बसपा भी शामिल थी। यह बात किसी से नहीं छुपी की देश के कई राजनैतिक दलों के हाथ इसमें रंगे है इसीलिए चाहे सत्ता दल हो या विपक्ष किसी पर भी अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

यही नहीं 1984 के दंगे, हाशिमपुरा हत्याकांड, गोधरा दंगे, मुजफ्फरनगर दंगे आदि देश में कई ऐसे कांड हुए जिनपर आज तक दो या तीन लोगों की ही गिरफ्तारी हुई है और फांसी तो खैर शायद हुई ही नहीं। तो क्या यह मान लिया जिए कि याकूब के साथ नाइंसीफी हुई और उसे फांसी नहीं होना चाहिए थी। नहीं, ऐसा कतई नहीं है कि याकूब को फांसी नहीं होना चाहिए थी वो हजारों लोगों का गुनाहगार है और ऐसे जघ्नय अपराध के लिए फांसी की सजा भी कम है। न्यायलय ने याकूब को अपनी बात कहना का पूरा मौका दिया। लेकिन फिर भी मुस्लिम समुदाय में रोश है। शायद इसका कारण ओवेसी जैसे नेता और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले कुछ दल है। जिन्हें हमारी खस्ताहाल न्यायिक प्रणाली के कारण याकूब जैसे आतंकवादियों को फंसी देने पर देश के अल्पसंख्यक लोगों में देश के खिलाफ जहर खोलने का मौका मिल जाता हैं। लेकिन इन्हें यह नहीं पता कि मुस्लिम समुदाय के बीच इस तरह का जहर घोलना कितना खतरनाक है।